Dakshineswar Kali Temple Kolkata History in Hindi : दक्षिणेश्वर काली टेम्पल कोलकाता वेस्ट बंगाल

0
49
Dakshineswar Kali Temple Kolkata History in Hindi

 

Dakshineswar Kali Temple Kolkata History in Hindi


 

Where is Dakshineswar Kali Temple : दक्षिणेश्वर काली मंदिर कहाँ है

दक्षिणेश्वर काली मंदिर पश्चिम बंगाल के कोलकाता शहर में है, दक्षिणेश्वर कलकत्ता के पूर्वी छोर पर करीब चौंसठ बीघे क्षेत्र में फैला विशाल प्रांगणयुक्त पावन स्थल है। यह हुगली नदी के पुराने पुल से बिलकुल सटा हुआ है,

Dakshineswar Kali Temple History in Hindi :

इसका निर्माण सन् 1856 में बंगाल की अहिल्याबाई रानी रासमणि ने कराया था, जहाँ स्वामी परमहंस रामकृष्ण देव और उनकी अद्धगिनी शारदा देवी ने महाकाली की बरसों आराधना की थी। रामकृष्ण को इसी स्थान पर दिव्य ज्योति मिली और यह स्थल तभी से प्रसिद्ध हुआ। इसकी गणना प्रसिद्ध तीर्थस्थलों में होती है। मंदिर के घेरे में चबूतरे पर बारह शिव मंदिर भी हैं, दक्षिणेश्वर काली मंदिर के निर्माण में आठ वर्ष लगे और करीब आठ लाख की राशि खर्च हुई

इसका विशाल प्रांगण सीढ़ीदार भागीरथी का पक्का घाट, बंगाली स्थापत्य कला के अनुरूप बने मंदिर आँगन के कोने में स्वामी रामकृष्णदेव का शांत पावन कक्ष और इसके चारों ओर फैला आस्था का वातावरण मन को बरबस मोह लेता है। इसके शांत वातावरण से आस्तिक व्यक्ति अभिभूत हुए बिना नहीं रहते।

आज यह स्थान मातृशक्ति मां जगदंबा की प्रतिमा से मंडित काली मंदिर से सुशोभित है, जो द्रविड़ों, नागों की आद्य शक्ति थीं।

कालांतर में इसे आर्यों ने महिषासुर मर्दिनी के रूप में अपनाया। चूंकि माँ जगदंबा जीवन का स्रोत हैं – जीवन का भरण-पोषण, जन्म-मृत्यु सब कुछ उस माँ की सृष्टि है और भक्ष्य भी;

क्योंकि जो जन्म लेता है, उसकी मृत्यु भी निश्चित है। जो मर गए हैं, उनका पुनर्जन्म भी निश्चित है। यह चक्र एक अनंत और शाश्वत सत्य है। मृत्यु पूर्णतया सब कुछ नष्ट नहीं करती। बिलकुल शून्य भी नहीं बनाती। इस मायामय संसार में केवल रूप ही परिवर्तित होता है। अत: माँ की प्रतिकृति जीवन के अनंत नवीकरण का दिव्य आश्वासन रूप है। यह दक्षिणेश्वर आज माँ के काली मंदिर, रामकृष्णदेव के साधनापीठ, काली मंदिर से नासिदूर ग्राम में रामकृष्ण संघ परिचालित आद्यपीठ, मातृ आश्रम एवं बाल आश्रम के कारण प्रख्यात है।

Dakshineswar Kali Temple ki Katha : दक्षिणेश्वर काली मंदिर की कथा

कथा बताती है कि रानी रासमणि बंगभूमि की धर्मपरायण महिला थीं और वह शंकर-भवानी की पुजारिन थीं। बंगाल के तमाम मंदिर, धर्मशालाएँ,कुएं, तालाब, घाट आदि उन्हीं के बनवाए हुए हैं।

एक दिन अपने जामाता मथुरा बाबू से उन्होंने काशी विश्वनाथ की दर्शनिच्छा व्यक्त की। यात्रा की योजना बनने लगी। किंतु एक दिन विश्वेश्वर विश्वनाथ की अन्नपूर्णा ने रानी रासमणि को स्वन में दर्शन दिया। बोली, ‘‘अरे बावली तू विश्वेश्वर विश्वनाथ की खोज में काशी यात्रा कर रही है। यहीं गंगा तट पर मेरे पूजन-अर्चन का प्रबंध कर।’

स्वप्नाविष्ट रानी ने काशी यात्रा की योजना स्थगित कर दक्षिणेश्वर ग्राम के निकट चौंसठ बीघे भूमि क्रय करके, 1847 . में जगदंबा के मंदिर के निर्माण का कार्य आरंभ किया गया। भागीरथी के तट पर सुदृढ़ बाँधों का निर्माण कर मंदिर निर्माण आरंभ किया गया। भवतारिणी के नवचूड़ा मंडित मंदिर के निर्माण के पूर्व बारह शिव मंदिरों का निर्माण हुआ था। जानेश्वर, जलेश्वर, जगदीश्वर, नाकेश्वर एवं निरजेश्वर आदि।

All Information about Dakshineswar Kali Temple :

योगेश्वर शिव के ये बारह रथ इन बारह शिव मंदिरों में स्थापित हैं, जिनमें प्रत्येक मंदिर की परिसीमा 4 ,40,220 है, जिन्हें देखकर ‘नमो: विश्व सृजेत्रिधा स्थित्मत्मने’ के भाव से चित्त परिपूरित हो उठता है। शिवजी की नित्य पूजा एवं संध्या समय आरती होती है।

शिव मंदिर के बीच भीतर से गंगाजी के घाट पर जाने का रास्ता है। गंगा की पूर्व दिशा में नवचूड़ा मंडित काली मंदिर और विष्णु मंदिर हैं। इन मंदिरों के साथ ही मंदिर के कर्मचारियों का निवास कक्ष भी बनाया गया है ।

यह मंदिर प्रांगण के बीच में है। देवी की मूर्ति चाँदी के शतदल पर विराजती है। शवासन की मुद्रा में शिव कमल पर लेटे हैं। उनके प्रशस्त वक्ष पर काली का दायाँ पैर अड़ा है। महाकाल सफेद संगमरमर के और महाकाली काले संगमरमर की हैं। महाकाली की दाईं ओर रामकृष्ण परमहंस का चित्र और बाईं ओर गणेश की प्रतिमा है। स्वामी रामकृष्ण की इच्छा के अनुसार उनके वंशज माँ की पूजा करते हैं। यहाँ पर शिवरात्रि, नवरात्र और काली-पूजा (दीपावली) के अवसर पर
मंदिर में विशेष उत्सव होता है। काली-पूजा की रात्रि में भेंसे की बलि एवं अन्य अवसरों पर छागलों की बलि दी जाती है।

काली मंदिर के उत्तर में राधाकृष्ण मंदिर है। मंदिर के मुख्य प्रवेशद्वार के बगल में ही कोने पर यह पवित्र कक्ष है, जहाँ रामकृष्णदेव ने तीन दशकों तक निवास किया था। इस कक्ष में उनके द्वारा प्रयुक्त पलंग, मसहरी, तकिया, लकड़ी का बक्सा, रामायण, चश्मा और वस्त्र स्मृतिचिह्न के रूप में सुरक्षित हैं। पलंग पर रामकृष्णदेव का मूल चित्र है। वे जिस चौकी पर बैठकर शास्त्र-चर्चा किया करते थे, वह मौजूद है। कमरे के पश्चिम में गोलाकार बरामदा है, जहाँ बैठकर स्वामीजी गंगा की लहरों को घंटों निहारा करते थे।

इस जगविख्यात मंदिर की एक महिमा यह भी है कि खुदीराम चटर्जी के सुपुत्र प्रभु रामकृष्णदेव ने इस मंदिर में तीस वर्षों तक पुजारी एवं साधक के रूप में वास किया था। इस मंदिर परिसर में अवस्थित साधन वेदी पंचवटी में अपनी साधना में लीन होने से पूर्व तक उन्होंने इस मंदिर के सांगोपांग पूजन-अर्चन का भार सँभाला। तत्पश्चात् अपने ही भ्राता रामलाल चटर्जी को यह कार्यभार दिया।

आज भी उनके ही वंशज इस कार्य को संपन्न करते आ रहे हैं। यहाँ काली मंदिर में माँ की प्रतिदिन षोड्शोपचार पूजा होती है। मंदिर के विभिन्न कक्षों में सुप्रसिद्ध अवतारों की छवियाँ अंकित हैं।

दक्षिणेश्वर मंदिर के परिसर में कुठीबाड़ी है, जिसमें रानी रासमणि के मथुरा बाबू कहकर मंदिर का कार्यकलाप, संचालन एवं प्रबंध कार्य सँभालते थे। इसी परिसर में अवस्थित शांति कुटीर से ठाकुर (महाप्रभु रामकृष्णदेव) वेदांत पद्धति से
मां की आराधना करते थे ।

आम,  बेल, वट, पीपल इत्यादि वृक्ष समूहों वाला बल्लरियों एवं गुल्मों से मंडित समस्त परिसर गंगातट पर हरीतिमा एवं शांति की मानो एक अपूर्व दृश्यावली उपस्थित करता है। ज्योत्स्ना निशीथ में संपूर्ण परिवेश की शोभा अतुलनीय हो उठती है। गंगा तट पर खड़े होकर देखने से इसकी छवि ज्योत्स्ना निशीथ में अनुपम दिखाई देती है।

दक्षिणेश्वर का दर्शन अपने में एक अपूर्व अनुभूति है, जो सहज ही मन को अन्य दिशाओं से हटाकर बाँध लेता है। आज यह तीर्थों का तीर्थ बन गया है। यहाँ पर रामकृष्णदेव की स्मृतियाँ भी अक्षुण्ण बनी हुई हैं, जिनसे बंगभूमि का प्रत्येक पर अनुप्राणित है। इसी परिषर में अवस्थित मुख्य मंदिर के समक्ष ही नाट्य मंदिर, माँ के पूजन-अर्चन के सामूहिक भक्ति गीतों से जब मुखरित हो उठता है, तब एक-एक दर्शनार्थी हृदय से देवी स्तुति की भावमुद्रा में पहुँच जाता है। एक ऐसा आदर्श सम्मुख उपस्थित होता , जिसमें समस्त सांसारिक क्षुद्रताएँ स्वत: विलीन हो जाती हैं।

Dakshineswar Kali Temple Yatra : दक्षिणेश्वर काली मंदिर की यात्रा

आज इस स्थान पर कोलकाता से पहुँचने के लिए आधुनिकतम साधन मोटर, रेलगाड़ी दोनों ही हैं। पर्यटन कार्यालय से भी इस स्थान के परिदर्शन की व्यवस्था है। वैसे तो सियालदह होकर बस से भी दक्षिणेश्वर जाया जा सकता है।

ऐतिहासिक विलिंग्टन पुल से सटा हुआ दक्षिणेश्वर रेलवे स्टेशन है। रेल एवं बस स्टैंड से काली मंदिर दो-तीन मिनट का मार्ग है। गंगा-तट पर स्थित यह जगत् प्रसिद्ध स्थान भक्ति की एक गवाक्ष सृष्टि है, जो सर्वजन सुलभ है और आत्मा को तेजोदीप्त बनाने की एक उदाम कल्पना है।

रामकृष्णदेव की यह साधना-भूमि उन गिने-चुने मंदिरों में से एक है, जहाँ पहुँचकर क्लांत मन को बड़ी शांति मिलती है और एक अनिर्वचनीय आनंद का बोध होता है। दक्षिणेश्वर काली भवतारिणी देवी हैं, इसलिए उनकी मुखमुद्रा सात्विक है।

कहा जाता है कि भगवती ने उनकी साधना-तपस्या से प्रसन्न होकर बालिका के रूप में उन्हें दर्शन दिया था। इस तरह यह एक सिद्धपीठ है


दोस्तों हमारा यह पोस्ट भी हमारे Religious Places in India, Temple in Hindi का ही हिस्सा है, आगे भी हम आपको  Religious Places in India, Temple in Hindi में अनेक दुसरे महत्वपूर्ण विषयों पर जानकारी देते रहेंगें, अगर आपका कोई सवाल है तो आप Comment Box में लिखकर हमें भेज सकते है

If you like Dakshineswar Kali Temple Kolkata History in Hindi : दक्षिणेश्वर काली टेम्पल कोलकाता वेस्ट बंगाल, its request to kindly share with your friends on FacebookGoogle+Twitter, Pinterest and other social media sites

दोस्तों ऐसे अच्छे Post लिखने में काफी समय लगता है, आपके comments से हमारा Motivation Level बढ़ता है आप comment करने के लिए एक मिनट तो निकाल ही सकते है

LEAVE A REPLY