Essay on Pollution in Hindi : पर्यावरण प्रदूषण पर निबन्ध

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Essay on Pollution in Hindi

Essay on Pollution in Hindi 

पर्यावरण प्रदूषण पर निबन्ध


धरती के प्राणियों एवं वनस्पतियों को स्वस्थ व जीवित रहने के लिए हमारे पर्यावरण का स्वच्छ रहना अति आवश्यक है, किन्तु मानव द्वारा स्वार्थ सिद्धि हेतु प्रकृति का इस प्रकार से दोहन किया जा रहा है कि हमारा पर्यावरण दूषित हो चला है और आज पर्यावरण प्रदूषण भारत ही नहीं, बल्कि विश्व की एक गम्भीर समस्या बन गई है। इस समस्या से निपटने के लिए अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर अनेक प्रयास किए जा रहे हैं।

हमारी पूर्व प्रधानमन्त्री स्व. श्रीमती इन्दिरा गाँधी ने कहा था–“यह बड़े दुख की बात है कि एक के बाद दूसरे देश में विकास का तात्पर्य प्रकृति का विनाश समझा जाने लगा है। जनता को अच्छी विरासत से दूर किए बिना और प्रकृति के सौन्दर्य, ताज़गी व शुद्धता को नष्ट किए बिना ही मानव जीवन में सुधार किया जाना चाहिए

पर्यावरण में सन्दूषकों (अपशिष्ट पदार्थों) का इस अनुपात में मिलना, जिससे पर्यावरण का सन्तुलन बिगड़ता है, प्रदूषण कहलाता है। प्रदूषण के कई रूप हैं जल प्रदूषणवायु प्रदूषणभूमि प्रदूषणध्वनि प्रदूषण इत्यादि। जल में अपशिष्ट पदार्थों का मिलना जल प्रदूषणवायु में विप्रैली गैसों का मिलना वायु प्रदूषण, भूमि में रासायनिक अपशिष्टों का मिलना -भूमि या मिट्टी प्रदूषण एवं वातावरण में अत्यधिक शोर का होना-ध्वनि प्रदूषण कहलाता है। इन प्रदूषणों के अतिरिक्त कुछ अन्य प्रदूषण भी हैं, जैसे प्रकाश प्रदूषण, रासायनिक प्रदूषण, रेडियोधर्मी प्रदूषण आदि ।

उल्लेखनीय है कि पर्यावरण प्रदूषण से एक ओर तो हमारा वातावरण प्रदूषित हो रहा है एवं दूसरी ओर इसके कारण अन्य जटिल समस्याएँ भी उत्पन्न हो रही हैं। विभिन्न प्रकार के जीव-जन्तुओं और पेड़पौधों से परिपूर्ण सौरमण्डल के ग्रह पृथ्वी के वातावरण में 78% नाइट्रोजन21% ऑक्सीजन तथा 3% कार्बन डाइ-ऑक्साइड शामिल हैं। इन गैसों का पृथ्वी पर समुचित मात्रा में होना जीवन के लिए अनिवार्य है, किन्तु जब इन गैसों का आनुपातिक सन्तुलन बिगड़ जाता है, तो जीवन के लिए प्रतिकूल परिस्थितियाँ उत्पन्न हो जाती हैं। विश्व में आई औद्योगिक क्रान्ति के बाद से ही प्राकृतिक संसाधनों का दोहन शुरू हो गया था, जो उन्नीसवीं एवं बीसवीं शताब्दी में अपने चरम पर रहा, कुपरिणामस्वरूप पृथ्वी पर गैसों का आनुपातिक सन्तुलन बिगड़ गया, जिससे विश्व की जलवायु पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा एवं प्रदूषण का स्तर इतना अधिक बढ़ गया कि यह अनेक जानलेवा बीमारियों का कारक बन गया।

आज मानव गतिविधियों के दुष्परिणामस्वरूप हमारे वातावरण में प्रत्येक वर्ष 30 अरब टन कार्बन डाइऑक्साइड गैस छोड़ी जा रही है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्लूएचओ) की एक रिपोर्ट के अनुसारविश्व में प्रत्येक वर्ष लगभग 13 लाख लोग केवल शहरी आउटडोर वायु प्रदूषण के कारण और लगभग 2 लाख लोग इनडोर प्रदूषण के कारण अपनी जान गंवा देते हैं। वर्ष 2014 के अन्त में संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (यूएनईपी) द्वारा जारी की गई रिपोर्ट में कहा गया है। कि प्रतिवर्ष वायु प्रदूषण से जुड़ी लगभग एक लाख मौतें भारत सहित अमेरिका, ब्राजील, चीन, यूरोपीय संघ और मैक्सिको में होती हैं, किन्तु परिवहन, इमारत एवं औद्योगिक क्षेत्रों में ऊर्जा दक्षता के उपाय कर वर्ष 2030 तक वार्षिक स्तर पर इनसे बचा जा सकता है।

प्रदूषण के कई कारण हैं उद्योगों से निकलने वाले रासायनिक अपशिष्ट पदार्थ जल एवं भूमि प्रदूषण का तो कारण बनते ही हैं, साथ ही इनके कारण वातावरण में विपैली गैसों के मिलने से वायु भी प्रदूषित होती है। मनुष्य ने अपने लाभ के लिए जंगलों की तेज़ी से कटाई की है। जंगल के पेड़ प्राकृतिक रूप से प्रदूषण नियन्त्रण का काम करते हैं। पेड़ों के पर्याप्त संख्या में न होने के कारण भी बातावरण में विप्रैली गैसें जमा होती रहती हैं और उनका शोधन नहीं हो पाता। मनुष्य सामानों को ढोने के लिए पॉलिथीनों का प्रयोग करता है। प्रयोग के बाद इन पॉलिथीनों को यूं ही फेंक दिया जाता है। ये पॉलिथीनें नालियों को अवरुद्ध कर देती हैं, जिसके फलस्वरूप पानी एक जगह जमा होकर प्रदूषित होता रहता है। इसके अतिरिक्त, ये पॉलिथीनें भूमि में मिलकर उसकी उर्वराशक्ति को भी कम कर देती हैं। प्रौद्योगिकी में प्रगति के साथ ही मनुष्य की मशीनों पर निर्भरता बढ़ी है। मोटररेलघरेलू मशीनें इसके उदाहरण हैं।

इन मशीनों से निकलने वाला धुँआ भी पर्यावरण के प्रदूषण के प्रमुख कारकों में से एक है। बढ़ती जनसंख्या को भोजन उपलब्ध करवाने के लिए खेतों में रासायनिक उर्वरकों के प्रयोग में वृद्धि हुई है। इसके कारण भूमि की उर्वराशक्ति का ह्रास हुआ है। रासायनिक एवं चमड़े के उद्योगों के अपशिष्टों को नदियों में बहा दिया जाता है। इस कारण जल प्रदूषित हो जाता है एवं नदियों में रहने वाले जन्तुओं पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। परमाणु शक्ति उत्पादन के क्रम में परमाणु विखण्डन के कारण भी पर्यावरण प्रदूषण काफ़ी बढ़ता है।

विश्व के महान् वैज्ञानिक स्टीफन हॉकिंग ने इसकी जगह परमाणु संलयन को विकल्प बताते हुए कहा है-‘हम एक व्यावहारिक शक्ति स्रोत बनने हेतु परमाणु संलयन चाहते हैं। यह प्रदूषण या ग्लोबल वार्मिंग के बिना ऊर्जा की बड़ी आपूर्ति प्रदान करेगा’

पर्यावरण प्रदूषण के कई दुष्परिणाम सामने आए , इसका सर्वाधिक प्रतिकूल प्रभाव मानव के स्वास्थ्य पर पड़ा है। आज मनुष्य का शरीर अनेक बीमारियों का घर बनता जा रहा है। खेतों में रासायनिक उर्वरकों के माध्यम से उत्पादित खाद्य पदार्थ स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से सही नहीं हैं। वातावरण में घुली विशैली गैसों एवं धुएं के कारण शहरों में मनुष्य का सास लेना भी दूभर होता जा रहा है। विश्व की जलवायु में तेज़ी से हो रहे परिवर्तन का कारण भी पर्यावरणीय असन्तुलन एवं प्रदूषण ही है।

मनुष्य स्वाभाविक रूप से प्रकृति पर निर्भर है। प्रकृति पर उसकी निर्भरता तो समाप्त नहीं की जा सकती, किन्तु प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग करते समय हमें इस बात का ध्यान रखना पड़ेगा कि इसका प्रतिकूल प्रभाव पर्यावरण पर न पड़ने पाए, इसके लिए हमें उद्योगों की संख्या के अनुपात में बड़ी संख्या में पेड़ों को लगाने की आवश्यकता है। इसके अतिरिक्त, पर्यावरण प्रदूषण को कम करने के लिए हमें जनसंख्या को स्थिर बनाए रखने की भी आवश्यकता है, क्योंकि जनसंख्या में वृद्धि होने से स्वाभाविक रूप से जीवन के लिए अधिक प्राकृतिक संसाधनों की आवश्यकता पड़ती है और इन आवश्यकताओं को पूरा करने के प्रयास में बड़े स्तर पर उद्योगों की स्थापना होती है और उद्योग कहीं-न-कहीं प्रदूषण का कारक भी बनते हैं।

यदि हम चाहते हैं कि प्रदूषण कम हो एवं पर्यावरण की सुरक्षा के साथसाथ सन्तुलित विकास भी हो, तो इसके लिए हमें नवीन प्रौद्योगिकी का प्रयोग करना होगा। प्राकृतिक संसाधनों की सुरक्षा तब ही सम्भव है, जब हम इनका उपयुक्त प्रयोग करें, हमारे पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम ने कहा है-हमें विज्ञान और प्रौद्योगिकी के अनुप्रयोग के माध्यम से पानी, ऊर्जा, निवास स्थान, कचरा प्रबन्धन और पर्यावरण के क्षेत्रों में पृथ्वी द्वारा ली जाने वाली समस्याओं को दूर करने के लिए काम करना चाहिए’

उल्लेखनीय है कि पर्यावरण प्रदूषण पर नियन्त्रण के लिए समय-समय पर अन्तर्राष्ट्रीय प्रयास भी किए जाते रहे हैं। ओजोन परत के संरक्षण के लिए वर्ष 1985 में वियना सम्मेलन हुआ। वियना समझौते के परिणामस्वरूप वर्ष 1987 में ओजोन परत में छेद करने वाले पदार्थ पर मॉष्ट्रियल समझौता हुआ। इसके बाद वर्ष 1990 में जापान में क्योटो प्रोटोकॉल में तय किया गया कि विकसित देश पृथ्वी के बढ़ते तापमान से दुनिया को बचाने के लिए अपने यहाँ ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में कमी लाएँगे। प्रदूषण को कम करने तथा विश्वस्तरीय ग्लोबल वार्मिग एवं जलवायु परिवर्तन की प्रक्रिया को नियन्त्रित करने के लिए कार्बन क्रेडिट का सिद्धान्त प्रस्तुत किया गया है तथा इसको नियमित रूप से नियन्त्रित करने के लिए एक स्वच्छ विकास प्रणाली का गठन किया गया है।

नवम्बर2007 में सम्पन्न आसियान के 18वें शिखर सम्मेलन में ऊर्जा, पर्यावरण, जलवायु परिवर्तन तथा सतत विकास को विचारणीय विषय बनाया गया। इण्डोनेशिया के बाली में वर्ष 2007 में ही सम्पन्न संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन सम्मेलन में 180 देशों एवं अनेक अन्तर्राष्ट्रीय संगठनों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया। इस सम्मेलन में क्योटो सन्धि के आगे की रणनीति पर विचार किया गया। दिसम्बर 2009 में सम्पन्न कोपेनहेगन सम्मेलन का उद्देश्य भी पर्यावरण की सुरक्षा ही था।

वस्तुत: पर्यावरण प्रदूषण एक वैश्विक समस्या है, जिससे निपटना वैश्विक स्तर पर ही सम्भव है, किन्तु इसके लिए प्रयास स्थानीय स्तर पर भी किए जाने चाहिएविकास एवं पर्यावरण एक-दूसरे के विरोधी नहीं , अपितु एक-दूसरे के पूरक हैं। सन्तुलित एवं शुद्ध पर्यावरण के बिना मानव का जीवन कष्टमय हो जाएगा। हमारा अस्तित्व एवं जीवन की गुणवत्ता एक स्वस्थ प्राकृतिक पर्यावरण पर निर्भर है। विकास हमारे लिए आवश्यक है और इसके लिए प्राकृतिक संसाधनों का प्रयोग किया जाना भी आवश्यक है, किन्तु ऐसा करते समय हमें इस बात का ध्यान रखना होगा कि इससे पर्यावरण को किसी प्रकार का नुकसान न हो।

पृथ्वी के बढ़ते तापक्रम को नियन्त्रित कर, जलवायु परिवर्तन को कम करने के लिए देशी तकनीकों से बने उत्पादों का उत्पादन तथा उपभाग ज़रूरी है। इसके साथ ही प्रदूषण को कम करने के लिए सामाजिक तथा कृषि वानिकी के माध्यम से अधिक-से-अधिक पेड़ लगाए जाने की भी आवश्यकता है। पर्यावरण प्रदूषण की समस्या को दूर करने के सम्बन्ध में अमेरिकी नागरिक सूसन किसकिस की कही ये बातें अनुकरणीय हैं-“हम चाहे कहीं भी रहें पर्यावरण की देखभाल करना हमारे लिए अत्यन्त महत्वपूर्ण है। छोटे स्तर पर काम शुरू करें, दस या बीस मित्रों के साथ पृथ्वी दिवस मनाएँ। अगले वर्ष यह बहुत बड़ा समूह हो जाएगा और उसके बाद यह जागरूकता विश्वभर में फैल जाएगी।”


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