Ashok Dham Mandir History in Hindi : अशोक धाम मंदिर लखीसराय : इंद्र दमनेश्वर महादेव मंदिर

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Ashok Dham Mandir History in Hindi

Ashok Dham Mandir History in Hindi : अशोक धाम मंदिर लखीसराय : इंद्र दमनेश्वर महादेव मंदिर


बडहिया – लखीसराय के बीच बालगुदर गाँव के पास छोटा सा गाँव चौकी है। यह चौकी ग्राम पूर्व रेलवे के बड़हिया-लखीसराय स्टेशन के बीच मनकथा रेलवे स्टेशन के समीप है।

इसी ग्राम में पालवंश के राजा इंद्र दमन की राजधानी थी। इसी राजा द्वारा चौकी ग्राम में शिवलिंग की स्थापना की गई थी। इसी शिवलिंग को श्री इंद्र दमनेश्वर महादेव’ कहा जाता है।

इसके बारे में चर्चा है कि भगवान श्रीराम द्वारा पूजित तथा माता कौसल्या द्वारा वंदित श्री इंद्र दमनेश्वर महादेव शताब्दियों
तक गुप्तवास करने के बाद 7 अप्रैल 1977 को प्रकट हुए। उन्होंने यह श्रेय चौक निवासी एक सरल हृदय बालक अशोक को दिया।

अशोक ने ही खेलते समय सर्वप्रथम इन महादेव का दर्शन किया और इसकी सूचना ग्रामवासियों को दी। इसीलिए इस तीर्थस्थान का नाम उसी बालक के नाम पर ‘अशोक धाम’ पड़ा। लखीसराय से कुछ ही दूरी पर पश्चिम में ‘हरिद्रदनदी है,

जिसे वर्तमान में हरहर नदी के नाम से जाना जाता है। इसी नदी के तट पर भगवान श्रीराम अपनी बहन शांता से मिलने एवं माता कौसल्या को लिवाने उतरे थे। यहीं लखीसराय के कुछ दूरी पर अवस्थित ऋष्यहग पर्वत पर उनका निवास था। भगवान श्रीराम विवाहोपरांत मात्र एक बार जनकपुर गए थे। वहीं से वे ऋष्यश्रृंग आए थे और माता कौसल्या के साथ पुनदमनेश्वर महादेव का पूजन करके वहीं से गंगा पारकर अवध गए।

इस प्रकार इंद्र दमनेश्वर महादेव भगवान राम द्वारा एकाधिक बार पूजित हुए हैं। माता कौसल्या द्वारा भी इनकी पूजा-अर्चना हुई थी।

भगवान बुद्ध के अवतरण तक यह क्षेत्र प्रसिद्ध हरिहर क्षेत्र की पूर्वी सीमा के अंतर्गत रहा। धीरे-धीरे गंगा माता के उत्तर की ओर खिसकने से इसका संपर्क हरिहर क्षेत्र से छूट गया। बौद्ध धर्म के प्रभाव-वृद्धि के समय भगवान अपने शकर मंदिर सहित अंतर्धान हो गए—अर्थात् भूमिगत हो गए।

जगद्गुरु आदि शंकराचार्य के द्वारा सनातन धर्म के पुनरुत्थान के साथ भगवान शंकर के विग्रह का उद्धार हुआ। और पालवंशी गढ़ मंडलेश्वर जयपाल ने इनका पूजन-अर्चन प्रारंभ किया, किंतु इन्हीं के वंशज राजा इंद्र-द्युम्न ने यहाँ भव्य मंदिर का निर्माण कराया। इन्हीं शंकर की कृपा से और इंद्र की अनुकंपा से उन्होंने अनावृष्टि और घोर दुर्भिक्ष से मुक्ति दिलाई। भगवान शंकर ने साक्षात् दर्शन देकर राजा इंद्र-द्युम्न को वरदान दिया। फलस्वरूप भगवान शंकर का नाम यहाँ ‘इंद्र दमनेश्वरसुविख्यात हुआ।

अपनी विशिष्टता के अनुकूल भगवान मुसलिम आक्रमण के समय पुन: भूमिगत हो गए। आज जब भगवान इंद्र दमनेश्वर प्रकट हुए हैं तो यह देखकर पुरातत्ववेत्ता आश्चर्यचकित हैं कि बौद्धकाल की जितनी भी मूर्तियाँ थीं, एक भी अखंडित नहीं मिली हैं, परंतु भगवान इंद्र दमनेश्वर को खरोंच भी नहीं आई है।

यह चमत्कार ही है कि बौद्धकाल एवं मुसलिम शासन की लंबी अवधि में इंद्र दमनेश्वर महादेव भूमिगत होने के बावजूद अपने पूर्ण सौष्ठव और गरिमा के साथ विद्यमान हैं। यह बात भी आकर्षण का कारण है कि भगवान के विग्रह का आकार असाधारण रूप से विशाल है। इसके आधार की लंबाई 10 फीट और लिंग का व्यास 1 फीट से अधिक है। काले कसौटी पत्थर का यह ज्योतियुक्त शिवलिंग दर्शनीय है। यहाँ हजारों नर-नारी शिवलिंग के दर्शन एवं पूजा-अर्चना के लिए बराबर पर्वत्यौहारों पर आते हैं। शादीजनेऊ, मुंडन आदि जैसे शुभ कर्मों के लिए यह तीर्थस्थान बन गया है।

आज भगवान इंद्र दमनेश्वर महादेव मानवजाति का कल्याण करने के लिए प्रकट हुए हैं। बाबा वैद्यनाथ धाम के लिए जल-संग्रह हेतु जहु ऋषि के आश्रम (सुलतानगंज) जाने के मार्ग पर यह महादेव अवस्थित हैं—हर भक्त की परीक्षा के लिए। यहाँ पर भक्तों का जमघट लगा रहता है।


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