Ajgaibinath Temple History in Hindi : अजगैबीनाथ मंदिर : Ajgaibinath Mahadev Temple

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Ajgaibinath Temple History in Hindi

Ajgaibinath Temple History in Hindi : अजगैबीनाथ मंदिर


भारत के बिहार राज्य के भागलपुर जिला में स्थित एक ऐतिहासिक स्थल है। यह गंगानदी के तट पर बसा हुआ है। यहाँ बाबा अजगबीनाथ का विश्वप्रसिद्ध प्राचीन मन्दिर है। उत्तरवाहिनी गंगा होने के कारण सावन के महीने में लाखों काँवरिये देश के विभिन्न भागों से गंगाजल लेने के लिए यहाँ आते हैं।

सावन के अलावा अन्य महीनों में भी अजगैबीनाथ के दर्शन के लिए तीर्थ यात्रियों जिज्ञासुओं का दल बराबर बड़ी संख्या में पहुँचता रहता है।

‘हर-हर महादेव’ की ध्वनि चारों ओर सुनाई देती है। अजगैबीनाथ मंदिर बीच गंगा में एक पहाड़ी के रूप में अवस्थित है। यह दूर से देखने पर अत्यंत मनोहारी लगता है—पानी में तैरते हुए एक जहाज के समान

आनंद रामायण के अनुसार सुल्तानगंज का नाम पहले ‘गंगापुरी’ था और अजगैबीनाथ उस समय ‘बिल्वेश्वर’ कहलाते थे। भगवान रामचंद्रजी राज्याभिषेक के कुछ दिनों के बाद अपनी पत्नी एवं भाइयों सहित तीर्थाटन करने अयोध्या से यहाँ पधारे थे। सुल्तानगंज से गंगाजल लेकर भगवान राम वैद्यनाथ धाम मंदिर में आए और उन्होंने वहां बैठकर जलसंकल्प किया। यह स्थान ‘रामचौरा’ कहलाता है।

तेरहवीं सदी से सुल्तानों का शासन रहने के कारण इसका नामकरण सुल्तानगंज हुआ। इतिहासकारों के कथनानुसार प्रसिद्ध चीनी यात्री ह्वेनसांग ने सुल्तानगंज की यात्रा की थी। इसी स्थान से महापंडित राहुल सांकृत्यायन ने कभी ‘गंगानामक मासिक पत्रिका का संपादन किया था।

यहाँ का जल शिवलिंग पर चढ़ाने का माहात्म्य पुराणों में वर्णित है। सुल्तानगंज में स्नानार्थियों की अतिशय भीड़ को देखकर सरकार ने वहाँ पर एक पक्का घाट बना दिया है, जो ‘काँवर घाट’ कहलाता है। यह स्थान भागलपुर से करीब 25 कि.मी. पश्चिम में है। यहाँ पर गंगा उत्तरवाहिनी बहती हैं। गंगा की धारा इन दिनों तेज रहती है। यहीं पर बीच में खिलौने जैसी पहाड़ी दिखलाई पड़ती है, जिसपर अजगैबीनाथ शिव) का मंदिर है। कहा जाता है कि पुराने समय में इसी स्थान पर महर्षि जद ने आश्रम बनाया था। उन्हीं के नाम पर पहाड़ी का नाम ‘जहुगिरि’ पड़ हैं गया। कालांतर में यह ‘जहाँगीरा’ कहलाने लगा।

विदेशी पर्यटक इस पहाड़ी को ‘जहाँगीर रॉक’ कहकर पुकारने लगे। साधु संतों तथा साधकों का तो यह आराधनास्थल बन गया है। आज भी भारत के कोने कोने से ऐसे संत यहाँ पधारते हैं।

इस मंदिर के निर्माण संबंधी कुछ दंतकथाएँ प्रचलित हैं। एक कथा प्रसंग के अनुसार , लगभग चार सौ वर्ष पूर्व सुल्तानगंज में हरनाथ भारती तथा केदार भारती नामक दो संन्यासी रहते थे। दोनों गुरुभाई थे। महात्मा हरनाथ भारती प्रतिदिन गंगा स्नान करके बाबा वैद्यनाथ की पूजा करने देवघर आते थे।

एक दिन गंगा जल लेकर जब वे सुल्तानगंज से देवघर (बाबाधामचले तो मार्ग में एक ब्राह्मण से भेंट हो गई। संन्यासी के हाथ में जल देखकर प्यासे ब्राह्मण ने जल पिला देने की कातर प्रार्थना की। बाबा हरनाथ भारती प्यासे ब्राह्मण की वाणी को सुनकर द्रवित हो गए और ज्यों ही जल पिलाने को तैयार हुए कि शिव स्वयं प्रकट हो गए और बोले, मैं तुम्हारी भक्ति-भावना से खुश हूं। तुम जहाँ ध्यान करते हो, उसी स्थान में मृगचर्म के नीचे शिवलिंग मिलेगा।”

और भक्तों के लिए भगवान खुद सुल्तानगंज उत्तरवाहिनी गंगा के पास आ गए। जहाँ आएवहीं पर अजगैबीनाथ का मंदिर बना। शिवलिंग प्रकट हुआ और जल लेकर देवघर जाने के पहले काँवरियों के लिए अजगैबीनाथ शिवलिंग की पूजा-अर्चना एक महत्त्वपूर्ण विधान बन गया।

एक अन्य कथा के प्रसंग में आदिकाल में मंदिर के कोई महंत अजगैबीनाथ मंदिर से देवघर मंदिर को जोड़नेवाले भूगर्भीय मार्ग से प्रतिदिन जल चढ़ाने आया करते थे। उस रास्ते का पता लगाने की कोशिश आधुनिक इंजीनियरों ने बहुत की, लेकिन सफल नहीं हो सके। भूगर्भय मार्ग का मंदिर के पास खुलनेवाला दरवाजा आज भी मौजूद है।

कहा जाता है कि औरंगजेब के जमाने में उसके अधीनस्थ किसी मंत्री या सिपहसालार ने अजगैबीनाथ मंदिर को तोड़ने की योजना के साथ सुल्तानगंज की यात्रा की थी और मंदिर के तत्कालीन पुजारी ने उससे आग्रह किया था कि खुद औरंगजेब का आदेश है कि इस मंदिर को हाथ तक नहीं लगाया जाए।

“लेकिन मेरे पास कोई आदेश नहीं। तुम झूठ बोलते हो।” मंत्री ने आशंका बदले में पुजारी मंदिर आए, भगवान शंकर को स्मरण किया और अगले क्षण औरंगजेब के दस्तखत के साथ सामने ताम्रपत्र मौजूद था, जिसपर मंदिर को

हाथ नहीं लगाने का आदेश अंकित था। मंत्री अपनी फौज के साथ वापस लौट गया। शिव की यह महिमा देखकर भक्तगण अभिभूत हो गए।

कालक्रम में इस मंदिर की उत्कीर्ण नक्काशियों का अद्भुत सौंदर्य हमारा ध्यान सबसे पहले चौथी सदी की ओर ले जाता है, जिसमें महत्त्वपूर्ण है शेषशय्या पर विराम की मुद्रा में विष्णु पुरातत्ववेत्ताओं की नजर में यह अति विशिष्ट कोटि की कला है और इसे गुप्तकाल के उत्तरार्द्ध का समझा जाता है। अन्य उत्कीर्ण आकृतियों में गंगा महारानी जाह्नवी ऋषि की आकृतियाँ महत्त्वपूर्ण हैं।

किंवदंती के अनुसार, भागीरथी अपनी तपस्या के बल पर पतित पावनी गंगा को इस धरती पर लाए। भगीरथ के रथ के पीछे दौड़ती गंगा सुल्तानगंज पहुँची तब पहाड़ी पर स्थित जहु मुनि के आश्रम को बहाकर ले जाने पर तुल गई। इससे मुनि क्रोधित हो गए और अपने तपोबल से गंगा को चुल्लू में उठाकर पी गए।

अंतत: भगीरथ के बहुत अनुनयविनय करने पर मुनि पिघले और अपनी जंघा चीरकर गंगा को बाहर निकाल दिया। मुनि की जंघा से प्रकट होने के कारण गंगा का एक नाम ‘जाह्नवी’ भी पड़ा।

आज भी यहाँ पर माघ पूर्णिमा के अवसर पर भारी मेला लगता है। इस दिन हजारों नर-नारियाँ गंगा में स्नान करके अजगैबीनाथ मंदिर में दर्शनपूजन करते हैं। यात्रियों की सुविधा के लिए वासुकिनाथ में पर्यटक सूचना केंद्र की स्थापना हो
गई है।

सुल्तानगंज कभी बौद्धों का तीर्थस्थान रहा है। अजगैबीनाथ पहाड़ी पर जिस परिमाण में हिंदू देव-देवियों की प्रस्तर प्रतिमाएँ प्राप्त हुई हैं, उसी परिमाण में बौद्ध प्रतिमाएँ भी मिली हैं। ईंट के बने प्राचीन मंदिर के भग्नावशेषशिवलिंग एवं शिलालेख भी मिले हैं। मूर्तियों में उमा-महेश्वरहरिहरचतुर्भुज विष्णुवराह परशुराम,सूर्य, गणेश आदि हैं।

बौंसी कॉलेज भागलपुर के प्रो. अमरेंद्रजी से जब इन पंक्तियों के लेखक ने चर्चा की, तो वे बोले‘‘बाबा अजगैबीनाथ मंदिर में सुबह-शाम पूजा के समय घंटे-घड़ियाल, डमरू, नगाड़े आदि बहुत देर तक बजते रहते हैं। उनकी ध्वनियाँ एकांत पहाड़ी से बड़ी मधुर निकलती हैं।”

यह पहाड़ी संपूर्ण भारत में सचमुच निराली है। इसके दर्शन के लिए यात्रियों को नाव का सहारा लेना पड़ता है। इसने सुल्तानगंज की ख्याति को दूर-दूर तक फैला दिया है। उत्तरवाहिनी गंगा और इस पहाड़ी के चलते सुल्तानगंज इतना
-तथा आकर्षक प्रतीत हुआ कि यहाँ बौद्धों ने भी प्राचीन काल में विहारस्तूप बनवाए

मूर्तियाँ निर्मित या स्थापित कीं। जिससे पुण्य की उपलब्धि और कामनाओं की सिद्धि यहाँ बराबर होने लगी।

आज अजगैबीनाथ मंदिर में स्नान करके जल व बेलपत्र चढ़ाने का नियम है। यहाँ तक कि मंदिर के भीतर प्रवेश भी स्नान करके ही करना चाहिए।

भागलपुरनिवासी एक महिला (किरण सहाय आकाशवाणी स्टाफ) ने मुझसे एक विस्मयकारी घटना का उल्लेख किया था। एक बार वे मंदिर में बिना नहाए प्रवेश कर गई। मंदिर में हाथ में पूजन-सामग्री लिये खड़ी हो गईं और मूर्ति की ओर लगी निहारने। , सामने कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा था पुजारी ने उसे पूजा करने को कहालेकिन वह मूक बनी रही।

जब दूसरी बार वह परिवार के सदस्यों के साथ स्नान करके मंदिर में गई तो सब कुछ ठीक था। उसने पूजा की और मंदिर के पुजारी से यह रहस्य पूछा। पुजारी निरुत्तर था। उसे यही अहसास होता है कि पहली बार उसने स्नान नहीं किया था और परिवार के सदस्य को, यह पूछने पर कि स्नान कर चुकी हो, उसने हामी भर दी थी। आज इस मंदिर में आंखों से मूर्तियाँ नहीं दिखाई पड़तीं, यह रहस्य ही लगता है।

अजगैबीनाथ की गणना भारत के प्रसिद्ध तीर्थों में की जाती है। अहर्निश तीर्थ यात्रियों की उमड़ती हुई भीड़ इस सुनसान स्थान को कोलाहलमय बना देती है। यह स्थान केवल सावन में कांवरियों के कारण ही नहीं हर पूर्णिमा,  संक्रांति, ग्रहण आदि अवसरों पर स्नानार्थियों का मेला-सा लगा रहता है।

शिवरात्रि के अवसर पर भी दर्शनार्थियों की भीड़ जुटती है तथा इस दिन यहाँ मेला लगता है। वर्षपर्यत जिज्ञासुओंअन्वेषकों की वजह से यहाँ का जन जीवन सदा आंदोलित रहता है।


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