Amartya Kumar Sen Biography in Hindi : अमत्र्य कुमार सेन का जीवन...

Amartya Kumar Sen Biography in Hindi : अमत्र्य कुमार सेन का जीवन परिचय

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Amartya Kumar Sen Biography in Hindi

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Amartya Kumar Sen Biography in Hindi

अमत्र्य कुमार सेन का जीवन परिचय


अमत्र्य कुमार सेन का जन्म 3 नवंबर, 1993 को गुलाम भारत की अवस्थिति में शांति निकेतन कोलकाता में हुआ था, जो आज पश्चिम बंगाल राज्य का भू-भाग हैं। इनके पिता का नाम आशुतोष सेन एंव माता का नाम श्रीमती अमिता सेन था।

पिता आशुतोष सेन बर्मा में रह चुके थे। इस कारण जन्म के पश्चात् अमत्र्य कुमार सेन भी पिता के पास बर्मा चले गए थे। बर्मा के मांडले नगर में अमत्र्य कुमार को महज 3 वर्ष की कच्ची उम्र में ही विद्यालय भेजा जाने लगा। 3 वर्ष पश्चात् पिता आशुतोष सेन को ढाका विश्वविद्यालय में रसायन विज्ञान का प्राध्यापक नियुक्त किया। अतः वे सपरिवार बर्मा से ढाका चले आए। ढाका आने के पश्चात् अमत्र्य कुमार को सेंट ग्रेगरी विद्यालय में प्रवेश दिलवाया गया।

कुछ समय बाद आशुतोष सेन कोलकाता के शांति निकेतन में अध्यापन कार्य करने लगे और अमत्र्य कुमार ने भी वहां पर अध्ययन कार्य किया। तब शांति निकेतन की शिक्षा का स्तर बेहद उन्नत था। यहां बच्चों की नैसर्गिक प्रतिभा को तराशने पर अतिरिक्त जोर दिया जाता था। पाठ्यक्रम में भारतीय संस्कृति और वैज्ञानिक विषयों को शामिल किया गया था। विश्व में विज्ञान के क्षेत्र मे जो अन्वेषण हुए थे, उन्हें शांति निकेतन के बच्चों को विस्तार से समझाया जाता था। उस समय भारत अंगे्रजो का गुलाम था। भारत में सांप्रदायिक अलगाववाद की भावनाा भी पनप चुकी थी। अंगे्रज अपने स्वार्थ के लिए हिंदू-मुस्लिम वर्गों को लड़ा कर प्रसन्न हुआ करते थे।

गुरू रवींद्रनाथ टैगोर की मृत्यु के पश्चात् बंगाल में भी सांप्रदायिक हिंसा भड़क उठी । उस समय अमत्र्य कुमार की उम्र महज 10 वर्ष ही थी। एक स्थान पर उस हिंसा का विवरण देते हुए अमत्र्य कुमार ने लिखा हैं, ‘मैंने ढाका मेें दोपहर के वक्त एक मुस्लिम मजदूर ‘कादर’ को अपने घर में दाखिल होते देखा। वह रक्त में डूबा हुआ था, उसकी पीठ में किसी ने छुरा घोंप दिया था। वह बेचारा बेहद गरीब था। दिनभर कड़ी मेहनत करता था, तब कहीं जाकर उसके घर का चूल्हा जलता था। सांप्रदायिक हिंसा के कारण उसकी आजीविका संकट में आ गई, क्योंकि अंग्रेजी हुकूमत ने यह आदेश निकाला था कि हिंदू और मुस्लिम अपने-अपने इलाकों में ही रहेें। वे एक दूसरे के क्षेत्र में न जाएं। दोनों संप्रदायों के लोग परस्पर एक दूसरे के रक्त के प्यासे हो रहे थे। इस हालत में उस मजदूर कादर का परिवार भूख से तपड़ने लगा। अतः उसे अपनी जिंदगी खतरे में डालकर हिंदुओं के मोहल्ले में जाना पड़ा। वह वहां मजदूरी करने के मकसद से गया था। किंतु दंगाइयों ने उसकी पीठ में छुरा घोंप दिया था। मेरे पिता उसे अस्पताल ले जाने लगे। तब उसने कहा था कि मेरे घरवालों को सावधान कर देना कि वे अपना मोहल्ला छोड़कर दूसरे के मोहल्ले में न जाए, वरना उनका भी वही अंजाम होगा जो मेरा हुआ है।’

अस्पताल पहुंचने के बाद उसकी मौत हो गई। उसकी मौत के पश्चात् अमत्र्य कुमार के जेहन में दो बातें बारंबार उठ रही थी। प्रथम तो यह कि धूर्त अंगे्रजों ने सांप्रदायिकता की राजनीति को अपना मोहरा बना लिया था और दूसरी यह कि देशवासियों का जीवन आर्थिक स्वतंत्रता के बिना सुरक्षित नहीं है। आत्मनिर्भरता के बिना आजादी का कोई आशय नहीं है। देश के उस माहौल को देखकर अमत्र्य कुमार ने यह इरादा किया कि मैं मनुष्य की आर्थिक आजादी के लिए ठोस कार्य करूंगा। शांति निकेतन से अपनी शिक्षा पूर्ण करने के पश्चात् इन्होंने सन् 1951 में प्रेसीडेंसी महाविद्यालय में दाखिला लिया। यह महाविद्यालय उस समय विभिन्न प्रतिभाओं से युक्त था। प्रत्येक अध्यापक अपने विषय मंे विशिष्ट प्रतिभा संपन्न था।

वे विद्यार्थियों को विद्या के प्रति जागरूक करते थे। इस महाविद्यालय में अमत्र्य कुमार के आने का लक्ष्य यह भी था कि वे अर्थशास्त्र के क्षेत्र में दक्षता प्राप्त करना चाहते थे। यही उनकी जिंदगी का स्वप्न था। उस महाविद्यालय के ज्यादातर विद्यार्थी राजनीति में पूर्ण रूचि रखते थे, ंिकंतु राजनीति में अमत्र्य कुमार की कोई रूचि नहीं थी।

अमत्र्य कुमार का प्रमुख विषय भी अर्थशास्त्र ही था और इसके प्रति उनका विशिष्ट रूझान था। तब वे विचार किया करते थे कि किस प्रकार गरीब व्यक्ति आत्मनिर्भरता को प्राप्त होगा? कैसे वह भुखमरी की जिंदगी से पूर्ण मुक्ति पाएगा? अमत्र्य कुमार एक ऐसी अर्थव्यवस्था चाहते थे जिसके आर्थिक लाभों का कुछ भाग गरीबों को भी प्राप्त हो, ताकि वे झोंपड़ी में रहने के बजाय ईंट का पक्का आवास बनाकर उसमें रह सकें। लेकिन गुलाम देश के गरीबों के लिए तब ऐसी कल्पना करना ही मुश्किल था। वक्त परिवर्तित हुआ। अमत्र्य कुमार का झुकाव वामपंथी राजनीति की तरफ हो गया। सन् 1943 में बंगाल में जो दुर्भिक्ष पड़ा था, उसने अमत्र्य कुमार को बुरी तरह से आंदोलित किया था। उस अकाल में 25 लाख से भी ज्यादा लोग काल के गाल में समा गए थे। उनमें निम्न वर्ग के लोग सर्वाधिक थे। उस दुर्भिक्ष के पड़ने का एक खास कारण यह था कि अंगे्रजी सरकार की खाद्यान्न वितरण प्रणाली लचर थी। इस कारण वह मानते थे कि वह अकाल गरीब और श्रमिक विरोधी अर्थव्यवस्था का ही नतीजा था।

उस दौरान विश्व के अनेक अर्थशास्त्री विभिन्न प्रकार की आर्थिक नीतियों को तलाश रहे थे। उनका मकसद विकसित देशों को फायदा पहुंचाना ही था। इनके अतिरिक्त और भी ऐसे अनेक अर्थशास्त्री थे, जो विकासशील देशों के व्यापारियों की अर्थव्यवस्था को सुधारने में जुटे थे। कुछ ही अर्थशास्त्रियों का ध्यान गरीबों की आर्थिक स्थिति को सुधारने की ओर गया, किंतु पूर्वाग्रहों के चलते वे सीधे सच्चे सिद्धांतों तक नहीं पहंुच पा रहे थे। किंतु अमत्र्य कुमार ने ऐसे मजबूत उपाय तलाश लिए, जिनके द्वारा इंसान को कंगाली और गरीबी से मुक्ति प्रदान करवाई जा सकती हों। इन्होंने आगे चलकर विश्व अर्थव्यवस्था की तमाम अच्छाईयों व बुराईयों को देखा।

इस आधार पर इन्होंने यह सारांश निकाला था, ‘विश्व के समृद्ध देश और वहां के संपन्न लोगांे पर अपनी अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाए रखने की धुन सवार है। किंतु विकासशील देशों में जहां लोग गरीबी से आक्रांत हैं, उन पर किसी का ध्यान नहीं जाता। विश्व में करोड़ों ऐसे लोग हैं, जिनकी जिंदगी अभावों व दुखों से घिरी है। भारत में ऐसे लोगों की संख्या चिंता की हद तक है। इतिहास इस बात का साक्षी है कि बाहर से आए विदेशी शासकों एंव स्वदेशी शासकोें ने ही आम प्रजा को दयनीय स्थिति में पहुंचाया है। इसी कारण गरीबी मिटाने की मुहिम में आज भी मुश्किलें अनुभव हो रही हैं। आर्थिक मजबूरी प्रजा के कंधों पर बुरी तरह से सवार हो रही है। गरीबी का दंश इतना गहरा है कि कुछ कर दिखाने का हौंसला और जोखिम उठाने की प्रवृत्ति का ही लोप हो चुका है।’

अमत्र्य कुमार सेन ने 1953 में प्रेसीडेंसी महाविद्यालय से अर्थशास्त्र में स्नातक की उपाधि प्राप्त की। उसके पश्चात् वे उच्च शिक्षा हेतु इंग्लैंड गए। वहां कैंब्रिज विश्वविद्यालय के ट्रिनिटी काॅलेज में इन्हें दाखिला मिला। यहां इन्हें लाल जयवर्धने, महबूत अली, मिखाइल निकल्सन व चाल्र्स फींस्टीन सरीखे सहपाठी मिले। ये परस्पर आर्थिक विषयों पर खूब चर्चा करते थे। विचारों में पर्याप्त भिन्नता होने के कारण खूब तकरार भी हो जाती थी। इस कारण हुआ यह कि इनमें दो दल बन गए। उस समय ट्रिनिटी महाविद्यालय मेें माक्र्सवादी मारिस डाब, उदारवादी डेनिस राॅबर्टसन एंव उच्च कोटि के अर्थशास्त्री पियरो साफा अध्यापन सेवाएं दे रहे थे। इनका अध्यापन कार्य सूक्ष्म पद्धति से प्रदान किया जाता था।

तीनों महान अर्थशास्त्री अमत्र्य कुमार के लिए अनमोल ज्ञान का खजाना बन गए। तीनों ने ट्रिनिटी विश्वविद्यालय को अर्थशास्त्र के क्षेत्र में ऊंचाइयां प्रदान कीं। इतना ही नहीं, वे स्वयं भी अर्थशास्त्र के परम ज्ञाता बन कर छात्रों के लिए प्रेरणा स्रोत बनने में सफल रहे। उन्हीं के पदचिह्नों पर चलकर अमत्र्य कुमार ने अर्थशास्त्र को गहराई के साथ आत्मसात् किया। इन्होंने विश्वभर की अर्थव्यवस्थाओं पर मनन चिंतन भी किया। इसके पश्चात् ये इस परिणाम पर पहंुचे कि धनिकों को फायदा देने वाली अर्थव्यवस्थाओं के मध्य से गरीबों की हितकारी अर्थव्यवस्थाओं को तलाशना होगा। अमत्र्य कुमार ने इसे अपना ध्येय बनाया और इस ध्येय को पाने का अथक प्रयास भी किया। इन्होंने शोध हेतु ‘द च्वाइस आॅॅफ टेक्निक्स’ को अपने विषय के रूप में चुना। यह विषय समाजवादी अर्थव्यवस्था से संबंधित था। ट्रिनिटी महाविद्यालय में इस समय तक अन्य किसी भी अर्थशास्त्री ने शोध के निमित इस प्रकार के विषय का चयन नहीं किया था। माॅरीस डाब तथा एक दूसरे प्राध्यापक जाॅन राॅबिंसन ने अमत्र्य कुमार के विषय के बारे में अपनी प्रसन्नता व्यक्त की और इन्हें मदद देने का विश्वास भी दिया।

अमत्र्य कुमार ने उस विषय पर कड़ा परिश्रम करके तमाम प्राध्यपकों को हैरत में डाल दिया। एक वर्ष के अंदर ही उनका शोध कार्य काफी आगे बढ़ गया। इतना आगे कि प्राध्यापकों ने भीे गहराई के साथ इस विषय पर नहीं सोचा था। अब अमत्र्य कुमार को पक्का यकीन हो गया था कि वे इस शोध को तय की गई समयसीमा से पूर्व हीे पूर्ण कर लेंगे। इसी दौरान इन्हें भारत में रह रहे अपने घर के सदस्यों की याद सताने लगी। अतः इन्होंने भारत जाकर अपने पारिवारिक सदस्यों के मध्य रहते हुए वहीं पर शोध को पूरा करने का मन बनाया। अतः ये महाविद्यालय से दीर्घ अवकाश लेकर भारत लौट आए। यहां श्री ए.के. दासगुप्ता के संरक्षण में इन्होंने अपने शोधकार्य को गति दी। दासगुप्ता ने इनके कार्यों की सराहना की। वे भी गरीबों की आर्थिक आजादी के प्रबल पक्षधर थे और अमत्र्य कुमार जैसा मेधावी शोधकर्ता पाकर उनका मन मयूर प्रसन्नता से नाच उठा था।

सन् 1956 में अमत्र्य कुमार का जाधवपुर विश्वविद्यालय में प्रवक्ता पद पर चयन किया गया। तदनंतर इनकी असाधारण अर्थशास्त्र की योग्यता को देखकर इन्हें अर्थशास्त्र विभाग के प्रमुख का पद भी प्राप्त हुआ। उस वक्त अमत्र्य कुमार की उम्र महज 23 वर्ष थी। इतनी कम उम्र में ये अपने से दोगुनी उम्र के प्रवक्ताओं के प्रभारी बने। इस कारण अनेक लोगों ने विश्वविद्यालय के भीतर बखेड़ा खड़ा कर दिया। बखेड़ा खड़ा करने वाले यह कतई नहीं चाहते थे कि अमत्र्य कुमार उन शिक्षकों के प्रभारी बनें, जो उनसे उम्र में पर्याप्त रूप से वरिष्ठ थे। इनके बखेड़े का विश्वविद्यालय की प्रबंधन समिति पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा, क्योंकि अमत्र्य कुमार को वह पद उनकी सलाहियत और अर्थशास्त्र में उनकी निपुणता को दृष्टिगत रखकर दिया गया था, अतः समिति ने इन्हें उस पद पर बरकरार रखा। अमत्र्य कुमार तय समयसीमा से पूर्ण ही अपना शोध पूर्ण करके इंग्लैंड लौट गए। वहां ट्रिनिटी महाविद्यालय में इन्हें ‘प्राइज फेलोशिप’ मिल गई। अमत्र्य कुमार ने अपने शोध विषय की पृष्ठभूमि को सुदृढ़ बनाने हेतु दर्शन शास्त्र और तर्कशास्त्र का अध्ययन किया। दर्शन शास्त्र के प्रति भी इनकी गहरी रूचि रही थी। उसके अध्ययन से ये विश्व विख्यात दार्शनिकों के सान्निध्य में आए। थाॅमस स्केलेन, बर्नार्ड विलियम्स, डेरिक पारफिट, राॅबर्ट नोजिक एंव आइसाबर्लिन जैसे दार्शनिकों से चर्चा करके इन्होंने स्वंय को गौरवान्वित अनुभव किया। जाहिर है कि इनके महान विचाारों ने अमत्र्य सेन के हृदय को समर्थ किया था।

सन् 1963 में आमत्र्य कुमार का पुनः दिल्ली आगमन हुआ। ये इंग्लैंड में विश्व के लब्ध प्रतिष्ठित अर्थशास्त्रियों और विद्वानों के मध्य बहुत समय रहने के पश्चात् दिल्ली आए थे। यहां इन्हें ’दिल्ली स्कूल आॅफ इकाॅनाॅमिक्स’ और दिल्ली विश्वविद्यालय में अपनी सेवाएं देने का अवसर मिला। यहां इन्हें ऐसे अनेक छात्र और सहयोगी मिले, जो उनसे बहुत कुछ सीखकर कामयाबी की मंजिल तक पहुंचे। ’दिल्ली स्कूल आॅफ इकाॅनाॅमिक्स’ के विद्यार्थियों की रुचि ’सामाजिक अभिरुचि’ विषय के प्रति ज्यादा थी। यही विषय अमत्र्य कुमार का भी एक विशिष्ट विषय रहा था। इसका संबंध गरीबी, बेरोजगारी, आर्थिक विषमता और आर्थिक संकट से था। इस पर इन्होंने अनेक छात्रों के साथ शोधकार्य किया। उसके साथ ही ये एक पुस्तक की रचना करने में भी व्यस्त थे। उस पुस्तक का नाम ’कलेक्टिव च्वाॅइस एंड सोशल वेलफेयर’ था। पुस्तक का प्रकाशन सन् 1970 में हुआ था। इस पुस्तक में ’सामाजिक अभिरुचि’ के विभिन्न पहलुओं को दर्शाया गया। शीर्षक को पुस्तक ने पूर्णतया प्रभावशाली रूप में सिद्ध किया।

अमत्र्य कुमार को जब भारत में जाधवपुर विश्वविद्यालय के अर्थशास्त्र संकाय का प्रभारी बनाया गया था, उसी समय इन्होंने नवनीता देव के साथ शादी कर ली थी। नवनीता बंगला भाषा की प्रसिद्ध कवयित्री भी हैं। इन्होंने शादी के पश्चात् अपने पति के कार्यों में पूरा सहयोग प्रदान किया था। किंतु जीवन सहजता के साथ गुजरे, तो वह जीवन ही क्या? अमत्र्य कुमार अपनी पत्नी के प्रशंसकों की वजह से व्यक्तिगत रूप से परेशानी अनुभव करने लगे। दोनों में वैचारिक मतभेद भी पैदा हो गए। नवीनता की वैचारिकता कवयित्री होने की वजह से अपने पति की वैचारिकता से कतई पृथक थीं। अमत्र्य कुमार भारत व इंग्लैंड आते जाते रहते थे। इनका ध्यान अर्थशास्त्र जगत में ऊंचाइयां छूने पर केंद्रित था। वे गरीबों की आर्थिक स्थिति को सुधारने हेतु नई-नई अर्थव्यवस्थाओं की तलाश कर रहे थे। भारत से इंग्लैंड जाने के पश्चात् हार्वर्ड विश्वविद्यालय में अध्यापन कार्य भी करने लगे। अलहदा समय में यह अपना लेखन कार्य भी जारी रखे हुए थे। इंग्लैंड में रहते हुए ये अपनी पत्नी की भावनाओं का सम्मान नहीं कर पाए। अतः भारत में नवनीता की जिंदगी में घुटन होने लगी। जिसका उपचार यही माना गया कि दोनों तलाक द्वारा पृथक हो जाएं। इन दोनों की दो संततियां भी हैं। बेटी का नाम ’अंतरा’ है और बेटे का ’नंदन’।

कोई रिश्ता यदि निभ न सके तो उसे बोझ की भांति ढोते रहने में यूं भी कोई समझदारी की बात चिह्नत नहीं होती है। वैचारिक व मानसिक मतभेद होने के पश्चात् रिश्ता वैसे भी मृतप्राय हो जाता है। फिर निर्जीव रिश्तों का प्रभाव संतानों पर भी पड़ता ही है। अतः तलाक लेना उचित ही था।

1971 में ये एक अंग्रेेज युवती ईवा कोर्लोनी के संपर्क में आए। उस वक्त अमत्र्य कुमार की उम्र 40 वर्ष थी और इनका व्यक्तित्व खासा आकर्षक था। ईवा के पिता इटली के महान दार्शनिक रह चुके थे। उसकी मां वहां की विख्यात लेखिका थीं। जबकि ईवा ने कानून, अर्थशास्त्र एवं दर्शन शास्त्र का गहन अध्ययन भी किया था। वह ’सिटी आॅफ लंदन पाॅलिटेक्निक’ में प्रवक्ता थीं। अमत्र्य कुमार एवं उसके विचारों में भी समानता थी। इनकी भांति ईवा भी गरीबों की आर्थिक आजादी व सामाजिक न्याय की आकांक्षा रखती थी। ईवा के विचारों और सामाजिक भावनाओं के प्रभाव क्षेत्र में आने के बाद अमत्र्य कुमार ने उसके साथ शादी कर ली। ईवा इनकी दूसरी पत्नी के रूप में इनके जीवन में आई। ईवा पर शादी के लिए किसी तरह का कोई दबाव या प्रलोभन नहीं रहा था। उसने मर्जी से अमत्र्य कुमार को अपना पति चुना था। ईवा ने अपने पति के मिशन को सफल बनाने हेतू इन्हें पूर्ण सहयोग प्रदान किया। गरीबों की आर्थिक आजादी हेतु विभिन्न अर्थव्यवस्थाओं की तलाश करना ही तब अमत्र्य कुमार का मिशन था। किंतु ईवा भी आजीवन इनका साथ न निभा सकी। 12 वर्ष तक इनके साथ रहकर ईवा ने इन्हें सभी कुछ दिया, जिसकी अमत्र्य कुमार को आवश्यकता थी। फिर वह ईवा का प्रेम हो, या वह इनके अनुसंधान कार्यों में ईवा की मदद हो या फिर एक सच्चे मित्र का जज्बा हो। इनके रिश्तों में कभी कटुता नहीं आई। ईवा से एक पुत्री इंदिरानी और पुत्र कबीर का जन्म हुआ। उसके पश्चात् वे कैंसर की बीमारी से इतनी गंभीर स्थिति में पहुंच गईं कि उनका बचना असंभव हो गया। वे अपने पति और दोनों बच्चों को अलविदा कह कर सदा के लिए इस दुनिया से कूच कर गईं। सन् 1985 में जब उनकी मृत्यु हुई तो उनकी बेटी 10 वर्ष की और पुत्र 8 वर्ष का था। वे दोनों बच्चे पिता के संरक्षण में बड़े हुए और आज वे अच्छे पदों पर तैनात हैं। ईवा की मौत के पश्चात् अमत्र्य कुमार के पास अमेरिका के कई विश्वविद्यालयों से विभिन्न प्रकार के प्रस्ताव आए। वे विश्वविद्यालय इनकी सेवाएं प्राप्त करना चाहते थे। अमत्र्य कुमार अपने बच्चों के साथ अमेरिका गए। ये ’यूनिवर्सिटी आॅफ टैक्सास, हार्वर्ड स्टेनफोर्ड और प्रिंसटन’ जैसे कई विश्वविद्यालयों को अपनी सेवाएं प्रदान करने लगे। तब इनके बच्चे काफी समय तक अपने मामा-मामी की देखरेख में भी रहे।

ल्ेकिन अमत्र्य कुमार अपने बच्चों का खासा ध्यान रखते थे। इन्होंने अपने बच्चों को श्रेष्ठ स्कूलों में पढ़ाया-लिखाया। अमत्र्य कुमार अमेरिका में रहते हुए भी इंग्लैंड के कई विश्वविद्यालयों एवं संस्थानों के संपर्क में बने रहे। मानव कलयाणकारी अर्थव्यवस्था हेतु ये आरंभ से ही समर्पित रहे हैं। जब इन्हें कोई मानवतावादी अर्थशास्त्री का संबोधन देता है तो इन्हें बेहद प्रसन्नता होती है। कुछ लोगों ने इन्हें वामपंथी विचारधारा का उपासक मान लिया। अमत्र्य कुमार ने इस सोच के प्रति आपत्ति उठाई थी। इस पर काफी वाद-विवाद भी हुआ और इन्हें कई वर्षों तक नोबेल पुरस्कार के लिए नाम उछालने के उपरांत भी चुना नहीं गया। किंतु दुनिया जानती थी कि अर्थशास्त्र पर किया इनका तमाम कार्य विलक्षण है और अप्रतिम भी।

अमत्र्य कुमार ने अर्थशास्त्र पर तकरीबन 215 शोध लिखे थे। इन्होंने अर्थशास्त्र के अपने शोध पर 24 पुस्तकें भी लिखीं। वे पुस्तकें पूरी दुनिया में बेहद नामवर साबित हुईं। इन्होंने गरीबी का दंश झेलने वाले दुखी लोगों की बदहाली को दृष्टिगत रखकर कई आर्थिक उपायों को सुझाया। उसके आधार पर विपन्न लोग अपनी आर्थिक स्थिति को मजबूत बना सकते हैं और सम्मान युक्त जीवन भी गुजार सकते हैं। समाजवाद के क्षेत्र में उठाए गए इनके यथार्थवादी कदमों की विश्व के अर्थशास्त्रियों ने जोरदार प्रशंसा की थी। अमत्र्य कुमार ने गरीबी और असमानता से संबंधित अनेक वैश्विक आंकड़े तैयार किए हैं। इतना ही नहीं, इन्होंने उन आंकड़ों के मूल कारणों का विश्लेषण और कारगर उपायों का भी सलीके से बखान किया है। ये पृथक पृथक समाज के लोगों से मिलकर उनकी परिस्थितियों को विश्लेषण भी कर चुके हैं। इसके आधार पर इन्होंने कई आंकड़ों को भी तैयार करने में सफलता पाई। वक्त गुजरता रहा और अमत्र्य कुमार के लेख विभिन्न देशों की पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहे। इन लेखों का संकलन करके इन्होंने कई पुस्तकें भी प्रकाशित करवाईं। सन् 1982 में ’च्वाॅइस वेलफेयर मेजरमेंट एंड रिसोर्सेज’ शीर्षक से इनकी एक पुस्तक प्रकाशित हुई।

उसमें इन्होंने भारतीय स्त्री-पुरूषों की कार्य क्षमता और लिंग के आधार पर आर्थिक व औधोगिक क्षेत्रों मंे किए जाने वाले भेद-भाव पर कई आंकडो का अध्ययन भी किया था। तदनंतर इन्होंने वैश्विक स्तर पर कई आंकडे एकत्र किए और उन भेद-भावो का विश्लेषण भी किया। गरीबी और अकाल पर किए गए अमत्र्य कुमार के आर्थिक विश्लेषण ने विश्व स्तर पर काफी सराहनाएं बटोरीं।

अंततः 1998 मे इनका नाम नोबेल पुरस्कार के लिए घोषित किया। अमत्र्य कुमार को जब इसकी जानकारी मिली तो इन्होंने अपनी मंा को फोन किया, इनकी मां को विश्वास ही नहीं हुआ कि इनके पुत्र को नोबेल पुरस्कार प्रदान किया जाना है, क्योंकि इनकी मां पूर्व मे भी इस तरह की कई खबरें पा चुकी थीं, किंतु उनके बेटे को नोबेल पुरस्कार सदैव मिलते-मिलते रह जाता था। देश-विदेश के समाचार पत्रों में नोबेल पुरस्कार के लिए जब इनके नाम की विधिवत घोषणा हो गई, तभी उनकी मां को विश्वास आया।

अमत्र्य कुमार ने ‘नोबेल पुरस्कार’ मे मिली धनराशि से एक ट्रस्ट निर्मित किया और उस धनराशि का उपयोग भारत के गरीब विद्यार्थियों को विदेश में शिक्षा प्रदान कराने के लिए किया जाना प्रस्तावित किया। ट्रस्ट के प्रबंधन के तहत यह मदद उन गरीब विद्यार्थियो को दी जानी थी, जो असामान्य प्रतिभा के धनी हों और जो धन की कमी के कारण उच्च शिक्षा हेतु विदेश नहीं जा पाते हैं। नोबेल पुरस्कार में मिली पांच करोड की धनराशि को अमत्र्य कुमार ने अपने निजी उपयोग में कतई भी नहीें लिया और इसके लिए देश-विदेश मे इनके शुभकारी विचारों की अत्यधिक प्रशंसा भी हुई।

अमत्र्य कुमार को कल्याणकारी अर्थव्यवस्था का जन्मदाता कहा जाता है। इन्होनें जन कल्याणकारी अर्थव्यवस्था का नक्शा विश्व के सम्मुख पेश कर दिया है। अब यह विश्व के राष्ट्र प्रमुखों पर निर्भर करता है कि वे इनके आर्थिक सिद्धांतांे को किस स्थिति तक स्वीकार कर पाते हैं। अमत्र्य कुमार ऐसे सर्वप्रथम अर्थशास्त्री हैं, जिनका ध्यान गरीबों को गरीबी से आजाद करके इन्हें सम्मान से जीवन यापन कराने पर गया हो। इसके लिए इन्होंने कई अर्थव्यवस्थाएं भी विकसित की हैं। इनका मानना है कि भारत मे गरीबी का प्रमुख कारक शिक्षण की कमी और साधनहीनता है। ये कहते हैं कि शिक्षित लोगों को ईश्वर और भाग्य से उम्मीद रखकर नहीं बैठना चाहिए, बल्कि धनार्जन हेतु किसी न किसी उद्यम की शरण मे जाना चाहिए। वर्तमान मे जो लोग गरीबी की मार झेल रहे हैं, इन्हें गरीबी को कर्मदंड के रूप मे स्वीकार नहीं करना चाहिए। इस प्रकार के विचारों को अपने दिमाग से झटक देना चाहिए। भाग्यवादी न होकर कर्मवादी बनने पर ध्यान देना चाहिए। अमत्र्य कुमार की सोच यह है कि विश्व मे गरीबी का मूल कारण शिक्षा का पिछड़ापन भी है, क्योंकि उचित शिक्षा से इंसान को नए संसाधन जुटाने का संबल प्राप्त होता है और वे संघर्ष करके अपने वक्त को बदलने में सफल हो जाते हैं। धन किस तरह कमाया जाए, इसका ज्ञान भी शिक्षा द्वारा ही प्राप्त होता है। शिक्षा से अज्ञान रूपी तमस का नाश किया जाता है। शिक्षित शख्स अंधविश्वास के फेर में पड़कर किसी भी प्रकास से कभी भी भ्रमित नहीं होता। उचित आचरण और उचित कर्म करने वाला शख्स स्वयं को अज्ञानता के खतरों से भी बचाता है और अपने आर्थिक स्तर को उन्नत करने के लिए विभिन्न प्रकार के मार्ग भी तलाशता है। व्यापार में पूंजी के साथ योग्यता का भी समान महत्व है। अनपढ़ शख्स व्यापार में नाकाम हो सकता है। पूंजी डुबो सकता है, जबकि शिक्षित शख्स उन लोगों के जाल में कतई भी नहीं फंसेगा, जो उसकी पंूजी को लूटना चाहते हैं। इस आधार पर प्रत्येक सरकार को शिक्षा अनिवार्य घोषित कर देनी चाहिए ताकि शिक्षित समाज बनें और देश का भी विकास हो।

अमत्र्य कुमार सन् 2003 के जनवरी, माह में ’प्रवासी भारतीय दिवस समारोह’ में भाग लेने के लिए दिल्ली पहुचें थे। दिल्ली विश्वविद्यालय के स्पोटर््स स्टेडियम में इन्होेंने अपना वक्तव्य देते हुए कहा था, ’’भारत में अन्न के भंडार भरे पड़े हैं, इसके उपरांत भी करोडों लोग भूखे ही रात्रि को सोने को विवश हैं। देश में खाद्यान्न की कोई कमी नहीं है तथापि विभिन्न स्थानों से भुखमरी की खबरें सुनाई पड़ती हैं। इसके लिए सरकार की कमजोर आर्थिक नीतियां ही जिम्मेदार हैं। मैं भारतीय जनतंत्र की सरहना करता हूं। जनतंत्र तो नागरिकों को मौका प्रदान करता ही है, लेकिन हम नागरिकों पर ही यह निर्भर करता है कि उस मौके का लाभ किस सीमा तक उठा पाते हैं। यह बात सत्य है कि भारत की खाद्यान्न वितरण प्रणाली सही नहीं है। लाखों लोगों की खाद्यान्न की अनुपलब्धता इसका सबूत है। इससे उन लोगों का स्वास्थ्य भी नकारात्मक रूप से प्रभावित हो रहा है। यह भारत की प्रमुख समस्या है और सरकार को इससे मुक्ति पाने का उचित प्रयास करना चाहिए। सरकार को अपनी आर्थिक और रोजगार विषयक नीतियों में परिवर्तन करने की आवश्यकता है ताकि सामान्य व्यक्ति अपनी आर्थिक स्थिति को बेहतर बना सके’’।

इसके आगे अमत्र्य कुमार ने भुखमरी को मनुष्य जाति पर कलंक बताते हुए कहा था, ’’भुखमरी लोगों की बलि लेती है। वैश्विक राजनीतिज्ञों के लिए यह भारी ग्लानि की बात है। सरकारों की निष्क्रियता की कीमत पर यदि लोग भूख से दम तोड़ते हैं तो यह ऐसी सरकारों के लिए शर्म की बात है। इस प्रकार की अर्थव्यवस्था विश्व शांति के लिए सर्वाधिक बड़ा खतरा है। प्रत्येक सरकार को अपनी खुली दृष्टि से गरीबी की सत्यता को परखना चाहिए और इनके जीवन स्तर को उन्नत करने वाली आर्थिक नीतियों को प्रभावी करना चाहिए। सरकार को ऐसी झूठी प्रशंसा नहीं करनी चाहिए कि देश की आर्थिक तरक्की हो रही है, लोग खुशहाल हो रहे हैं। इसके बजाय उचित नीतियों को प्रभावी करना ही आम व्यक्ति के हित में होगा। यदि ऐसा नहीं हुआ तो दुखी प्रजा के सब्र का पैमाना छलक पडे़गा। उस वक्त देश-दुनिया में भयानक तबाही का मंजर उपस्थित होगा। अतः सरकारें गलत आर्थिक नीतियां न बनाएं ताकि ऐसी स्थिति को आने से रोका जाए।’’ अमत्र्य कुमार सेन बेहद सरल स्वभाव के हैं।

इन्होंने सदैव मर्यादित व्यवहार की गरिमा का पालन किया किया है। प्रत्येक स्थान पर इनके व्यक्तित्व में भलमनसाहत के ही दर्शन हुए हैं। किसी भी व्यक्ति से मिलते समय इन्होंने कोई भेद नहीं किया। किंतु ईवा की मौत के पश्चात् ये स्वयं को बेहद अकेला अनुभव करने लगे थे। अपने मिशन में सफल होने के लिए वे कई-कई विश्वविद्यालयों से संपर्क करते रहे। एक वक्त ऐसा आया, जब बच्चों की सार-सभांल करना इनके लिए बेहद मुश्किल साबित होने लगा। उस वक्त इन्होंने ट्रिनिटी महाविद्यालय को अपनी सेवाएं देना मंजूर कर लिया। इन्हें एक जीवनसाथी की अब भी तलाश थी। इनकी यह तलाश ऐक्मा राॅथशील्ड नाम की अंग्रेज युवती के रूप मे पूर्ण हूई। इन्होंने ऐक्मा के साथ तीसरी शादी की। इस प्रकार ये अपने संघर्षों को गति देने के लिए योग्य साथी को प्राप्त कर सके है।

ऐक्मा शादी के समय ट्रिनिटी महाविद्यालय की फैलो थीं। उन्होंने अमत्र्य कुमार के बच्चांे की हृदय से सार-सभंाल की है। साथ ही वे महाविद्यालय में अपना कार्य भी करती रहीं। उन्हें पाकर अमत्र्य कुमार मंे भी नई ऊर्जा का संचरण हुआ है। ऐक्मा के साथ ये सफल वैवाहिक जीवन गुजार रहे हैं। ऐक्मा इनके कार्यों में पूरी मदद देती रही हैं। दोनों साथ भारत भी आ चुके हैं। अमत्र्य कुमार चाहे भारत में रहें या इंग्लैंड में, इनके शुभचितंक सभी स्थानों पर मौजूद हैं। अमत्र्य कुमार के कारण अनेक प्रतिभावान छात्र पीएच.डी. की उपाधि प्राप्त कर चुके हैं। आज भी कई छात्र इनका साथ पाने के लिए लालायित हैं। हमें इस बात की प्रसन्नता है कि अमत्र्य कुमार सेन आज भी हमारे मध्य मौजूद हैं। लोग इनसे आज भी अर्थशास्त्र संबंधी नवीनतम शोध की उम्मीद बांधते हैं। उम्मीद है कि ये अपने चाहने वालों की आशाओं की कसौटी पर खरे साबित होंगे।

अमत्र्य कुमार सेन की जिंदगी हमें सिखाती है कि सभी परिस्थितियों में अपने लक्ष्य की ओर अग्रसर रहना चाहिए, क्योंकि जीवन की राहें सदैव सपाट नहीं होती हैं।


 

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