Essay on Importance of Discipline in Hindi : अनुशासन का महत्व

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Essay on Importance of Discipline in Hindi

Essay on Importance of Discipline in Hindi : अनुशासन का महत्व


उत्तम स्वास्थ्य का आनन्द पाने के लिए, परिवार में खुशी लाने के लिए और सबको शान्ति प्रदान करने के लिए सबसे पहले अनुशासित बनने और अपने मस्तिष्क पर नियन्त्रण प्राप्त करने की आवश्यकता है।”

भगवान बुद्ध द्वारा सम्पूर्ण जगत् को दिए गए इस सन्देश में अनुशासन को महिमामण्डित किया गया है। ‘अनुशासन शब्द शासन में अनु’ उपसर्ग के जुड़ने से बना है, इस तरह अनुशासन का शाब्दिक अर्थ है-शासन के पीछे चलना।

प्राय: मातापिता एवं गुरुजनों के आदेशानुसार चलना ही अनुशासन कहलाता है, किन्तु यह अनुशासन के अर्थ को सीमित करने जैसा है। व्यापक रूप से देखा जाए तो स्वशासन अर्थात् आवश्यकतानुरूप स्वयं को नियन्त्रण में रखना भी अनुशासन ही है।

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अनुशासन के व्यापक अर्थ में, शासकीय कानून के पालन से लेकर सामाजिक मान्यताओं का सम्मान करना ही नहीं, बल्कि स्वस्थ रहने के लिए शारीरिक नियमों का पालन करना भी सम्मिलित है।

इस तरह, सामान्य एवं व्यावहारिक रूप में, व्यक्ति जहाँ रहता है, वहाँ के नियमकानून एवं सामाजिक मान्यताओं के अनुरूप आचरण एवं व्यवहार करना ही अनुशासन कहलाता है। माइकल जे. फ़ॉक्स ने इसे परिभाषित करते हुए कहा है-‘इस बात पर ध्यान दिए बिना कि कोई हमें देख रहा है अथवा नहींकिसी कार्य को सही ढंग से करना ही अनुशासन है।

जैसा कि प्रारम्भ में बताया गया है ‘अनुशासन का अर्थ होता है -शासन के पीछे चलना इस अर्थ से देखा जाए तो जैसा शासन होगा, वैसा ही अनुशासन होगा। इस प्रकार, यदि कहीं अनुशासनहीनता व्याप्त है, तो कहीं-न-कहीं इसमें अच्छे शासन का अभाव भी ज़िम्मेदार होता है। यदि परिवार के मुखिया का शासन सही नहीं है, तो परिवार में अव्यवस्था व्याप्त रहेगी ही। यदि किसी स्थान का प्रशासन सही नहीं है, तो वहाँ अपराध का ग्राफ स्वाभाविक रूप से ऊपर ही रहेगा। यदि राजनेता कानून का पालन नहीं करेंगे, तो जनता से इसके पालन की उम्मीद नहीं की जा सकती

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यदि खेल के मैदान में कैप्टन स्वयं अनुशासित नहीं रहेगा, तो टीम के अन्य सदस्यों से अनुशासन की आशा करना व्यर्थ है। और यदि टीम अनुशासित नहीं है, तो उसकी पराजय से उसे कोई नहीं बचा सकता। इसी तरह, यदि देश की सीमा पर तैनात सैनिकों का कैप्टन ही अनुशासित न हो, तो उसकी सैन्य टुकड़ी कभी अनुशासित नहीं रह सकती, परिणामस्वरूप देश की सुरक्षा निश्चित रूप से खतरे में पड़ जाएगी। राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी के शब्दों में-अनुशासन के बिना न तो परिवार चल सकता है और न संस्था या राष्ट्र ही।” सचमुच यदि परिवार के सदस्य अनुशासित न हों, तो उस परिवार का अव्यवस्थित होना स्वाभाविक है। सरकारी कार्यालयों में यदि कर्मचारीगण अनुशासित न हों, तो वहाँ भ्रष्टाचार का बोलबाला हो जाता है। अनुशासन के अभाव में किसी भी समाज में अराजकता व्याप्त हो जाती है। अत: अनुशासन किसी भी सभ्य समाज की मूलभूत आवश्यकता है। अनुशासन न केवल व्यक्तिगत हित बल्कि सामाजिक हित के दृष्टिकोण से भी अनिवार्य है।

एक बच्चे का जीवन उसके परिवार से प्रारम्भ होता है। यदि परिवार के सदस्य गलत आचरण करते हैं, तो बच्चा भी उनका अनुसरण करेगा। परिवार के बाद बच्चा अपने समाज एवं स्कूल से सीखता है। यदि उसके साथियों का आचरण खराब होगा, तो उससे उसके भी प्रभावित होने की पूरी सम्भावना बनी रहेगी। यदि शिक्षक का आचरण गलत है, तो भला बच्चे कैसे सही हो सकते हैं। इसलिए आवश्यक है कि हम अपने आचरण में सुधार लाकर स्वयं अनुशासित रहते हुए बाल्यकाल से ही बच्चों में अनुशासित रहने की आदत डालें। वही व्यक्ति अपने जीवन में अनुशासित रह सकता है, जिसे बाल्यकाल में ही अनुशासन की शिक्षा दी गई हो। बाल्यकाल में जिन बच्चों पर उनके मातापिता लाड़-प्यार के कारण नियन्त्रण नहीं रख पाते, वही बच्चे आगे चलकर गलत रास्ते पर चल पड़ते हैं एवं अपने जीवन में कभी सफल नहीं होते।

अनुशासन के अभाव में कई प्रकार बुराइयाँ समाज की में अपनी जड़ें जमा लेती हैं। नित्य-प्रति होने वाले छात्रों के
विरोधप्रदर्शन, परीक्षा में नकल, शिक्षकों से बदसलूकी अनुशासनहीनता के ही उदाहरण हैं। इसका दुष्परिणाम उन्हें बाद
में जीवन की असफलताओं के रूप में भुगतना पड़ता है, किन्तु जब तक वे समझते हैं, तब तक देर हो चुकी होती है।

विद्या अर्जित करने के लिए विद्यार्थियों को अपने शिक्षकों के निर्देशों का अनुसरण करना पड़ता है। यदि कोई संगीत में निपुण होना चाहता , तो उसे नियमित रूप से इसका अभ्यास करना ही पड़ेगा। खिलाड़ी बनने के लिए व्यक्ति को
नियमित रूप से शारीरिक ध्यान व्यायाम करने के साथ-साथ अपने आहार-व्यवहार का भी रखना पड़ता है। यदि मनुष्य
अपने खानपान का ध्यान न रखे तो उसका शरीर भी उसका साथ नहीं देता और अनेक प्रकार की बीमारियों के कारण
उसे कई प्रकार के कष्टों को भोगना पड़ता है।

किसी मनुष्य की व्यक्तिगत सफलता में भी उसके अनुशासित जीवन की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। जो छात्र
अपना प्रत्येक कार्य नियम एवं अनुशासन का पालन करते हुए सम्पन्न करते हैं, वे अपने अन्य साथियों से न केवल श्रेष्ठ
माने जाते हैं, बल्कि सभी के प्रिय भी बन जाते । महात्मा गाँधी, स्वामी विवेकानन्द, सुभाषचन्द्र बोस, लोकमान्य बालगंगाधर तिलक, डॉ. भीमराव अम्बेडकर, दयानन्द सरस्वती जैसे महापुरुषों का जीवन अनुशासन के कारण ही समाज के लिए उपयोगी और हम सबके लिए प्रेरणा-स्रोत बन सके,

रॉय स्मिथ ने ठीक ही कहा है-

“अनुशासन वह निर्मल अग्नि है, जिसमें प्रतिभा, क्षमता में रूपान्तरित हो जाती है”

किसी भी राष्ट्र की प्रगति तभी हो सकती है, जब उसके नागरिक अनुशासित हों। यदि हम चाहते हैं कि हमारा समाज एवं राष्ट्र प्रगति के पथ पर निरन्तर अग्रसर रहेतो हमें अनुशासित रहना ही पड़ेगाक्योंकि जब हम स्वयं अनुशासित रहेंगेतभी किसी दूसरे को अनुशासित रख सकेंगे। अनुशासन ही देश को महान् बनाता है, यह कोई अतिशयोक्ति नहीं, बल्कि वास्तविकता है। देश का नागरिक होने के नाते प्रत्येक व्यक्ति का देश के प्रति कुछ कर्तव्य होता है जिसका पालन अनुशासित होकर ही किया जा सकता है। अत: हम सभी देशवासियों को जीवन में अनुशासन को महत्व देते हुए अपने कर्तव्य-पथ पर ईमानदारीपूर्वक चलने और देश की सेवा करने का संकल्प लेना होगा, तभी हम सच्चे अर्थों में अपनी मातृभूमि और भारत माता का कर्ज चुका पाएँगे।


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