Aijek Newton Biography in Hindi : आइजक न्यूटन का जीवन परिचय

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Aijek Newton Biography in Hindi
Aijek Newton Biography in Hindi

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Aijek Newton Biography in Hindi

आइजक न्यूटन का जीवन परिचय


महान् आत्माएं प्रत्येक युग में इस धरा पर विभिन्न नामों के साथ अवतरित होती आई हैं। आज से 510 वर्ष पूर्व भी ऐसी ही एक महान आत्मा 25 दिसंबर, 1642 को आइजक न्यूटन के नाम से उत्पन्न हुई थी। इनका जन्म वूल्सथ्रोप इंग्लैंड में हुआ था। सन् 1642 को संपूर्ण दुनिया में इस कारण महत्व (इंग्लैंड तो खैर गर्व करता ही है) दिया जाता है कि इसी वर्ष आइजक न्यूटन जन्मे थे, जिन्होंने प्रकृति के गुरुत्वाकर्षण के सिद्धांत को एक मामूली घटना से प्रेरित होकर सिद्ध करने का कार्य किया था। इनकी माता का नाम हन्नाह न्यूटन था। इनके पिता की मृत्यु उस समय हो गई थी, जब यह मां की कोख में थे। इनके पिता का नाम ही दरअसल ’आइजक न्यूटन’ था और पिता की स्मृतियों को जीवित रखने के लिए ही उनका नाम उनके शिशु को प्रदान किया गया था। उस शिशु पर यह नाम इतना जमा कि आज दुनिया का बच्चा-बच्चा आइजक न्यूटन को जानता है। इसे योग्यता का ही करिश्मा कहना चाहिए कि पुत्र ने ऐसे स्वर्गवासी पिता को भी अमर कर दिया, जो उसके पैदा होने से पूर्व ही मृत्यु की गोद में समा गया था।

पिता के बिना जन्मे शिशु को शीघ्र ही माता का वियोग भी इस कारण सहना पड़ा था, क्योंकि माता ने दूसरा विवाह कर लिया था। तब बालक को अपना प्रारंभिक समय नानी के पास ही गुजारना पड़ा था। आरंभिक स्थिति भी ऐसी थी न्यूटन की कि जीवित रहने की भी कोई उम्मीद नहीं थी। गर्भ में महज 7 माह ही गुजारे थे न्यूटन ने। इस कारण जन्म के समय वह बेहद कमजोर शिशु ही था।

मां ने बार्नाबस नामक शख्स से शादी की, तब उसने सोचा था कि इस प्रकार शिशु न्यूटन को पिता का साया प्राप्त हो जाएगा। लेकिन बार्नाबस नहीं चाहता था कि उसकी पत्नी के पहले पति की निशानी उसके घर में रहे। इस कारण आरंभिक 3 वर्षों तक नयूटन नानी के पास ही रहे थे। न्यूटन परिपक्व उम्र में गिरजाघर की क्षमा पुस्तिका में लिखा था कि ’मैं नादान उम्र में अपने माता-पिता की मौत चाहा करता था, मुझे उनसे घृणा थी, क्योंकि मैं उनकी जिंदगी का हिस्सा नहीं बन पाया था।’ बार्नाबस अपनी मृत्यु से पूर्व तीन और संतानों का पिता भी बन गया था। लेकिन उसकी मौत ने न्यूटन को अपनी माता के करीब पहुंचा दिया था। इसके पूर्व की परवरिश नानी माग्रेरी के पास कोलस्टरवर्थ में हुई थी। इस देहाती इलाके में ही प्राथमिक परवरिश व शिक्षा प्राप्त की और फिर न्यूटन का दाखिला ग्रेंथम शहर के ’दी किंग्स स्कूल’ में करवा दिया गया था।

1656 में आइजक के सौतेले पिता बार्नाबस स्मिथ का देहांत हो गया। आइजक की माता हन्ना अकेली पड़ गईं। कृषि कार्य की देखरेख में हाथ बटाने के लिए इन्होंने बालक आइजक को अपने पास बुला लिया। इस दौरान आइजक को पढ़ने की ओर रुझान हो चुका था। लेकिन माता हन्ना का आग्रह था, इस कारण पढ़ाई करने के स्थान पर आइजक को कृषि से संबंधित कार्य करने पड़ते थे। जाहिर है कि बालक न्यूटन के लिए यह निराशा का दौर था। तब चाचा हेनरी स्टोक्स ने न्यूटन के आग्रह पर इनकी शिक्षा के बारे में इनकी माता को तैयार किया। इस कारण न्यूटन को पुनः स्कूल में दाखिला मिला। यह सन् 1660 की बात है। इस वक्त तक आइजक एक मननशील किशोर बन चुके थे। 5 जून, 1661 को उन्हें कैंब्रिज विश्वविद्यालय के ट्रिनिटी माहविद्यालय में प्रवेश मिल गया। जनवरी, 1665 में इन्होंने स्नातक की उपाधि प्राप्त कर ली। इसके साथ ही आइजक के गणित विषयक प्रशिक्षण के अच्छे नतीजे भी सामने आने लगे। सन् 1666 में उन्होंने ’बाइनोमिनल प्रमेय’ की खोज की और कुछ ही समय पश्चात् इन्होंने ’इंटीग्रल कैल्क्युलस’ के सिद्धांतों एवं वक्र रेखाओं को ज्ञात करने के सिद्धांतों को प्रदर्शित किया। अपनी इन शोधों के विषय में न्यूटन ने खुद लिखा है। वाल्टेयर के पत्रों के अनुसार इसी कालखंड में इन्होंने वृक्ष से गिरते हुए सेब को देखकर गुरुत्वाकर्षण विषयक शोध की थी। इसकी पुष्टि आइजक की भतीजी द्वारा की गई, जो आइजक के साथ रहती हुई और इनके आवास पर प्रबंधन कार्य करती थी। अपने द्वारा परिकल्पित सार्वभौमिक गुरुत्वाकर्षण के नियम के आधार पर इन्होंने चंद्रमा एवं दूसरे नक्षत्रों की गतियों को व्याख्यापित करने का प्रयास किया, लेकिन इस प्रयास में आइजक को अधूरी कामयाबी ही मिल सकी।

सन् 1667 में एक फैलो के रूप में आइजक पुनः कैंब्रिज लौटे। यहां रहते हुए कुछ वर्षों तक इन्होंने प्रकाश संबंधी शोधों में तथा दूरबीन के निर्माण में अपना समय लगाया। इन्होंने 6 इंच लंबी एक दूरबीन बनाने में कामयाबी प्राप्त कर ली। उसकी मदद से आइजक ने बृहस्पति ग्रह के उपग्रहों को देख पाने में सफलता प्राप्त की। सन् 1669 में न्यूटन की नियुक्ति ट्रिनिटी महाविद्यालय में गणित के प्राध्यापक के पद पर हो गई।

आइजक न्यूटन ने स्वनिर्मित प्रिज्म की मदद से कई प्रयोग किए। उन प्रयोगों के नतीजों को लेखबद्ध करके न्यूटन ने एक शोध पत्र तैयार किया। उनका यह शोधपत्र राॅयल सोसाइटी के तत्वावधान में न्यूटन द्वारा पढ़ा गया। उस शोधपत्र ने रंगों के विकरण एवं पृथक्करण को लेकर खासा विवाद पैदा कर दिया। इस विषय के संदंर्भ में विद्वानों में पर्याप्त दिलचस्पी पैदा हो गई थी। प्रकाश संबंधी अपने सिद्धांतों के बारे में होने वाले विचार विनिमय से न्यूटन उकता गए और इन्होंने खीज कर लिख दिया कि मैंने अपने सिद्धांतों को प्रकाशित करके अपनी मूल्यवान वस्तु, हृदय की शांति को खो दिया। अपनी प्रसिद्धि को न्यूटन ने अपनी परछाई के पीछे दौड़ने के तुल्य ठहराया।

अपने प्रसिद्ध ग्रंथ ’प्रिंसिपिया’ के प्रकाशन के पश्चात् न्यूटन वास्तव में सार्वजनिक जीवन में आ गए। बादशाह जेम्स द्वितीय कुछ नियमों की अनदेखी करके फादर एलवन फ्रांसिस को एम.ए. की उपाधि प्रदान करना चाहते थे। इसका पर्याप्त विरोध किया जाने लगा। न्यूटन ने इस विरोध में विरोधियों की हिमायत की। इस कारण इनको ’कन्वेंशन पार्लियामेंट’ में सन् 1689 में स्थान प्राप्त हुआ। इस स्थान पर न्यूटन एक साल तक, सन् 1690 तक बने रहे। अपने मित्रों के प्रयत्न से न्यूटन को सन् 1695 में टकसाल के संरक्षक का पद मिल गया। चार वर्ष पश्चात् इन्हें ’मास्टर आॅफ दी मिंट’ भी बनाया गया। उसके पश्चात् इन्हंे विज्ञान की फ्रैंच अकादमी के आठ विदेशी संयुक्त सदस्यों में से एक सदस्य के रूप में चुना गया।

सन् 1701 में न्यूटन विश्वविद्यालय की तरफ से एक दफा सांसद बना दिए गए। इस पद पर इनकी सक्षमता का आलम यह था कि यह फिर आजीवन ही इस पद पर बने रहे। सन् 1703 में इनको राॅयल सोसाइटी का अध्यक्ष भी चुना गया। इसके पश्चात् मृत्यु तक इन्हें प्रतिवर्ष इस पद पर चुना जाता रहा था। इस पद पर रहते हुए इन्होंने अपनी निगरानी में फ्लेम्सटीड के गं्रथ ’ग्रीनविच आब्जरवेशंस’ का प्रकाशन भी करवाया था।

ज्ञान के क्षेत्र में कई सम्मान प्राप्त करने वाले आइजक न्यूटन को सन्् 1705 में रानी एनी ने सर नाइटहुड की उपाधि से सम्मानित किया था। सन् 1727 के शुरू में सर आइजक न्यूटन गंभीर रूप से बीमार पड़ गए। आखिरकार पथरी की बीमारी के कारण वह कैंसिंगटन में 20 मार्च, 1727 को मृत्यु को प्राप्त हुए। 24 मार्च के दिन ’वैस्टमिंस्टर एवे’ में इनको दफन किया गया। सन् 1731 में उस स्थान पर एक स्मारक का निर्माण भी करवाया गया। न्यूटन के अनेक चित्र उपलब्ध हैं। सन् 1755 में डाॅक्टर स्मिथ ने काॅलेज के गिरिजाघर के सामने इनकी एक मूर्ति बनवाई थी। महान् ब्रिटिश कवि अलेक्जेंडर पोप ने निम्नलिखित पंक्तियों में अपनी भावनाएं व्यक्त की थीं:

’नेचर एंड नेचर्स ला, ले हाइड इन नाइट।

गाॅड सैड ’लैट न्यूटंस बी। एंड आॅल वाॅज लाइट।’

न्यूटन अपने स्कूलकालीन जीवन में ही यांत्रिक रचनाएं करने लगे थे। जाहिर है कि प्रतिभा अपना चमत्कार दिखाने के लिए किसी खास उम्र का इंतजार जो नहीं करती।

बीस वर्ष की उम्र में न्यूटन ने प्रिज्म द्वारा प्रयोग करके प्रकाश का स्वरूप और स्वभाव पता कर लिया था। न्यूटन ने प्रयोग द्वारा साबित कर दिया था कि श्वेत प्रकाश का विघटन सात रंगों में होता है तथा विभिन्न रंगों वाली किरणें विभिन्न कोणों पर नीचे की तरफ झुकती हैं। प्रिज्म द्वारा उन सात प्रकार के रंगों वाली किरणों को मिलाकर इन्होंने पुनः श्वेत रंग दर्शा दिया था।

गैलिलियो द्वारा निर्मित दूरबीन से न्यूटन को तसल्ली नहीं थी। उसने एक नई प्रकार की दूरबीन की शोध की। दूरबीन का यह स्वरूप आज भी मान्य है। न्यूटन द्वारा स्थापित प्रकाश विश्लेषण के सिद्धांत वर्तमान खगोल शास्त्र में आज तक शोधकार्य हेतु प्रयुक्त किए जा रहे हैं।

सन् 1665 से 1667 तक न्यूटन को अपने ग्राम वूल्सहोर्प में रहना पड़ा था। इस कालखंड में न्यूटन ने प्रकृति के रहस्यों का अध्ययन खूबी से किया था। यही वह समय था, जब न्यूटन ने गुरुत्वाकर्षण विषयक अपने उन नियमों की शोध की थी जो आज भी वर्तमान विज्ञान को दिशा दिखाने का कार्य कर रहे हैं। न्यूटन की शोध पर ही आइन्स्टीन ने अपने सापेक्षता के सिद्धांत की रचना की थी। गुरुत्वाकर्षण का ज्ञान गैलिलियो को था, लेकिन न्यूटन की विशिष्टता यही है कि इन्होंने प्रत्येक समस्या गणितीय समाधान द्वारा समझाया। वृक्ष से गिरते हुए सेब को देखकर यह महज सोच करके ही नहीं रह गए थे, बल्कि इन्होंने सेब के गिरने की गति संबंधी अवधारणा भी दर्शाई थी।

’न्यूटन के साथ ही मानवीय ज्ञान यांत्रिकी के युग में और मजबूती को प्रवेश करता नजर आता है।’ न्यूटन के विषय में कहा गया यह कथन उनकी महानता को बेहद खूबी से बयान कर देता है। वैसे साधारण शब्दों में कहा जाए तो न्यूटन द्वारा तीन प्रकार की महान् खोजें की गई थीं। उनमें प्रकाश विषयक नियम, द्रव स्थिति एवं गुरुत्वाकर्षण विषयक नियम डिफरेंशियल कैल्कुलस नियम शामिल रहे हैं। इसी समय यूरोप में लैबनीज ने भी इस दिशा में कार्य किया था। लैबनीज कुछ समय न्यूटन के साथ कार्य करता रहा था। एक ही गणितीय विषय पर दोनों ने कार्य किया था। लेकिन न्यूटन का कार्य लैबनीज से पहले ही सामने आ गया था। लेकिन यह तो स्वाभाविक ही था कि दोनों गणितज्ञों में से किसने पहले शोध सामने रखी यह जाना जाए। न्यूटन को इसका प्राथमिक श्रेय दिया गया था। लेकिन न्यूटन ने यह कह कर बड्डपन दर्शाया था कि लैबनीज ने अपना कार्य सरल पद्धति के साथ प्रस्तुत किया था।

न्यूटन ने पृथ्वी का आकार और चंद्रमा पर उसकी आकर्षण शक्ति का लगभग सटीक मूल्यांकन किया था। इस घटना के बीस वर्ष बाद सन् 1687 में प्रसिद्ध खगोल शास्त्री हैली न्यूटन के पास आया और उसने ग्रहों के मार्ग के बारे में संदेह व्यक्त किया। लेकिन न्यूटन ने हैली को भरोसा दिया कि उनका पक्ष वृत्ताकार न होकर अंडवृत्ताकार ही हैं। इस मुलाकात के दरम्यान हैली ने न्यूटन को इस बात के लिए तैयार कर दिया था कि वह अपनी पुस्तक पिं्रसिपिया को प्रकाशित करा दे। इस तरह न्यूटन की अति महत्वपूर्ण शोध को दुनिया के सामने आने का अवसर मिला।

लेकिन ढके छिपे तौर पर न्यूटन में अध्यात्म भी सांस ले रहा था। 44 वर्ष की उम्र के पश्चात् न्यूटन ने पसंदीदा गणित विषय में रुचि लेना बंद कर दिया और वह बाइबिल की तरफ झुक गए थे।

जिस गुरुत्वाकर्षण के सिद्धांत को न्यूटन को समस्त दुनिया के सामने तार्किक रूप से गणितीय व्याख्या के आधार पर प्रदर्शित किया था, उसका शोधकर्ता बेहद विनम्र और सरल हृदय व्यक्ति भी था। ’’मैं एक बालक की भांति समुद्र तट पर पत्थरों और सीपियों को बटोरने का काम करता रहा हूं, जिनके साथ मैं खेलता भी रहा हूं। लेकिन सत्य का अथाह सागर मेरे सामने अज्ञात है और मैं एक बूंद सत्य ही जान पाया हूं।’’

न्यूटन की यह स्वीकृति दर्शाती है कि प्रकृति, जो कि ईश्वरीय रचना है, उसके बारे में भी मानव बेहद संक्षिप्त जानकारी ही रखता है। लेकिन सामान्य तौर पर देखा जाए तो इंसान को अपने ज्ञान का और अपनी सत्ता का बेहद अंहकार है। लेकिन न्यूटन ने अपने शोधकार्याें से बड़ा सत्य यही बताया है कि इंसान ईश्वरीय सत्ता के आगे सदैव बौना ही साबित होगा।


 

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