Agam Kuan History in Hindi : अगम कुआँ और शीतला मंदिर

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Agam Kuan History in Hindi
Agam Kuan History in Hindi

कुछ रहस्य जो इस कुँए को और भी खास बनाते है। इतना प्राचीन होने के बाद भी इस कुँए का पानी आज तक नहीं सुखा, इसके साथ ही ऐसे अनेक रहस्य है जैसे – क्या इसमें दबा है सम्राट अशोक का खजाना?, या फिर आखिर क्यों सम्राट अशोक ने अपने 99 भाइयों की हत्या कर उनकी लाशें इस कुएं में डलवाई

Agam Kuan History in Hindi : अगम कुआँ और शीतला मंदिर


 

Where is Agam Kuan : अगम कुआँ कहाँ है

अगम कुआँ बिहार की राजधानी पटना ने स्थित है, अगम कुआँ, और शीतला माता का मंदिर कई रहस्यों को अपने आप में समेटे हुए है, प्राचीन कथाओं के अनुसार इस कुँए का निर्माण सम्राट अशोक ने करवाया था

यह कल्पनातीत ही प्रतीत होता है कि जो अपने काल का सर्वाधिक क्रूर और हिंसक शासक रहा, संपूर्ण मानवता के प्रति उसकी इतनी उदारता कैसे हो गई? इतना बड़ा धार्मिक आस्था पुरुष वह कैसे हो गया?

मगर यह बात बिलकुल सत्य व इतिहास में वर्णित है। वह शासक महान् अशोक था, जिसने बौद्ध धर्म के प्रचार प्रसार के लिए अपना सबकुछ न्योछावर कर दिया, यहाँ तक कि अपने पुत्र और पुत्री को भी बौद्ध धर्म के प्रचारार्थ विदेशों तक भेजा था।

अपने शासनकाल में उसने अनेक बौद्ध स्तूप भी बनवाए थे, जो आज भी मौजूद हैं। अगमकुओं का निर्माण उसके क्रूरताकाल में ही हुआ था। आगे चलकर वह अहिंसा का पुजारी बना था।

शुरू हिंसा के पुजारी इतिहास प्रसिद्ध सम्राट अशोक की राजधानी पाटलिपुत्र (आधुनिक पटना) थी। आरंभ में वह चंडाशोक के नाम से विख्यात था, क्योंकि वह इतना क्रूर था कि जिसको अपने विरुद्ध पाता था, वह बड़ी निर्ममता से उसकी हत्या करवा देता था।

पिछले वर्षों पटना के कुम्हरार स्थित उत्खनन के दौरान अशोक के किले के साथ अनेक वस्तुएं मिली हैं, जिनमें से अधिकांश पटना म्यूजियम में रखी गई हैं, और बहुत सी वस्तुएँ कुम्हरार में ही सैलानियों के दर्शनार्थ रखी गई हैं। उस भग्नावशेष से तत्कालीन वास्तुकला पर पर्याप्त प्रकाश पड़ता है और यह मानना पड़ता है कि उस काल की वास्तुकला अतिशय समुन्नत थी।

कलिंग विजय के पूर्व तक अशोक की क्रूरता से सभी भयभीत रहते थे। कलिंग के युद्ध में हुए भीषण नरसंहार से अशोक के पशुत्व पर गहरी चोट लगी थी और उसका मानवत्व जाग उठा था। तभी से उसमें बौद्ध धर्म का प्रचलन पाते हैं, उसका सारा श्रेय अशोक को ही है। आधुनिकतम आवागमन के साधनों के अभाव में भी दुर्गम जंगलों, पहाड़ों, जलाशयों को लाँघते हुए भी बौद्ध धर्म को चीन, जापान, श्रीलंका आदि देशों में बौद्ध धर्म के संदेश को फैलाया था।

Agam Kuan History in Hindi : अगम कुआँ का इतिहास

इतिहासकारों का मत है कि सम्राट् अशोक ने ही अगमकुओं को खुदवाया था। किंवदंती है कि उसकी गहराई पृथ्वी के केंद्र तक है, जिस कारण वह अगम कहलाता है। बहरहाल, पुरातत्ववेत्ताओं के शोध का विषय है। उसके पानी सुखाने के लिए पानी निकालने के आधुनिकतम यंत्र महीनों तक काम करते रहे, मगर उसका पानी सूख नहीं सका।

इसी कारण उसकी गहराई के संबंध में निश्चित रूप से कुछ पता लगा पाना अत्यंत कठिन है। अद्यतन अनुमान के अनुसार उसकी गहराई 28 मीटर 35 सेंटीमीटर है।

लोगों को दंड देने के लिए हुआ था अगम कुआँ का निर्माण

कहा जाता है कि अशोक ने इस कुएँ का निर्माण लोगों को भयभीत करने के विचार से कराया था। यह भी कहा जाता है कि उसने अपने 99 भाइयों की हत्या करवाकर इसी में डलवा दिया था।

बिहार गजेटियर के अनुसार प्रसिद्ध चीनी यात्री ह्वेनसांग ने लिखा है कि कुएँ के समीप अनेक धमनभट्ठियाँ सुलगती रहती थीं, जिनमें सजा प्राप्त अपराधियों को जीते-जी डाल दिया जाता था और वे उसमें छटपटाते हुए अपना दम तोड़ देते थे। इन भट्ठियों के कारण अशोक के समय में कोई भी व्यक्ति किसी भी प्रकार का अपराध करने में अत्यधिक भयभीत रहता था।

कर्नल बाडेल के अनुसार, चीनी यात्री ने जिन सुलगती भट्ठियों का उल्लेख किया है, वे आज भी जैन मतावलंबियों के मंदिर से जुड़ी हैं, किंतु अब उनका भग्नावशेष मात्र है।

कहा जाता है कि बौद्ध धर्म स्वीकार करने के पूर्व अशोक ने एक बौद्ध भिक्षु को जलती धमनभट्ठी में डाल दिया था, किंतु बाद में अशोक ने देखा कि उस प्रचंड अग्नि से प्रभावित हुए बिना वह कमल के फूल के मध्य जिंदा बैठा है।

हेनसांग के अनुसार, अशोक ने सुदर्शन नामक एक जैनी को धमनभट्ठी में डाल दिया था, किंतु राजा को उस समय बड़ा आश्चर्य हुआ, जब उसने देखा कि वह एक सिंहासन पर जीवित बैठा था। सम्राट् इससे काफी प्रभावित हुआ और उसके साथ पड़ोसियों जैसा व्यवहार करने लगा।

वह मंदिर भग्नावशेष के रूप में आज भी सुदर्शन मंदिर के नाम से स्थित है।अगमकुओं के पास ही दक्षिण में बौद्ध स्तूपबड़ी
पहाड़ी, छोटी पहाड़ी और पंच पहाड़ी स्थित हैं, जो अपनी हरीतिमा से सबका मन मोह लेती हैं। इन पहाड़ियों का भी अपना अलग-अलग महत्त्व है। धमनभट्ठियों की बात तो सत्य है, किंतु उनसे जुड़ी किंवदंतियाँ संदिग्ध प्रतीत होती हैं।

पहाड़ियाँ कोई प्राकृतिक पहाड़ियाँ नहीं , किंतु उनकी ऊँचाई पहाड़ी जैसी प्रतीत होती

अंग्रेजी लेखक सर जॉन हॉल्टन ने अगमकुओं को पूजास्थल और तीर्थाटन के रूप में चित्रित किया है। उन्होंने लिखा है कि इस विशाल कूप को देखकर आज भी भय उत्पन्न होता है तो उस समय वह कितना डरावना रहा होगा ! सचमुच यह तत्कालीन अपराधियों के लिए अग्निकुंड रहा होगा।

अगम कुआँ से दूर होते है असाध्य रोग 

अगमकुआं का शीतला मंदिर सर्वप्रमुख मंदिर है, जहाँ चेचक से ग्रस्त दूर दूर के रोगी यहाँ आकर माता शीतला से प्रार्थना करते हैं, ताकि चेचक से उनका बचाव हो सके। मार्च से आरंभ होकर बाद के चार महीनों में गाजे-बाजे के साथ यहाँ आकर मां शीतला की पूजा करते हैं बाकी महीनों में प्रति मंगलवार को यहाँ परियों का झुंड एकत्र होता है। उनकी यह धारणा है कि शीतला देवी कांति प्रदायिनी हैं और चेचक से शरीर के विट्ठप होने का भय नहीं रहता।

इसका वैज्ञानिक कारण जो भी रहा हो, किंतु इतना सत्य है कि कुएँ के जल से अनेक चर्मरोगों में काफी लाभ पहुँचता है। दूसरा पानी गंदा होता है, जो पीने योग्य नहीं है। फिर भी यह शोध का विषय है कि कौन सा ऐसा कारण है, जिसके चलते इसका पानी चर्म रोगों में लाभ पहुंचाता है !

हजारों वर्षों से तीर्थयात्री इसमें हवन की राख और सिक्के फेंकते जा रहे हैं, जिससे इसका पानी गंदा हो गया है। कहा जाता है कि अशोककालीन बहुत सारे हथियार इसमें फेंक दिए गए थे।

भूत प्रेत में विश्वास करने वाले लोग भी झाड़ फूंक करके इस कुएँ में भूतों को फेंक जाते हैं। उनका विश्वास है कि अगमकुआं में फेंके गए भूत प्रेत फिर से बाहर लोगों को आकर नहीं सताते। इसीलिए वे वहाँ स्थिर कर दिए जाते हैं।

इस प्रकार आरंभ से लेकर अब तक इस कुएं में करोड़ों भूत कैद हैं। प्रेतों में विश्वास करनेवालों का तो यहाँ तक कहना है कि जिन प्रेतों को कुएं में डाल दिया गया है, वे कभी भी बाहर नहीं आते, इसी से इस कुएँ की गहराई का अनुमान लगाया जा सकता है कि लगभग दो हजार वर्षों से सिक्कों के अलावा राख आदि वस्तुएँ फेंकी जाती रही हैं, फिर भी यह भरा नहीं है।

भारत सरकार और साथ ही बिहार सरकार का भी यह दायित्व है कि इस वैज्ञानिक युग में अगमकु के रहस्य का पता लगाएँ। वे इसकी गहराई का आकलन करें और इसमें छिपे खजाने को ढूंढ़ निकालें। संभव है, इसकी सफाई के दौरान अनेक प्राचीन दुर्लभ वस्तुएँ प्राप्त हों, जिनका पुरातात्विक दृष्टि से काफी महत्व हो। इसके जल की वैज्ञानिक जाँच कर इसके गुणों का पता लगाया जाए।

अगर सरकार चाहे तो इस कुएँ का रहस्योद्घाटन कर सकती है और नए सिरे से इसे तीर्थाटन के लिए महत्वपूर्ण बनाया जा सकता है। इससे बढ़ते अंधविश्वासों को भी दूर किया जा सकता है। अभी तक तो यह कुछ रहस्यमय ही बना हुआ है।

इस कुएँ का बहुत बड़ा ऐतिहासिक महत्व है, इसके साथ ही इसका वैज्ञानिक महत्त्व भी है। वैज्ञानिक महत्व इसलिए कि आखिर इसमें जल में वह कौन सी विशेषता है, जिससे अनेक प्रकार के चर्म रोग नष्ट हो जाते हैं। यहाँ का शीतला मंदिर (शीतला माई बड़ी चेचक) किसी विशेषता के आधार पर ही बना था क्या? यह भी शोध का विषय है।

भारत सरकार और बिहार सरकार इस ऐतिहासिक महत्त्व के स्थल को सुसज्जित ढंग से बनाने की चेष्टा करे तो यह बिहार का एक उत्तम पर्यटन स्थल हो सकता है।


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