Guglielmo Marconi Biography in Hindi : गुग्लील्मो मार्कोनी का जीवन परिचय

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Guglielmo Marconi Biography in Hindi

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Guglielmo Marconi Biography in Hindi

डेविड बैकहम का जीवन परिचय


गुग्लील्मो मार्कोनी ने विद्यतु ऊर्जा द्वारा संचार व्यवस्था को उसके उच्चतम रूप में लाने का कार्य किया था। मार्कोनी ने बेतार के तार की पूर्व शोध और गुप्त कंपनों की पूर्व शोध पर आगे का कार्य किया था। संदेशों को कामयाबी के साथ भेजा जाना मार्कोनी के ही प्रयासों का परिणाम था। समुद्र में कोई जहाज विपदा में फंसने की संभावना पर निकटतम बंदरगाह पर मदद की गुहार करता है तो वह मार्कोनी की वजह से ही संभव हुआ। यह दृष्टांत मार्कोनी के कार्य की महानता को सिद्ध करने में पर्याप्त रूप में सक्षम है।

गुग्लील्मो मार्कोनी का जन्म 25 अप्रैल, 1874 को इटली के एक संपन्न परिवार में हुआ। गुग्लील्मो के पिता इटली के मूल निवासी थे और इनकी माता आयरिश महिला थी। मार्कोनी की आरंभिक शिक्षा घर पर ही निजी अध्यापकों की देखरेख में संपन्न हुई। इनका बचपन फ्लोरेंस (बाॅल्गोना) व लेगाॅर्न में बीता था।

बचपन से ही मार्कोनी को भौतिक विज्ञान और विद्युत विषयक शोध-कार्यों में रूचि थी। प्रोफेसर हर्ज ने जब विद्युत लहरों की खोज की, तब उसके बारे में जानकर मार्कोनी बहुत उत्साहित हुए थे। जबकि तब वह महज 12 वर्ष के थे।

भौतिक विज्ञान के प्राध्यापक रिघी ने मार्कोनी को दिखा दिया था कि विद्युत लहरियों की ध्वनि तार के दूसरे सिरे पर कुछ दूरी पर मौजूद रिसीवर द्वारा सुनी जा सकती है। दूसरे प्रयोगों द्वारा भी मार्कोनी ने यह समझ लिया था कि विद्युत ऊर्जा के संचार हेतु तार की जरूरत नहीं होती। फिर मार्कोनी ने इस शोध कार्य को आगे बढ़ाया था। पूर्व शोध को व्यावहारिक रूप देकर बेतार के तार का आविष्कार वस्तुतः मार्कोनी ने ही पूर्ण किया।

मार्कोनी ने प्राथमिक स्तर पर अपने प्रयोग पिता की आर्थिक सहायता से किए थे। वह प्रयोग भी घर के ही बाग में किए गए थे। लेकिन क्रमशः उन्नति करते हुए यह पहले एक मील और फिर दो मील तक संदेश संप्रेषण में सफल रहे। इस समय तक प्रोफेसर हर्ज ने जो सफलताएं प्राप्त की थीं वे सीमित थीं। मार्कोनी ने नई शोध से यह ज्ञात कर लिया था कि दो संदेश स्थलों के बीच कोई पर्वत भी हो तब भी संदेश संप्रेषण हो जाता है। लेकिन एरियल को यदि समकोण में रखा जाए तो प्रेषण परिणाम बेहतर होते हैं। यह मार्काेनी ने जान लिया था।

मार्कोनी के सन् 1896 में अपने आविष्कारों को इंग्लैड सरकार की सेवा में पेश किया। जुलाई माह 1899 में बेतार के तार ने व्यावसायिक रूप धारण कर लिया और लंदन में वायरलैस टेलीग्राफ एंड सिगनल कंपनी की स्थापना हुई। सन् 1898 के आखिर में इंग्लिश चैनल के पार संदेश भेजे गए और प्राप्त भी किए गए। विभिन्न देशों को संदेशों के माध्यम से जोड़ने का मार्कोनी का सपना सच होने लगा था। संपूर्ण संसार भी मार्कोनी की इस खोज को जान गया।

जीत का सूचक क्षण वह था, जब महारानी विक्टोरिया ने औसवोर्न हाउस में प्रिंस आॅफ वेल्स के पास संदेश प्रेषित किया था, जब वह एक सरकारी जहाज पर कार्यरत थे। इस घटना के साथ ही मार्कोनी की यह सोच पूर्ण हुई कि संप्रेषण जलपोतों के मध्य भी संभव हो। इसमें जल सेना के बेड़े को परस्पर संपर्क बनाए रखने में सफलता प्राप्त हुई। इस आविष्कार की नई संभावना उस वक्त सामने आई जब डब्लिन डेली एक्सप्रेस नाम के अखबार ने किंग्सटाउन रिगेटा से संबंध रखती रिपोर्ट भेजने के लिए इस आविष्कार का इस्तेमाल किया।

अक्टूबर 1900 में इन्होंने पर्याप्त दूरी के संप्रेषण हेतु स्टेशनों का निर्माण करना आरंभ किया। इन्होंने काॅर्नवाल में पोल्डू में संकेत भेजने हेतु स्टेशन का निर्माण किया। दिसंबर 1901 में यह खामोशी से न्यूफाउंड लैंड पहुंचें । नाकामी के भय के कारण मार्कोनी ने किसी के समक्ष अपनी योजना का पूर्ण विवरण नहीं रखा, किंतु अपने सहायकों के साथ यह इंतजाम कर लिया था कि वे एक तय किए दिन और तय वक्त पर काॅर्नवाल से सोर्स पद्धति द्वारा तीन डांट वाले संकेत भेजेंगे और उस संदेश को एक टेलीफोन पर प्राप्त करेंगे।

तब वह टेलीफोन चार सौ फीट की ऊंचाई पर आसमान में उड़ने वाली नौ फीट की एक पतंग से जुड़ा होगा। यदि बिजली का स्पार्क 3 हजार मील चैड़े समुद्र के पार भी ध्वनित होगा, तो जीत तय थी। मार्कोनी ने मुकर्रर दिन पर धड़कते दिल से वह प्रयोग किया और तिहरा संकेत प्राप्त कर लिया। यह बहुत बड़ी कामयाबी थी। मार्कोनी के लिए अब नई संभावनाओं का अनंत क्षितिज खुल गया था। इन्होंने अपने कार्य को क्रमोन्नत करना आरंभ कर दिया। इन्होेंने एक स्टेशन स्थापित किया, जहां से जहाजों को संदेश बीच समुद्र में प्राप्त होते थे। फिर सन् 1903 में बेतार के तार के आविष्कार का अनोखा उपयोग उजागर हुआ, जिसे देखकर तमाम दुनिया दंग रह गई। जब रिपब्लिक नामक जहाज दूसरे जलपोत से अटलांटिक महासागर में टकरा गया और उसने समुद्र के मध्य से सहायता हेतु संकटकालीन संदेश भेजा। उसी के साथ वायरलैस द्वारा मानवीय जीवन रक्षा का सिलसिला आरंभ हो गया। इस दुर्घटना में कई व्यक्तियों की प्राणरक्षा संभव हो सकी थी। सन् 1924 में मार्कोनी ने अपने आविष्कार के क्षितिज का महत्वपूर्ण पड़ाव और पार किया। इन्होंने एक ऐसी युक्ति की खोज की जिसके द्वारा बेतार के तार ही लहरियों को एक सीधी रेखा में भी भेजा जा सकता था।

वायरलैस तार की तो खोज हो ही चुकी थी, लेकिन मार्कोनी ने वह मार्ग दिखा दिया था जिस पर चलकर भविष्य में उस आविष्कार की सहायता से दूसरे कार्याें को भी पूर्ण किया जा सकता था। उस मौके पर मार्कोनी ने यह कल्पना कर ली थी कि इन विद्युत तरंगों द्वारा मनुष्य संचार संबंधी ऐसी योग्यता अर्जित कर लेगा कि निकट भविष्य में पृथ्वी पर स्थित बेतार के तार की शाक्ति द्वारा आकाश में उड़ने वाले वायुयानों को भी नियंत्रित एवं संचालित करने में मदद मिलेगी।

इस प्रकार मार्कोनी ने 21 वर्ष की उम्र में अपने जिस काम को आरंभ किया, उसमें वे सदैव जुटे रहे। अपने आविष्कार को पूर्णता प्रदान करने के लिए अंतिम समय तक भी मार्कोनी प्रयासरत रहे। मार्कोनी ने निरंतर 40 वर्ष तक शोध कार्य किया और एक-एक करके खोजों की झड़ी सी लगा दी, जिनकी प्रत्येक खोज मानवोपयोगी भी थी। इन्हें अपने आविष्कारों के लिए अनेक पुरस्कारों और एवं सम्मानों द्वारा अभिनंदित किया गया। सन् 1909 में इनको विश्व का सर्वश्रेष्ठ नोबेल पुरस्कार सम्मान प्रदान किया गया। सन् 1915 में उसको इटली की सीनेट का मानद सदस्य बनाया गया और 1929 में मार्चीज बनाकर भी मान दिया गया।

मार्कोनी ने विश्व को ध्वनि के नवीन आयाम दिखाए, विश्व इनको मूक श्रद्धांजलि देता है। इनके आविष्कार ने विभिन्न राष्ट्रों को एक-दूसरे के साथ बांध दिया है तथा इन्होंने मानव सभ्यता के विकास में एक नवीन युग का प्रवर्तन किया। अंग्रेजी के एक कवि ने मार्कोनी को लक्ष्य करके एक बहुत सुंदर कविता लिखी है। कवि कहता है कि तुम शांत तो बैठोगे नहीं, कोई न कोई आविष्कार करते रहोगे। हम भी इसी आशा को लेकर जीवित हैं कि किसी न किसी दिन तुम अपने स्वर्ग स्थित आवास से बेतार के तार द्वारा हमारे पास अपना संदेश भेजोगे।

63 वर्ष की उम्र प्राप्त कर लेने के बाद 20 जुलाई, 1937 में इन महामानव की मृत्यु हृदयाघात के कारण हुई। यदि ईश्वर ने इन्हें कुछ वर्ष और दिए होते तो तय था कि यह कुछ नए आविष्कार और करते। मानव प्रजाति अपने इस पुत्र के लिए सदैव सम्मान एवं गर्व का अनुभव करती रहेगी।


 

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