Amarnath Temple in Hindi : Amarnath Temple History in Hindi

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Amarnath Temple in Hindi

भारत अनेक धर्मों वाला देश है। समय-समय पर यहाँ मंदिरों का निर्माण होता रहा है और तीर्थस्थलों की स्थापना की जाती रही है। आदिगुरु ने भारत की चारों दिशाओं में चार तीर्थों की स्थापना की। इन तीर्थों की स्थापना से भारत की एकता और अखंडता की भावना को प्रोत्साहन मिलता रहा है।

द्वारका, रामेश्वरम् और जगन्नाथपुरी समुद्रतटीय तीर्थ हैं, तो केदारनाथ, बदरिका-आश्रम, कैलाश मानसरोवर और अमरनाथ पर्वतीय तीर्थ हैं।

इनमें से कुछ हिमालय की ऊँची चोटियों पर स्थित हैं तो कुछ हिमालय की घाटियों में। इन तीर्थों की यात्रा कठिन और समयसाध्य व श्रमसाध्य है। किंतु जिनके मन में श्रद्धा और आस्था है, उनके लिए कुछ भी कठिन, दुर्गम और कष्टकर नहीं है।

Amarnath Temple in Hindi


 

Where is Amarnath Temple : अमरनाथ मंदिर कहाँ है 

अमरनाथ गुफा एक हिन्दू तीर्थ स्थान है जो भारत के जम्मू कश्मीर में स्थित है। अमरनाथ गुफा श्रीनगर से 3,888 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है, अमरनाथ की तीर्थयात्रा भी कठिन, दुर्गम और कष्टसाध्य है, फिर भी पर्वत श्रृंखला लिदर घाटी के अंतिम छोर पर सँकरे दर्रे में स्थित अमरनाथ गुफा में प्रकृति द्वारा स्वत: निर्मित शिवलिंग के दर्शनों के लिए तीर्थयात्रियों को पहलगाँव से 48 कि.मी. के बर्फीले, पथरीले, ऊबड़-खाबड़ मार्ग से गुजरना पड़ता है। फिसलन भरे सैंकरे रास्ते पर उन्हें पैदल ही चलना पड़ता है।

All Information about Amarnath Temple :

अमरनाथ की गुफा लगभग 100 फीट लंबी, 150 फीट चौड़ी और 15 फीट ऊँची एक प्राकृतिक गुफा है। गुफा में हिमपीठ पर बर्फ से निर्मित शिवलिंग कभी- कभी अपने आप स्वत: 7 फीट ऊंचा हो जाता है। आश्चर्य की बात यह है कि यह शिवलिंग कभी भी पूर्ण रूप से विलीन नहीं होता। शिवलिंग के अलावा हिमनिर्मित एक गणेशपीठ और पार्वतीपीठ भी है।

इस गुफा के साथ कई आश्चर्यजनक और चामत्कारिक बातें जुड़ी हैं। लिंगपीठ (हिमनिर्मित चबूतरा) ठोस है, जबकि गुफा के बाहर कई मील तक कच्ची बर्फ दिखाई देती है। गुफा में हमेशा बूंद – बूंद जल टपकता रहता है। यहाँ सफेद भस्म जैसी मिट्टी मिलती है। इस मिट्टी को भक्तजन प्रसाद के रूप में ग्रहण करते हैं।

गुफा के अंदर तीर्थयात्रियों को कबूतरों की आवाज सुनाई पड़ती है। यद्यपि ये कबूतर दिखाई नहीं पड़ते, लेकिन उनकी आवाज से उनकी उपस्थिति का अनुभव होता है। इस संबंध में कहा जाता है कि भगवान शिव जब पार्वतीजी को अमरकथा सुना रहे थेतब एक जोड़ा कबूतर चुपचाप यह कथा सुना करता था।

Amarnath Temple History in Hindi : अमरनाथ मंदिर का इतिहास

अमरनाथ गुफा की खोज के संबंध में जो प्रकाश में आई है वह बात सांप्रदायिक एकता का एक उदाहरण है। इस गुफा की खोज बूटा मलिक नामक एक मुसलमान गड़ेरिये ने की। कहा जाता है कि एक साधु ने मलिक को कोयले से भरी एक बोरी दी। घर पहुँचकर मलिक ने जब उस बोरी को खोला तो उसमें ढेर सारा सोना देखकर चकित रह गया। वह उस साधु की खोज में निकला, लेकिन वह साधु नहीं मिला। जिस जगह साधु मिला, उस जगह उसने एक गुफा देखी।

उस गुफा के अंदर वह चला गया और वहाँ शिवलिंग के दर्शन किएआज भी जो चढ़ावा या दान यहाँ एकत्र होता है, उसका एक हिस्सा मलिक के वारिसों को मिलता है और शेष प्रबंध समिति ट्रस्ट को।

Amarnath ki Katha : अमरनाथ मंदिर की पौराणिक कथा

अमरनाथ गुफा के साथ एक पौराणिक कथा जुड़ी हुई है। कहा जाता है कि एक बार पार्वतीजी ने भगवान शिव से तंत्र-मंत्र-यंत्र के बिना ही मुक्ति-प्राप्ति का उपाय जानना चाहा। भगवान शिव ने पार्वतीजी को इसी गुफा में वह अमरकथा सुनाई, जिससे मनुष्य को आत्मज्ञान हो जाता है और उसे असहज ही मुक्ति मिल जाती है। व्यास पूर्णिमा (गुरु पूर्णिमा-आषाढ़ पूर्णिमा) के दिन यह कथा आरंभ हुई और एक माह बाद श्रावण पूर्णिमा के दिन समाप्त हुई। इसीलिए श्रावण पूर्णिमा
को अमरनाथ गुफा में धर्मविधान के अनुसार भगवान शिव की पूजा-अर्चना की जाती है।

Amarnath Temple Yatra : अमरनाथ की यात्रा

तीर्थयात्रियों के लिए अमरनाथ गुफा वर्ष भर खुली रहती है। किंतु तीर्थयात्री 15 जुलाई से अगस्त के अंत तक ही यहाँ जाते हैं।

छड़ी मुबारक यात्रा – अमरनाथ यात्रा को ‘छड़ी मुबारक यात्रा’ भी कहा जाता है। बल्लम-युक्त लकड़ी अथवा बाँस की नुकीली छड़ी उठाए हुए कश्मीरी महंत इस यात्रा का मार्गदर्शन करते हैं। आषाढ़ शुक्ल द्वादशी को ब्राह्ममुहूर्त में छड़ी
मुबारक यात्रा आरंभ होती है। यह यात्रा जम्मू के श्री रघुनाथ मंदिर से निकलती है। यात्रा के प्रथम पड़ाव पहलगाम से पवित्र छड़ी मुबारक यात्रा शुरू होती है।

यात्रा का पहला पड़ाव पहलगाम है। सभी यात्रियों को जम्मू में यात्रा पर जाने के लिए पंजीकरण कराना पड़ता है। जम्मू रेलबस और हवाई मार्ग द्वारा देश के सभी भागों से जुड़ा हुआ है। पहलगाम श्रीनगर से 60 कि.मी. दूर है। पहलगाम
से पवित्र गुफा तक का मार्ग प्राकृतिक सुषमा से मंडित है। मार्ग में बर्फीली घाटियाँ, जलप्रपात, हिमाच्छादित सरोवर और उससे निकलने वाली नदियाँ हिम-निर्मित नदी, पुल, पर्वतमालाएँ सबकुछ मोहक, मंत्रमुग्ध कर देनेवाला प्राकृतिक सौंदर्य
मिलता है।

लिद्दर नदी के तट पर बसे इस छोटे से कस्बे में ठहरने के लिए होटल और सरकारी विश्राम घर उपलब्ध हैं। यात्रियों को भारी ऊनी कपड़े, मंकी कैप, बरसाती छाते, घड़ी, टॉर्च, मोमबत्ती, पोलीथिन बैग तथा जलपान के लिए कुछ वस्तुएँ पास रख लेनी चाहिए। यहाँ कुछ जरूरी सामान मिल जाते हैं। सरकारी रेट पर टेंट, पोनी (घोड़ा) मिल जाते हैं।

श्रावण पूर्णिमा से तीन दिन पूर्व पवित्र छड़ी कश्मीरी संतों के नेतृत्व में जिनके हाथों में पवित्र छड़ी होती है, यात्री साधु-संतों की टोलियों के साथ अगले पड़ाव चंदनबाड़ी की ओर चल पड़ते हैं। रास्ते में ढोल, ढमकों दूँदुभियों और महादेव के जयघोष से वातावरण गूंजता रहता है।

पहलगाम से सोलह कि.मी. दूर चंदनबाड़ी यात्रा का दूसरा पड़ाव है। यह 9,500 फीट की ऊँचाई पर पहाड़ी नदियों के संगम पर एक मनोरम घाटी है। यहाँ लिद्दर नदी पर बनने वाला बर्फ का पुल आकर्षण का केंद्र है। चंदनबाड़ी तक अब
मोटर, जीप अथवा ट्रक से भी जाया जा सकता है। घोड़े भी मिलते हैं, किंतु श्रावणी पूर्णिमा को जाने वाले यात्री पैदल ही जाना पसंद करते हैं। चंदनबाड़ी की चाँदनी रात बड़ी सुहावनी होती है। रात को दशनामी अखाड़े में आरती पूजा होती है

चंदनबाड़ी में खाने-पीने और विश्राम की समुचित व्यवस्था है। काफी बड़ी संख्या में तंबू लगा दिए जाते हैं। यात्रियों को बिछाने-ओढ़ने के सामान उपलब्ध हो जाते हैं। खानेपीने की दुकानें तो हैं ही, इसके अलावा समाजसेवी संस्थाओं द्वारा लंगर भी चलाए जाते हैं। सवारी के लिए पिट्टू और पोनी भी मौजूद रहते हैं। चंदनबाड़ी से बर्फ के पुल को तेज गति से पार करना पड़ता है, ताकि बर्फ पिघलने न लगे

थोड़ी दूर चलने के बाद शुरू हो जाती है पिस्सू घाटियों की दुर्गम चढ़ाई, यात्रियों को ऊँचे-ऊँचे पहाड़ों की खड़ी चढ़ाई का मार्ग पार करना पड़ता है। कठिन चढ़ाई वाले इस मार्ग पर आगे बढ़ते हुए ‘बाबा अमरनाथ की जय’ के घोष के साथ यात्री समुद्रतल से 14000 फीट ऊंचे पिस्सू टॉप तक पहुँच जाते हैं।

यहाँ ऑक्सीजन की कमी महसूस होने लगती है, जिसके कारण सांस फूलने लगती है। इस संकट से यात्रियों को उबारने के लिए मेडिकल कैंप लगाए गए हैं। पिस्सू टॉप पहुँचकर थोड़ा विश्राम करने के बाद चंदनबाड़ी से शेषनाग 12 कि.मी. है।

शेषनाग झील के नीले जल पर बर्फ की हलकी परत है। इसके पीछे और दोनों ओर पर्वतीय ढलानों के हिमपुंज पर जब सूर्य की किरणें चमकती हैं तो यह दृश्य बड़ा ही मनमोहक होता है। 12,000 फीट की ऊँचाई पर बर्फ के शिखरों के बीच स्थित यह सरोवर संसार के सर्वश्रेष्ठ सरोवरों में एक है। झील के जल पर ब्रह्मा विष्णु नामक हिममंडित पर्वत-श्रेणियों का प्रतिबिंब बड़ा ही मनोहारी लगता है। कहते हैं, भगवान शिव ने पार्वतीजी को अमरकथा सुनाने के बाद शेषनाग को
इसी झील में ठहरा दिया था प्रहरी के रूप में

शेषनाग से पंचतरणी के लिए प्रस्थान करने पर सीधी चट्टानों की मुश्किल चढ़ाई शुरू हो जाती है। यात्री इस दुर्लभ चढ़ाई को पार करते-करते इस यात्रा की सबसे ऊँची चोटी महागुनाल दरें (14500 फीट) पर पहुँच जाते हैं। यहाँ यात्रियों के विश्राम के लिए पर्यटन विभाग द्वारा टेंट लगे रहते हैं। सुबह होते ही यात्री भगवान शिव के दर्शन करने के लिए अमर गुफा की ओर चल पड़ते हैं।

अमरनाथ गुफा के पास यात्रियों के ठहरने की कोई व्यवस्था नहीं है। बर्फ के बने 2 कि.मी. लंबे पुल को पार करने के बाद यात्री अमरनाथ में स्नान करते हैं। और प्रसाद आदि लेकर गुफा के अंदर प्रवेश करने के लिए पंक्तिबद्ध खड़े हो जाते हैं। उस समय आसपास का वातावरण ‘बाबा अमरनाथ की जय, ‘बम-बम भोले’ के जयघोष से प्रतिध्वनित हो उठता है।

पवित्र गुफा में 10-12 फीट लंबा शिवलिंग ठोस बर्फ से निर्मित है। व्यास पूर्णिमा के दिन पूरे शिव परिवार (पार्वतीजी गणेशजी) के दर्शन होते हैं।

श्रावण पूर्णिमा को यह यात्रा समाप्त होती है। इस दिन से शिवलिंग का आकार घटने लगता है और भाद्र अमावस्या को अदृश्य हो जाता है। यात्री यहाँ की सफेद मिट्टी को भस्म के रूप में माथे पर लगाते हैं और गुफों के अंदर बूंद -बूंद करके टपकने वाले अमर जल को प्रसाद के रूप में ग्रहण कर अपने-अपने घरों को लौट जाते हैं।


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