“छाछ” पियें और कई रोगों को दूर भगायें : Health Benefits of Butter Milk in Hindi : Chhach Ke fayde In Hindi

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Chhach Ke fayde In Hindi
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“छाछ” पियें और कई रोगों को दूर भगायें : Health Benefits of Butter Milk in Hindi : Chhach Ke fayde In Hindi

Health Benefits of Butter Milk in Hindi 

Chhach Ke fayde In Hindi


“छाछ” के फायदे

छाछ या मट्ठा शरीर में उपस्थित विजातीय तत्वों को बाहर निकालकर नया जीवन प्रदान करता है। यह शरीर में प्रतिरोधात्मक (रोगों से लड़ने की शक्ति) शक्ति पैदा करता है। छाछ में घी नहीं होना चाहिए। गाय के दूध से बनी छाछ सर्वोत्तम होती है। छाछ का सेवन करने से जो रोग नष्ट होते हैं। वे जीवन में फिर दुबारा कभी नहीं होते हैं। छाछ खट्टी नहीं होनी चाहिए। पेट के रोगों में छाछ को दिन में कई बार पीना चाहिए। गर्मी में छाछ पीने से शरीर तरोताजा रहता है। रोजाना नाश्ते और भोजन के बाद छाछ पीने से शारीरिक शक्ति बढ़ती है। छाछ को पीने से सिर के बाल असमय में सफेद नहीं होते हैं। भोजन के अन्त में छाछ, रात के मध्य दूध और रात के अन्त में पानी पीने से स्वास्थ्य अच्छा रहता है।

          दही को मथकर छाछ को बनाया जाता है। छाछ गरीबों की सस्ती औषधि है। छाछ गरीबों के अनेक शारीरिक दोषों को दूरकर उनकी तन्दुरुस्ती बढ़ाने में तथा आहार के रूप में महत्वपूर्ण है।

          कई लोगों को छाछ नहीं पचती है। उनके लिए छाछ बहुत ही गुणकारी होती है। ताजा छाछ बहुत ही लाभकारी होती है। छाछ की कढ़ी स्वादिष्ट होती है और वह पाचक भी होती है। उत्तर भारत में तथा पंजाब में छाछ में चीनी मिलाकर उसकी लस्सी बनाकर उपयोग करते हैं। लस्सी में बर्फ का ठण्डा पानी डाला जाए तो यह बहुत ही लाभकारी हो जाती है। लस्सी जलन, प्यास और गर्मी को दूर करती है। लस्सी गर्मी के मौसम में शर्बत का काम करती है। छाछ में खटाई होने से यह भूख को बढ़ाती है। भोजन में रुचि पैदा करती है और भोजन का पाचन करती है जिन्हें भूख न लगती हो या भोजन न पचता हो, खट्टी-खट्टी डकारें आती हो और पेट फूलने से छाती में घबराहट होती हो तो उनके लिए छाछ का सेवन अमृत के समान लाभकारी होता है। इसके लिए सभी आहारों का सेवन बंद करके 6 किलो दूध की छाछ बनाकर सेवन करने से शारीरिक शक्ति बनी रहती है। केवल छाछ बनाकर सेवन करने से मलशुद्धि होती है तथा शरीर फूल सा हल्का हो जाता है। शरीर में स्फूर्ति आती है उत्साह उत्पन्न होता है तथा जठराग्नि और आंतों को ताजगी तथा आराम मिलता है। छाछ जठराग्नि को प्रदीप्त कर पाचन तन्त्र को सुचारू बनाती है। छाछ गैस को दूर करती है। अत: मल विकारों और पेट की गैस में छाछ का सेवन लाभकारी होता है।

  • `चरक` अरुचि मन्दाग्नि और अतिसार में छाछ को अमृत के समान मानते हैं।
  • `सुश्रुत` छाछ को मधुर, खट्टी, कषैली, गर्म, लघु, रूक्ष, पाचनशक्तिवर्द्धक, जहर, सूजन, अतिसार, ग्रहणी, पाण्डुरोग (पीलिया), बवासीर, प्लीहा रोग, गैस, अरुचि, विषमज्वर, प्यास, लार के स्राव, दर्द, मोटापा, कफ और वायुनाशक मानते हैं।

“छाछ” के औषधीय गुण निम्न हैं : Chhach Ke fayde In Hindi

छाछ में विटामिन ” B 12 ” , कैल्शियम , पोटेशियम और फास्फोरस जैसे तत्व होते है

वैज्ञानिक मतानुसार छाछ में विटामिन `सी` होता है। अत: इसके सेवन से शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है तथा त्वचा की आरोग्यता और सुन्दरता बरकरार रहती है। छाछ में लैक्टिड एसिड होने से वह पाचन तन्त्र के रोगों में लाभदायक सिद्ध होती है।

“छाछ” का सेवन कैसे करें? “छाछ” क़े खास प्रयोग :

  • गाय का दूध जमाकर हल्की खट्टी दही में 3 गुना पानी मिलाकर मथकर मक्खन निकालकर उसकी छाछ तैयार कर लें। इसे सुबह-शाम भोजन के बाद 1 गिलास से लेकर अनुकूलता के अनुसार अधिक से अधिक मात्रा में निरन्तर 5-7 दिनों तक सेवन करें।
  • प्यास लगने पर पानी के स्थान पर छाछ पियें। भोजन में चावल, खिचड़ी, उबली हुई तरकारी, मूंग की दाल तथा रोटी का सेवन करें और छाछ की मात्रा बढ़ाते जाएं तथा अनाज की मात्रा घटाते जाएं।
  • पाचन शक्ति की दुबर्लता, (भोजन पचाने की शक्ति कमजोर होना) जठराग्नि की मन्दता, संग्रहणी (पेचिश) आदि रोगों में इस तक्र कल्प का प्रयोग करने से नवजीवन प्राप्त होता है।
  • अग्नि प्रबल होने पर रोग प्रतिकारक शक्ति बढ़ती है जिस रोग को लक्ष्यकर तक्रकल्प करना हो तो वह यदि वात जन्य हो तो छाछ में सेंधानमक और सोंठ डाले।
  • पित्तजन्य हो तो उसमें थोड़ी सी इलायची व शक्कर डालें। कफजन्य हो तो उसमें त्रिकुटा का चूर्ण मिलाएं।
  • खट्टी (सोंठ तथा सेंधानमक से युक्त) छाछ पित्त पर, शक्कर मिला हुआ छाछ वात वृद्धि पर और  सोंठ, कालीमिर्च एवं पीपरयुक्त छाछ कफवृद्धि पर उत्तम है।
  • सर्दी के मौसम में, अग्निमान्द्य में (भूख का कम लगना), वायुविकारों में (गैस के रोग में), अरुचि में, रस वाहनियों के अवरोध में छाछ अमृत के समान लाभकारी होती है।

“छाछ” क़े प्रकार : 


छाछ के अन्दर रहे हुए मक्खन या उसमें से निकाले हुए मक्खन की मात्रा एवं छाछ में मिलाए हुए पानी की मात्रा के आधार पर छाछ 4 प्रकार के होती है।

1. घोल

2. मथित

3. तक्र

5. छच्छिका यानि छाछ

घोल : जब दही में थोड़ा-सा पानी डालकर उसे बिलोया (मथा) जाय तब यह घोल कहलाता है। यह ग्राही, उत्तेजक, पाचक और शीतल है तथा वायु नाशक (गैस को खत्म करने वाला) है परन्तु बलगम को बढ़ाता है। हींग, जीरा और सेंधानमक मिला हुआ घोल गैस का पूरी तरह नाश करने वाला तथा अतिसार (दस्त) और बवासीर को मिटाने वाला रुचिवर्द्धक, पुष्टिदायक, बलवर्द्धक और नाभि के नीचे के भाग के शूल मिटाने वाला है। गुड़ डाला हुआ घोल, मूत्रकृच्छ (पेशाब में जलन) और चित्रक मिलाया हुआ घोल पाण्डु (पीलिया) रोग को नष्ट करता है। शर्करायुक्त घोल के गुण आम के रस के समान होते हैं।

मथित : दही के ऊपर वाली मलाई निकालकर बिलोया हुआ दही मथित (मट्ठा) कहलाता है। मट्ठा वायु तथा पित्तनाशक, आनन्द एवं उल्लास प्रदान करने वाला तथा कफ और गर्मी को दूर करने वाला होता है। यह गर्मी के कारण होने वाले दस्तों, अर्श (बवासीर) और संग्रहणी में लाभकारी होता है।

तक्र : दही में उसके चौथे हिस्से का पानी निकालकर मथा जाए तो उसे तक्र कहते हैं। तक्र खट्टा, कषैला, पाक तथा रस में मधुर, हल्का, गर्म, अग्नि प्रदीपक, मैथुनशक्तिवर्द्धक, तृप्तिदायक और वायुनाशक है। यह हल्का एवं कारण दस्त सम्बंधी रोगों के लिए लाभकारी होता है तथा यह पाक में मधुर होने के कारण पित्त प्रकोप नहीं करता है तथा यह कषैला, गर्म और रूक्ष होने के कारण कफ को तोड़ता भी है।

उद्क्षित : दही में आधा हिस्सा पानी मिलाकर जब मथा जाए तब उसे उद्क्षित कहते हैं। यह कफकारक, बलवर्द्धक और आमनाशक (दस्त में आंव आना) होता है।

छाछ : दही में जब ज्यादा पानी मिलाकर बिलोया (मथा) जाए और उसके ऊपर से मक्खन निकालकर फिर पानी मिलाया जाए, इस प्रकार खूब पतले बनाये गये दही को छाछ कहते हैं। जिसमें से सारा मक्खन निकाल लिया गया हो, वह छाछ हल्की तथा जिसमें से थोड़ा सा मक्खन निकाल गया हो वह कुछ भारी और कफकारक होती है और जिसमें से जरा सा भी मक्खन न निकाला गया हो वह छाछ भारी पुष्टदायक और कफकारक है। घोल की अपेक्षा मथित मट्ठा और मट्ठे की अपेक्षा छाछ पचने में हल्की, पित्त, थकान तथा तृषानाशक (प्यास दूर करना), वायुनाशक और कफकारक है। नमक के साथ छाछ को पीने से पाचनशक्ति बढ़ती है। छाछ जहर, उल्टी, लार के स्राव, विषमज्वर, पेचिश, मोटापे, बवासीर, मूत्रकृच्छ, भगन्दर, मधुमेह, वायु, गुल्म, अतिसार, दर्द, तिल्ली, प्लीहोदर, अरुचि, सफेद दाग, जठर के रोगों, कोढ़, सूजन, तृषा (अधिक प्यास) में लाभदायक और पेट के कीड़ों को नष्ट करने वाली होती है।

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