Dakor Temple History in Hindi : तीर्थधाम डाकोर : डाकोर जी मंदिर गुजरात

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Dakor Temple History in Hindi
Dakor Temple History in Hindi

उत्तरी भारत के पवित्रतम तीर्थ स्थानों में से डाकोर भी एक महत्त्वपूर्ण तीर्थ धाम है। यह कस्बा भव्य ऐतिहासिक मंदिर और श्री रणछोड़राय की महिमा के कारण भारत विख्यात है।

Dakor Temple History in Hindi : तीर्थधाम डाकोर : डाकोर जी मंदिर गुजरात


प्राचीन काल में यहाँ खाखरिया नामक छोटा सा गाँव था। डंक मुनि के आश्रम के पास होने से इसका ‘डंकपुर’ नाम पड़ा तथा वर्तमान में यह ‘डाकोर’ नाम से जाना जाता है।

ढाक की सघन झाड़ियों से आच्छादित सुरम्य वन में यत्र-तत्र छोटे-छोटे निर्मल एवं शीतल जल से भरा जलाशय और उनमें विकसित कमल दल उनकी शोभा-वृद्धि में सहायक थे। सरोवर किनारे संत-महात्माओं की झोंपड़ियाँ एवं आश्रम थे।

उन्हीं में से एक कुटिया में तपोधन कंडक ऋषि के गुरुभ्राता तथा परम शिवोपासक डंक मुनि निवास करते थे। वे आश्रम के पास के वटवृक्ष के तले बैठकर शिव आराधना करते थे। एक दिन अकस्मात् उनके मन में आराध्य के साक्षात् दर्शनों की इच्छा जाग्रत् हुई। उसके लिए उन्होंने वर्षों तक कठोर तपस्या करके सफलता प्राप्त की। साथ ही वे शिव से उनकी कुटिया में स्थायी वास के लिए वर प्राप्त करने में भी सफल हुए। मुनि भावनानुरूप महादेव बाण रूप में सदा के लिए वहाँ स्थापित हो गए। लोक-विश्वास अनुरूप उस बाण के प्रतीक हैं डंकेश्वर महादेव।

पौराणिक कथा बताती है कि द्वापर के अंतिम चरण में जब श्रीकृष्ण भीम के साथ हस्तिनापुर से द्वारका लौट रहे थे तो मार्ग में भीम को प्यास लगी। उसने श्रीकृष्ण से कहा तो उन्होंने हाथ से संकेत करके बताया कि उधर थोड़ी ही दूरी पर सरोवर एवं डंक मुनि का आश्रम है। उसी ओर चलते-चलते उसने श्रीकृष्ण से पूछा कि हे भगवन! आप तो अखिल विश्व में पूज्य हैं, फिर मुनिदर्शनों को क्यों महत्त्व देते हैं।

यह सुनकर श्रीकृष्ण हँसकर कहने लगे कि मेरे दर्शन तो वही करता है, जो मुझे भाता है, परंतु ऋषि-मुनियों के दर्शन तो सर्वत्र सुलभ हैं। गंगा केवल पापियों के पाप धोती है चंद्रमा शीतलता प्रदान करता है, कल्पवृक्ष दरिद्रता दूर करता है। मैं केवल अपने भक्तों को मुक्ति देता हूँ, किंतु मुनिवृंद ये सभी चीजें एक साथ देने में समर्थ हैं।

मेरे दो रूपों में से अचल की प्रतीक प्रतिमा है तो चल रूप का व्यापक स्वरूप संत-महात्मा हैं। अत: संत – दर्शन स्पर्श, कीर्तन और चरण-वंदना से पापी प्राणी भी पवित्र एवं पुण्यात्मा बन जाता है।

सरोवर पहुँचकर उसके शीतल एवं स्वच्छ जल से प्यास बुझाकर श्रीकृष्ण विश्रामार्थ सुरम्य तला-मंडप में जाकर बैठे थे। वहाँ का प्राकृतिक मनोरम दृश्य और मंद मंद वायु के सुस्पर्श का सुखानुभव करते हुए वे मार्ग की थकान तथा कष्टों को भूल गए। भीम ने एक वृक्ष के तले बैठकर उस सरोवर को विशेष उपयोगी बनाने की कल्पना की थी। वह सरोवर के मध्य पहुँचा और अपनी विशाल गदा को घुमाकर इतने जोर से मारा कि सरोवर का आकार नौ सौ निन्यानबे बीघा में फैल गया।

गदा-प्रहार की प्रतिध्वनि से समूचे वन प्रदेश में प्रलय काल-सा आतंक छा गया। उससे वनविहारी चौंके तो डंक मुनि की समाधि भंग हो गई। सरोवर का फैलाव और उसे जल से लबालब भरा देखकर मुनि को अत्यधिक विस्मय हुआ। अकस्मात् उनकी निगाह श्रीकृष्ण और भीम पर पड़ी जो उन्हीं के आश्रम की ओर आ रहे थे। उन्होंने मंडली सहित श्रीकृष्ण का स्वागत किया और भीम का प्रणाम

श्रीकृष्ण के यह कहने पर कि मुनिराज मेरे योग्य क्या सेवा है? यह सुन तुरंत उन्होंने कहा कि मैं स्वयं आपकी सेवा का अधिकारी हूँ । फिर भी, मेरी इच्छा है कि आप भी, शंकर की तरह इस आश्रम में हमेशा के लिए निवास करें। यह सुनकर श्रीकृष्ण विचारमग्न हो गए। उसी क्षण शिव प्रकट हुए और कहने लगे कि मुनि की माँग लोक-कल्याणार्थ है। आपके दर्शन करके कलियुगी प्राणी पापमुक्त होंगे।

इस पर श्रीकृष्ण ने कहा कि मैं आपके आग्रह और मुनि की भावना को स्वीकार करता हूँ। किंतु अभी तो मैं अपने अपूर्ण कार्यों को पूर्ण करने में व्यस्त हैं। किंतु उनको पूर्ण कर द्वारका में निवास करूँगा और उसके पश्चात् वहाँ से डंकपुर आकर रहना आरभ करूगा।

कहावत है कि यदि कोई यात्री डाकोर में निष्काम भाव से सावन से चार मास बराबर निवास करता है और नियमित तुलसी पत्र अर्पण कर प्रभु दर्शनों से अनिर्वचनीय फलप्राप्ति का अधिकारी होता है।

इस तीर्थधाम के महत्व को उजागर करने तथा यात्रियों को आकर्षित करने में आस-पास के दर्शनीय स्थानों का भी कम योगदान नहीं रहा है। डाकोर से वायव्यकोण में दो कोस की दूरी पर सुरेश्वर ऋषि ने तपस्या कर अपने आराध्य महादेव को प्रसन्न किया था। उस प्राचीन स्थान पर सुरेश्वर महादेव की स्थापना की गई। उसी शिवालय के पास ही रेणु कुंड था, जो काल के प्रभाव से अदृश्य हो गया।

डाकोर से चार कोस पूर्व दिशा में नीलकंठ ऋषि द्वारा स्थापित रणमुक्तेश्वर महादेव का मंदिर है। यहाँ शिवरात्रि पर मेला लगता है।

इस प्रकार डाकोर से पश्चिम की ओर चार कोस पर खलदपुर गाँव में नीलकंठ महादेव की मूर्ति है। वहाँ पर गालव ऋषि के उपदेश से तेजपाल और राजपाल वैश्यों ने महादेव को प्रसन्न करने हेतु आराधना की थी।

डाकोर से अग्निकोण में दो कोस की दूरी पर भेषज वन में चमत्कारी हनुमानजी की मूर्ति है। लोक-मान्यता है कि यहाँ नियमित सेवा-पूजा करने से शनि की पीड़ा मिटती है।

डाकोर से पूर्व दिशा की ओर छह कोस की दूरी पर गलतेश्वर महादेव का विशालकाय मंदिर है। इस शिवालय की स्थापना गालव ऋषि ने की थी। वहाँ गालवी गंगा की निरंतर जलधारा आज भी प्रवाहित होती रहती है।

यह तीर्थस्थान नडियाद से 38 और आर्शीद से 30 कि.मी. दूर है तथा बस मार्ग से जुड़ा हुआ है। यहाँ से बड़ौदा, सूरत, बंबई, अहमदाबाद, इंदौर, उज्जैन शामलाती, उदयपुर, नाथद्वारा आदि अनेक शहरों एवं धार्मिक स्थानों को पथ परिवहन निगमों की बसें नियमित आती-जाती रहती हैं।


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