संत की विरक्ति | Hindi Story on Disenchanted

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Disenchanted Hindi Stories

संत की विरक्ति

Hindi Story on Disenchanted – Hindi Stories


संत पुरंदर भगवान के सच्चे भक्त तथा विरक्त प्रवृत्ति के महापुरुष थे। भगवान की भक्ति को सर्वोपरि मानकर वे अपना तमाम समय पूजा-अर्चना तथा गरीबों की सेवा में बिताते थे।

विजयनगर के राजा कृष्णदेव ने गृहस्थ में रहते हुए भी उनके निर्लोभी होने की बात सुनी, तो वे आश्चर्य में पड़ गए। उन्होंने अपने मंत्री व्यासराम की सहायता से संत पुरंदर की परीक्षा लेने का निर्णय किया।

संत पुरंदर को दी जाने वाली भिक्षा के चावल में हीरे व रत्न मिलाकर दिए जाने लगे। एक महीने तक भिक्षा के अन्न में छोटे-छोटे हीरे दिए जाते रहे। महीने के अंत में राजा मंत्री को साथ लेकर वेश बदल कर संत पुरंदर के घर जा पहुँचे

उन्होंने दरवाजे में घुसते ही पत्नी की आवाज सुनी-वे पति से कह रही थीं-‘आजकल आप किस गरीब के यहाँ से भिक्षा लाते हैं। वह चावलों में कंकड़ मिला कर देता है। मैं उन्हें बीनते-बीनते परेशान हो जाती हैं।

राजा ने देखा कि कोठरी के एक कोने में उनके द्वारा दिए गए हीरों का ढेर लगा हुआ था। संत पुरंदर ने राजा को पहचान लिया।

वे बोले – “महाराज मैं जानता था कि आप मेरी गरीबी को देखते हुए चुपचाप भिक्षा के चावलों में कुछ हीरे भेजते हैं। परंतु मुझ ब्राह्मण के लिए हीरे व कंकड़ में कोई अंतर नहीं है। इन हीरों को आप ले जाएँ तथा गाँवों में मीठे पानी के कुएं खुदवा दें। इन हीरों की सार्थकता इसी में है”

राजा तथा मंत्री दोनों संत की विरक्तता के सामने नतमस्तक हो उठे

कहनी की शिक्षा – जो इंसान सांसारिक वस्तुओ से विरक्त हो जाता है, उसे हीरे-मोती और पत्थर में कोई फर्क नहीं रह जाता 


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