Badrinath History in Hindi : बदरीनाथ धाम : Badrinath Temple History in Hindi

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Badrinath Temple History in Hindi
Badrinath Temple History in Hindi

उतराखंड की यात्रा का दृश्य जब भी जेहन में आता है, बदरीनाथ का ध्यान अपने आप जाग जाता है। अलकनंदा के किनारे स्थित यह मंदिर अतिशय मनोरम है। इसके ठीक बगल से नीचे से उठता झरने का गरम जल मंदिर की दर्शनीयता में चार चाँद लगा देता है तथा नीलकंठ ताल का वह दृश्य जब हमारी आँखों के सामने से ओझल होता है तो लगता है कि हम किसी मधुर सपने में तैर रहे , जो टूट गया है। भारत के इस सुंदरतम मंदिर को जिन्होंने देखा है, वे वाणी से इसे व्यक्त करने में अपने को असमर्थ पाते हैं।

Badrinath History in Hindi : बदरीनाथ धाम : Badrinath Temple History in Hindi


 

Badrinath Mandir kha hai :

बदरीनाथ मंदिर दिल्ली से लगभग 520 कि.मी. की यात्रा कर पहुँचा जा सकता है। रास्ते में हरिद्वार की ‘हर की पैड़ी’ का दर्शन किया जा सकता है।, बदरीनाथ मंदिर अलकनंदा नदी के किनारे उत्तराखंड राज्य में स्थित है,  ऋषिकेश से बदरीनाथ मंदिर 294 किलोमीटर की दूरी पर उत्तर दिशा में स्थित है

यह मंदिर भगवान विष्णु के रूप बदरीनाथ को समर्पित है। यह हिन्दुओं के चार धाम में से एक धाम भी है

ये पंच-बदरी में से एक बद्री हैं। उत्तराखंड में पंच बदरी, पंच केदार तथा पंच प्रयाग पौराणिक दृष्टि से तथा हिन्दू धर्म की दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं।

Badrinath Mandir Story : बद्रीनाथ मंदिर की कथा 

कहा जाता है कि भगवान विष्णु (हरि) ने पत्थर पर अपने पैरों के निशान छोड़े थे। यहाँ स्थित गंगा मंदिर भारत के सुंदर मंदिरों में से एक है। ऐसा विश्वास किया जाता है कि यहीं से पवित्र गंगा बहती है। लोकविश्वास के अनुसार यही वह पवित्र कुंड है, जिसमें स्नान करने से सारे पाप कट जाते हैं।

कहते हैं जब गंगा देवी पृथ्वी पर अवतरित हुई तो पृथ्वी उनका प्रबल वेग सहन न कर सकी। गंगा की धारा बारह जल मार्गो में विभक्त हुई। उसमें से एक है अलकनंदा का उद्गम। यही स्थल भगवान विष्णु का निवास स्थान बना और बद्रीनाथ कहलाया

बदरीनाथ नाम की कथा : 

बद्रीनाथ तीर्थ का नाम बद्रीनाथ कैसे पड़ा यह अपने आप में रोचक कथा है। कहते हैं एक बार देवी लक्ष्मी जब भगवान विष्णु से रूठ कर मायके चली गई तब भगवान विष्णु यहां आकर तपस्या करने लगे। जब देवी लक्ष्मी की नाराजगी दूर हुई तो भगवान विष्णु को ढूंढते हुए यहां आई। उस समय यहां बदरी का वन यानी बेड़ फल का जंगल था। बदरी के वन में बैठकर भगवान ने तपस्या की थी इसलिए देवी लक्ष्मी ने भगवान विष्णु को बद्रीनाथ नाम दिया

Badrinath Mandir ka Nirman :

बद्रीनाथ का वर्तमान मंदिर अधिक प्राचीन नहीं है, बद्रीनाथ का जो मंदिर आज मौजूद है, उसे रामनुज संप्रदाय के स्वामी वरदराज की प्रेरणा से गढ़वाल नरेश ने पंद्रहवीं शताब्दी में बनवाया था, मंदिर पर सोने का छत्र और कलश इंदौर की महारानी अहिल्याबाई ने चढ़वाया था, मंदिर में वरिष्ठ और कनिष्ठ दो पुजारी होते हैं. इन्‍हें केरल के नम्बूदरीपाद ब्राह्मण परिवार से ही चुना जाता है

बद्रीनाथ मंदिर की यात्रा 

देश के विभिन्न भागों से लाखों लोग यहाँ साल भर आते रहते हैं और तीर्थयात्रा का लाभ उठाते हैं। गंगा के दोनों किनारों पर आश्रमों और धर्मशालाओं की भरमार है। साथ ही यहाँ मंशा देवी, चंडी देवीमाया देवी और अंजनी देवी आदि के भी अनेक मंदिर हैं।

हरिद्वार या ‘भगवान का द्वार, जहाँ से पावन गंगा समतल भूमि पर उतरती हैं, वहाँ का दृश्य भी बड़ा मनोहारी है। निम्न हिमालय की शिवालिक पहाड़ी को तोड़ती हुई गंगा नीचे उतरती हैं और लगता है कि बदरीनाथ, केदारनाथकपिल मुनि आदि स्थानों में गंगा के ये प्रथम ठहराव हों। इसे कभी कपिल स्थान के नाम से जाना जाता था। बाद में इसका नाम ‘गंगाद्वार’ हो गया। बहरहालयह हिंदुओं का पवित्रतम तीर्थस्थल है, जहाँ वैशाख और गंगा दशहरा के अवसर पर देश के विभिन्न भागों से लाखों नर-नारी पहुँचते हैं। ऐसा विश्वास किया जाता है कि गंगा दशहरा के दिन ही शंकर के जटाजूट से निकलकर गंगा ने सर्वप्रथम धरती का स्पर्श किया था। इस पवित्र नगर की परिक्रमा के पश्चात् ऋषिकेश पहुँचा जा सकता है।

मेघाच्छन्न और हरिताभ पहाड़ी के बीच सचमुच ही गंगा की गर्जना सर्वाधिक है। उसके पश्चात् ही वह समतल पर आती है। हरिद्वार से उत्तराखंड की दूरी लगभग 24 कि.मी. है, जो हिंदुओं का पवित्रतम तीर्थस्थल है। लक्ष्मण झूला के अगल-बगल के पवित्र मंदिर मुख्य नगर से 3-4 कि.मी. की दूरी पर हैं। गंगा के किनारे धर्मशालाओं के अतिरिक्त संस्कृत पाठशालाओं की भरमार है। यहाँ से बस द्वारा बदरीनाथकेदारनाथ, गंगोत्री और यमुनोत्री-चारों विख्यात धामों की यात्रा की जा सकती है। ये उत्तराखंड के प्रसिद्ध धाम हैं। आसपास ही देवप्रयाग भी स्थित है। वहीं अलकनंदा और भागीरथी जब पवित्र गंगा में मिलती हैं तो एक भीषण जलगर्जना होती है, जो मीलों तक सुनी जा सकती है।

बद्रीनाथ यात्रा की पूरी जानकारी : 

देवप्रयाग से रुद्रप्रयाग जाया जा सकता है। बदरीनाथ और केदारनाथ जाने के अनेक मार्ग हैं। कर्णप्रयाग भी थोड़ी दूर आगे चलकर है, जहाँ जाने के मार्ग में अगल-बगल अनेक गाँव मिलते हैं। कर्णप्रयाग का संबंध महाभारत कालीन दानवीर कर्ण से जोड़ा जाता है। यहीं पिंडारी हिमखंड से निकलकर पिंडर नदी अलकनंदा से मिलती है।

कुछ पहाड़ियों के सुंदर दृश्यों के मध्य से गुजरते हुए जोशीमठ तक जाया जा सकता है। ऋषिकेश के पश्चात् यह दूसरा प्रसिद्ध नगर है। प्रतिदिन हजारों तीर्थयात्री आदिगुरु शंकराचार्य की पूजा करते हैं। जाड़े के महीनों में बदरीनाथ के मुख्य पुजारियों का यहीं मुख्यालय रहता है।

जोशीमठ स्थित नृसिंह मंदिर

यह है जोशीमठ स्थित नृसिंह मंदिर। इस मंदिर का संबंध बद्रीनाथ से माना जाता है। ऐसी मान्यता है इस मंदिर भगवान नृसिंह की एक बाजू काफी पतली है जिस दिन यह टूट कर गिर जाएगा उस दिन नर नारायण पर्वत आपस में मिल जाएंगे और बद्रीनाथ के दर्शन वर्तमान स्थान पर नहीं हो पाएंगे।

भारी वर्षा और हिमपात के बीच यहीं से नीचे उतरा जा सकता है। यह 5,000 फीट नीचे है और यहाँ के रास्ते टेढ़े मेढ़े हैं। यहाँ से ऊँचाई पर धवल हिमखंड देखे जा सकते हैं। यहाँ से बदरीनाथ की दूरी मात्र 40 कि.मी. है। अगर आनंददायक यात्रा के खयाल से और दृश्यावलोकन के विचार से यहाँ जाया जाए तो निश्चय ही इस क्षेत्र के मार्ग के कष्टों को झेलना पड़ेगा। घनी पहाड़ी वनस्थली और अलकनंदा की फेनिल धारा का दृश्य इतना मनोरम है कि जिसे एक बार देखने के बाद कभी भी भुलाया नहीं जा सकता।

जोशीमठ से 20 कि.मी दूर दूसरा महत्त्वपूर्ण तीर्थस्थल गोविंद घाट है , जहां से तीर्थयात्री हेमकुंड जाने की तैयारी और पुष्पाच्छादित घाटी के दर्शन करते हैं। हेमकुंड यहाँ से मात्र 17 कि.मी. है, जो 14000 फीट में सात हिमखंडों से घिरा है। ऐसा कहा जाता है कि गुरु गोविंद सिंह इसी इरने के निकट समाधिस्थ हुए थे। उन्होंने पूर्व जन्म में वर्षों तपस्या की थी।

ढलान के लगभग तीन-चौथाई हिस्से के बाद हेमकुंड का वह दृश्य आता है, जो जुलाई और अगस्त के महीने में भाँति-भाँत के फूलों से लबालब भर जाता है, जिसकी सौंदर्यानुभूति वर्णनातीत है।

बद्रीनाथ के मार्ग में पांडकेश्वर और हनुमान चट्ठी मिलते हैं। कहा जाता है कि हनुमानचट्टी में कभी रामभक्त हनुमानजी ठहरे हुए थे और उन्होंने भगवान बद्रीनाथ की अर्चना की थी। वहाँ हनुमानजी का एक छोटा सा मंदिर है। यह भी कहा जाता है कि यहीं पर पांडवों ने हनुमानजी की पूजा की थी। सड़क पर हिम का भारी जमाव देखा जा सकता है, जिसे भेदकर सवारियों का आवागमन भी कठिन होता है। नीचे की घाटी में अलकनंदा हिम की गुफाएँ बनाती नजर आएगी, जो कुछ क्षण तक इनसे ढकी नजर आती हैं।

एक तेज ढलान से एक बड़ी घाटी दिखाई पड़ती है, जिसे ‘बदरीवन’ के नाम से जाना जाता है। वह बर्फ से इस तरह ढंकी रहती है कि बदरीनाथ शहर को बहुत कठिनाई से देखा जा सकता है।

मंदिर की विपरीत दिशा से जाने के लिए लकड़ी के पुल से होकर जाना पड़ता है। वहाँ से तीर्थयात्रियों की उमड़ती भीड़ को देखा जा सकता है। ठंड के कारण वे कंबल लपेटे नजर आएँगे। पुराणों में ऐसी मान्यता है कि चार धाम जगन्नाथपुरी, रामेश्वरम्द्वारिकानाथ और बदरीनाथ सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण हैं। इसमें बदरीनाथ का स्थान पहला माना जाता है। प्राय: 10000 फीट की ऊँचाई पर कुहासा और हिम छाए रहते हैं। सभी मौसमों में वहाँ का तापक्रम प्राय: 10
सेंटीग्रेड से कम ही रहता है।

जब आवागमन के आधुनिक साधन नहीं थे, तब बदरीनाथ की यात्रा अत्यंत कष्टसाध्य थी; किंतु आवागमन के साधनों के विकास के कारण आज यह स्थिति बदरीनाथ अपने आप में एक लघु स्वतंत्र नगर है, जिसकी रक्षा नर-नारायण स्वयं करते हैं-ऐसा कहा जाता है। यात्रियों के लिए बदरीनाथ मंदिर का दरवाजा प्रतिवर्ष लगभग 15 अप्रैल से मध्य नवंबर तक खुलता हैकिंतु इस संदर्भ में सही तिथि का निर्धारण मंदिर समिति के प्रधान अधिकारी ही करते हैं। मंदिर के द्वार खुलने और बंद होने के समय बड़ी धूमधाम रहती है। कपाट बंद होने के पश्चात् प्रधान पुजारी और रावल जाड़े में जोशीमठ आ जाते हैं। कहा जाता है कि जंगली बेरों की झाड़ियों से ढंके रहने के कारण ही इस स्थान का नाम ‘बदरीनाथ’ पड़ा।

यह निश्चित रूप से कहना कठिन है कि इस मंदिर का निर्माण कब हुआ, किंतु प्राचीन ग्रंथों में इसका उल्लेख मिलता है। कभी यह मंदिर बौद्धों का पूजास्थल था-विशेषतया सम्राट अशोक के शासनकाल के समय। बाद में आठवीं सदी में भगवान बदरीनाथ की एक मूर्ति मिली है, उसे आदिगुरु शंकराचार्य ने प्राप्त किया था और तीर्थयात्रियों की पहुँच के परे मंदिर के अंतप्रकोष्ठ में स्थापित की थी। उसका दर्शन भक्तजन दूर से ही करते हैं।

बदरीनाथ का मुख्य आकर्षण बदरीनाथ का मंदिर है। मंदिर में यों तो बहुत सी मूर्तियाँ , लेकिन मुख्य मूर्ति विष्णु की है। शालिग्राम पत्थर पर बनी यह मूर्ति कला की दृष्टि से बेजोड़ है।

बदरीनाथ मंदिर से महज 8 कि.मी. की दूरी पर वसुंधरा नामक झरना है, जहाँ 120 मीटर की ऊँचाई से जल गिरता है। मार्ग में माना गाँव के पास अनेक गुफाएँ हैं। थोड़ी ही दूर पर सरस्वती नदी का उद्गमस्थल देखा जा सकता है, जहाँ यह केशवप्रयाग में अलकनंदा से मिलती है, जो वहाँ से 25 कि.मी. है और अलकनंदा का उद्गम स्थल है।

बदरीनाथ के दर्शनीय स्थल

वसुधारा जलप्रपात, माणा की घाटी, फूलों की घाटी, हेमकुंड और गोहना झील बदरीनाथ के दर्शनीय स्थल हैं। फूलों की घाटी में रंगों की अनोखी बहार देखने को मिलती है। बदरीनाथ में नवंबर से अप्रैल तक चारों ओर काफी बर्फ जमी रहती है, इसलिए यहाँ घूमने का सर्वश्रेष्ठ समय मई से अक्तूबर तक है। बदरीनाथ में ठहरने के लिए अनेक ट्रैवलर्स लॉज और होटल भी हैं। वैसे गेस्ट हाउस आदि में भी ठहरा जा सकता है। यहाँ धर्मशालाओं में ठहरने की भी सुविधा आसानी से मिल जाती है।

बदरीनाथ मंदिर का महत्व :

प्राकृतिक सौंदर्य से परिपूर्ण बदरीनाथ की यात्रा के आकांक्षी मार्ग की सुंदरता से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकते। यहाँ की यात्रा के क्रम में समय और धन व्यय करना किसी को इसलिए नहीं अखरताक्योंकि वहाँ से सब लोग पूर्ण संतुष्ट होकर वापस लौटते हैं। तीर्थ से लौटने पर जैसे सुख की अनुभूति होती है, वह वर्णन से सर्वथा परे है। वैसे भी हमारा देश ‘धर्मप्रधान देश’ माना जाता रहा है।

फिर यह भारत के मूल धर्म की ही विशेषता है कि उसने सभी धर्मावलंबियों को समानधर्मा की भाँति अपना लिया। इसीलिए यहाँ मसजिदोंगिरजाघरों और गुरुद्वारों के दर्शन यत्रतत्र-सर्वत्र होते हैं। मान्यताओं में कुछ अंतर अवश्य है, पर मूल स्वर परोपकार, परहित और सत्कर्म करके मोक्ष-प्राप्ति का ही रहा है । इसीलिए बदरीनाथ के दर्शन करने के संबंध में एक लोक-विश्वास इन शब्दों में अब भी जीवित है

‘जो ना जाए बदरीवह नहीं ओदरी’ अर्थात् जो बदरीनाथ की यात्रा नहीं कर पाता, उसे मोक्ष नहीं मिलता। वैज्ञानिक तर्क को छोड़िए तो इस लोक-विश्वास को इस अर्थ में नहीं नकारा जाना चाहिए कि मोक्ष-प्राप्ति आवश्यक है। मोक्ष-प्राप्ति का अर्थ अध्यात्म में बहुत व्यापक है शरीर से मुक्ति पाना ही मोक्ष प्राप्ति नहीं है। वास्तविक मोक्ष पाने की सार्थकता इस बात में है कि हम काम-क्रोध-लोभ मोह से मोक्ष पाएँ।

बदरीनाथ की यात्रा करके लौटनेवालों में से अधिकांश तीर्थयात्री पूर्णत नहीं तो अंशत: मोक्ष के पक्षधर हो जाते हैं।


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