History of Pakshi Tirth Temple : Thirukazhukundram temple history in HIndi

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History of Pakshi Tirth Temple
History of Pakshi Tirth Temple

दक्षिण भारत का हरेक मंदिर किसी-न-किसी रूप में भगवान शंकर से लगभग जुड़ा हुआ है। दूसरे देवताओं के मंदिर तो वहाँ बहुत कम देखने को मिलते हैं। हाँ, वहाँ पर यह परंपरा जरूर है कि शिव मंदिर में ही भगवान विष्णु, ब्रह्मा आदि अन्य देवताओं की मूर्तियाँ भी बनवाई जाती हैं, लेकिन इन सब मूर्तियों में प्रमुखता शिवजी की मूर्ति को ही दी जाती है। इसीलिए शिवरात्रि के अवसर पर यह स्थल जो कि ‘पक्षी तीर्थ’ के नाम से पूरे भारत में मशहूर है, देखने लायक होता है।

History of Pakshi Tirth Temple : Thirukazhukundram temple history in HIndi


Pakshi Tirth Temple Kaha hai : Vedagiriswarar temple in hindi

पक्षी तीर्थ का असली नाम ‘तिरुक्कलुकोंड्रम’ है। यहाँ पहुँचने के लिए मद्रास से 56 कि.मी. की दूरी पर स्थित चेंगलपट्टू जंक्शन पर उतरना होता है। इस जंक्शन पर उतरने के बाद पक्षी तीर्थ पहुँचने के लिए यहाँ से बस पकड़नी होती है। कई मील का चक्करदार रास्ता तय करने के बाद वेदगिरि की 500 फीट ऊँची पहाड़ी पर एक छोटी सी बस्ती दिखाई देती है।

vedagiriswarar temple in hindi

इसी पहाड़ी पर वेदगिरिश्वर का मंदिर है। इस मंदिर में रोज दो पवित्र पक्षी दोपहर के बारह बजे आते हैं और प्रसाद ग्रहण करते हैं। इन पक्षियों के कारण ही यह स्थान ‘पक्षी तीर्थ’ के नाम से मशहूर हुआ।

Thirukazhukundram temple
Thirukazhukundram temple

Pakshi Tirth Temple ki Katha :

पौराणिक कथा हमें बताती है कि दक्षिण में दो भाई रहते थे। उनमें से एक शिव का भक्त था और दूसरा शक्ति का। दोनों ही अपने-अपने आराध्य को महान् मानते थे। एक दिन शिव की भक्ति करनेवाले भाई ने कहा कि मेरा भगवान बहुत महान् है और दूसरे देवी-देवता भी उनकी पूजा करते हैं। यह बात दूसरे भाई को अच्छी न लगी। उसने कहा कि शिव भला शक्ति से बड़े कैसे हो सकते हैं?

बात बढ़ते-बढ़ते यहाँ तक पहुँची कि दोनों में जबरदस्त झगड़ा हो गया और आखिर में स्वयं शिवजी को उन दोनों भाइयों को समझाने के लिए आना पड़ा। भगवान शिव दोनों ही भक्तों को बहुत प्यार करते थे और उनकी भक्ति से प्रसन्न भी थे।

उन्होंने दोनों भाइयों को समझाते हुए कहा कि शिव और शक्ति एक-दूसरे के पूरक हैं। तुम दोनों बेकार में झगड़ते हो। दोनों ही भाई बहुत जिद्दी थे। उन्होंने शिव की एक न सुनी और अपने-अपने आराधक को एक-दूसरे से बड़ा बताते रहे। इस पर शिवजी को क्रोध आ गया और उन्होंने दोनों ही भाइयों को यह शाप दे दिया कि वे अगले जन्म में पक्षी बन जाएँगे।

अब दोनों भाइयों को अपनी गलती का पता लगा। वे अपनी गलती पर बहुत पछताने लगे। यह किस्सा यहीं खत्म नहीं हुआ। अब उन दोनों भाइयों ने शिव की आराधना करनी शुरू की। उन्होंने कठिन तपस्या की। शिवजी तो ठहरे औघड़
दानी, दोनों की तपस्या से प्रसन्न होकर उन्होंने फिर से दर्शन दिए। दोनों ही भाइयों ने कहा कि भगवान हमसे बहुत भारी भूल हो गई है, अब आप हमें माफ कर दें और किसी तरह अपने इस विकट शाप से मुक्त करें । हमें अज्ञानवश आपकी बात पर ध्यान नहीं दिया।

दोनों भाइयों की प्रार्थना सुनकर शिवजी ने कहा कि अच्छा, मेरा यह शाप द्वापर युग में खत्म हो जाएगा और तुम द्वापर में फिर से मनुष्य योनि में आ जाओगे। अब दोनों भाइयों ने घोर तपस्या की। वे शिवजी की पूजा-उपासना में सब कुछ भूल गए। इस निष्कपट भक्ति से शिवजी काफी प्रभावित हुए और फिर दौड़े हुए अपने भक्तों के पास जा पहुंचे। इस बार भगवान ने उन्हें आशीर्वाद दिया कि थोड़े समय के बाद तुम लोग जन्म-मरण के चक्कर से भी मुक्ति पा जाओगे। मगर अपनी जिद्दी प्रकृति के कारण दोनों भाई फिर अड़ गए कि भगवान थोड़े समय के बाद नहीं, हमें तो आप अभी जन्म-मरण के चक्कर से मुक्त कर दीजिए।

शिवजी फिर उनसे नाराज हो गए और उन्होंने उन दोनों भाइयों को फिर से शाप दे दिया कि कलियुग के अंत तक तुम फिर से पक्षी ही बने रहोगे। इस पौराणिक कथा के आधार पर लोगों का यह विश्वास है कि ‘पक्षी तीर्थ के पवित्र पक्षी वे दोनों भाई ही हैं, जो कलियुग के अंत तक शिवजी के शाप के कारण पक्षी ही बने रहेंगे।

Pakshi Tirth mandir Ka Mahatv : Vedagiriswarar temple in hindi

कहते हैं कि रोज सवेरे ही ये पक्षी स्नान करने वाराणसी जाते हैं और वाराणसी से स्नान कर रामेश्वरम् में पूजा करने जाते हैं। रामेश्वरम् में पूजा करने के बाद ही वे ‘पक्षी तीर्थ में प्रसाद ग्रहण करने आते हैं। पक्षी तीर्थ’ से वे दोनों विश्राम करने चिदंबरम जाते हैं।

vedagiriswarar temple in hindi

पक्षीराज के दर्शन करने के लिए 500 फीट ऊंची पहाड़ी पर चढ़ना होता है। लोग ‘पक्षीराज की जय’ बोलते हुए ऊपर चढ़ते जाते हैं। सभी को यह फिक्र पड़ी रहती है कि कहीं 12 बजे का समय न निकल जाए और पवित्र पक्षी प्रसाद ग्रहण कर चिदंबरम के लिए रवाना न हो जाएँ। चोटी पर पहुँचते ही वहाँ के मनोहारी दृश्य को देखकर मन खिल उठता है। ऊपर से समुद्र के किनारे बने महाबलिपुरम् के मंदिर भी साफ दिखाई देते हैं। ऊपर एक खुली जगह में पुजारी बैठा रहता है। और उसके पास एक बड़े बरतन में पक्षियों के लिए पोंगल रखा रहता है।

जैसे ही घड़ी की सुइयाँ एक-दूसरे का आलिंगन करती हैं, दूर आसमान में दो विशाल पक्षी आते हुए दिखाई देते हैं। पक्षी अपनी तय जगह पर आकर बैठ जाते हैं और पुजारी उन्हें पोंगल खिलाता है। सभी लोग ‘पक्षीराज की जय’ बोलते हैं। थोड़ी ही देर बाद प्रसाद ग्रहण करके पक्षी उड़ जाते हैं और बचे हुए पोंगल को पुजारी प्रसाद के रूप में सभी यात्रियों को बाँटता है।


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