जनलोकपाल विधेयक : भ्रष्टाचार के खिलाफ एक सशक्त हथियार | Jan Lokpal Bill in Hindi

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Jan Lokpal Bill in Hindi
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जनलोकपाल विधेयक : भ्रष्टाचार के खिलाफ एक सशक्त हथियार 

Jan Lokpal Bill in Hindi


अन्ना हजारे, किरण बेदी, स्वामी अग्निवेश, अरविन्द केजरीवाल आदि भ्रष्टाचार विरोधी नेताओं की अगुवाई में जनता के दबाव को देखते हुए अन्तत: 18 दिसम्बर, 2018 को लोकपाल एवं लोकायुक्त विधेयक संसद में पारित हो गया। हालाँकि इस बिल को कानून का रूप देने में काफी वक्त लगा और बहुत सारे समाज सेवकों ने इस कानून को बनवाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

‘जनलोकपाल विधेयक में प्रयुक्त हुआ शब्द ‘लोकपाल’ मूलत: संस्कृत भाषा का शब्द है। इसमें ‘लोक’ का अर्थ है लोग और पाल का अर्थ है-संरक्षक। इस प्रकार लोकपाल का अर्थ हुआ ‘लोगों का संरक्षक’। सर्वप्रथम इस शब्द का प्रयोग सांसद एल एम सिंघवी द्वारा किया गया था।

पहला जनलोकपाल बिल वर्ष 1968 में शान्ति भूषण द्वारा पेश किया गया था और चौथी लोकसभा ने वर्ष 1969 में इसे पारित भी कर दिया था, लेकिन इस बिल को राज्यसभा में स्वीकृति नहीं मिल पाई।

इसके बादवर्ष 1971, 1977, 1985, 1989, 1996 और 2001 में इस बिल को संसद में पेश किया गया, लेकिन विभिन्न राजनीतिक कारणों से यह पारित न हो सका। इस बिल को संसद में पारित होने में जितनी देर हो रही थी, सामाजिक कार्यकर्ताओं और जनता का गुस्सा उतना ही बढ़ रहा था। सरकार पर जनलोकपाल विधेयक को पारित करने
का दबाव बनाने हेतु वर्ष 2011 में सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे ने अपने सहयोगियों के साथ मिलकर अनशन किया। उनके इस आन्दोलन को देशव्यापी समर्थन मिला, तब लोकसभा में तो यह बिल पास हो गया, लेकिन राज्यसभा
में फिर से अटक गया और वर्ष 2013 तक इस पर कोई फैसला न लिया जा सका।

अत: अन्ना हजारे को दिसम्बर2013 में फिर से अनशन का सहारा लेना पड़ा। इस बार उन्हें युवाओं का भी विशेष रूप से मिला। इन सबका परिणाम यह हुआ कि 17 दिसम्बर, 2013 को 16 संशोधनों के साथ जनलोकपाल बिल राज्यसभा में पारित हो गया। फिर इसे 18 दिसम्बर 2013 को लोकसभा में पुनपेश किया गया, जहाँ इसे ध्वनिमत से स्वीकृति मिल गई। इसके बाद इसे राष्ट्रपति के पास भेजा गया।

राष्ट्रपति ने 1 जनवरी2014 को इस विधेयक को स्वीकृति देकर कानून का दर्जा दे दिया। जनलोकपाल कानून 2013
एक मजबूत भ्रष्टाचार विरोधी कानून है, यह एक सशक्त जनलोकपाल की स्थापना का प्रावधान करता है यह चुनाव आयोग की तरह स्वतन्त्र संस्था होगी।
जनलोकपाल के पास भ्रष्ट राजनेताओं एवं नौकरशाहों पर बिना किसी अनुमति के अभियोग चलाने की शक्ति होगी।

इस बिल को तैयार करने में अन्ना हजारे, सन्तोष हेगडे, प्रशान्त भूषण, अरविन्द केजरीवाल सहित कई सामाजिक
कार्यकर्ताओं ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है तथा इसे विभिन्न सामाजिक संगठनों और जनता के साथ व्यापक
विचार-विमर्श करने के बाद तैयार किया गया है।

जनलोकपाल विधेयक की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं ।
1.इस विधेयक के अनुसार, केन्द्र में भ्रष्टाचार विरोधी संस्था ‘लोकपाल और राज्यों में लोकायुक्त का गठन किया जायेगा
2.यह संस्था निर्वाचन आयोग और उच्चतम न्यायालय की तरह सरकार के प्रभाव से मुक्त होगी, जिससे यह स्वतन्त्र
रहकर निष्पक्षतापूर्वक अपना कार्य कर सकेगी
3.लोकपाल संस्था के सदस्यों का चुनाव न्यायाधीशों तथा भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारियों द्वारा किया जाएगा।
4.चयन प्रक्रिया को बहुत ही पारदर्शी बनाया जाएगा तथा चयन प्रक्रिया से सम्बन्धित महत्वपूर्ण गतिविधियों की वीडियो
रिकॉर्डिंग बनाकर उन्हें सार्वजनिक किया जाएगा।
5.लोकायुक्त को प्रत्येक माह में निपटाए गए मामलों की संक्षिप्त जानकारी, प्रस्तावित कार्रवाई अथवा परिणाम की सूची
प्रकाशित करनी होगी। साथ ही उसे लम्बित मामलों का ब्यौरा भी प्रस्तुत करना होगा।
6.इस विधेयक के अन्तर्गत किसी भी मामले की जाँच के लिए दो महीने तथा सुनवाई के लिए अधिकतम 6 महीने की
अवधि निश्चित की गई है।
7.भ्रष्ट नेता, अधिकारी या न्यायाधीश को एक साल के भीतर जेल भेजा जाएगा।
8.भ्रष्टाचार के कारण सरकार को जो हानि होगी, उसकी क्षतिपूर्ति अपराध साबित होने पर अपराधी को अनिवार्य रूप से
करनी होगी।
9.अगर किसी नागरिक का काम तय समय में नहीं होता तो लोकपाल दोषी अधिकारी पर जुर्माना लगाएगा, जो शिकायतकर्ता को क्षतिपूर्ति के तौर पर मिलेगा।
10.लोकपाल के सदस्यों के चयन में नेताओं का किसी भी प्रकार का कोई हस्तक्षेप नहीं होगा।
11.लोकपाल और लोक आयुक्तों का काम पूरी तरह पारदर्शी होगा। लोकपाल के किसी भी कर्मचारी के खिलाफ शिकायत आने पर उसकी जाँच दो महीने में पूरी कर उसे बर्कास्त कर दिया जाएगा।
12.इस विधेयक के तहत, सीवीसी, विजिलेन्स विभाग और सीबीआई के एण्टीकरप्शन विभागों का लोकपाल में विलय हो जायेगा
13.लोकपाल को किसी भी भ्रष्ट जज, नेता या अधिकारी के खिलाफ जाँच करने और मुकदमा चलाने की पूरी स्वतन्त्रता होगी
14.लोकपाल से किसी भी प्रकार के भ्रष्टाचार की शिकायत की जा सकती है: जैसे सरकारी राशन की कालाबाजारी, सड़क बनाने में गुणवत्ता की अनदेखी, पंचायत निधि का दुरुपयोग, पुलिस द्वारा एफआईआर दर्ज न करना इत्यादि।
15.लोकपाल के मामलों की सुनवाई के लिए विशेष अदालतें बनाई जाएंगी या चिह्नित की जाएँगी। अदालतों को एक साल में मकदमे की सुनवाई पूरी करनी होगी। यदि किसी मामले की सुनवाई एक साल में पूरी नहीं हो पाती, तो अदालत को इसका कारण रिकॉर्ड करना होगा और समयावधि बढ़ानी होगी।
16.लोकपाल की जाँच के दायरे में प्रधानमन्त्री, न्यायपालिका तथा सांसद सहित सभी सरकारी कर्मचारी सम्मिलित हैं हालाँकि प्रधानमन्त्री, न्यायपालिका तथा सांसदों पर कोई भी कार्रवाई करने से पूर्व लोकपाल बैंच के सदस्यों की मंजूरी आवश्यक होगी
17.जो व्यक्ति भ्रष्टाचार के विरुद्ध आवाज उठा रहा है, उसकी रक्षा करना लोकपाल का कर्तव्य होगा

 

जनलोकपाल विधेयक का प्रमुख उद्देश्य सरकारी तन्त्र में फैले भ्रष्टाचार पर रोक लगाना है। विभिन्न विश्लेषण तथा चर्चाओं में यह बात उभरकर सामने आई है कि भ्रष्टाचार की वैतरणी ऊपर से नीचे की ओर बहती है। कहने का तात्पर्य है कि भ्रष्टाचार को शीर्ष स्तर के राजनेताओं और अधिकारियों द्वारा प्रोत्साहन मिलता है, जिससे प्रेरित होकर निम्न स्तर के कर्मचारी भी भ्रष्टाचार में लिप्त हो जाते हैं।

जनलोकपाल विधेयक उच्च स्तर के भ्रष्टाचार को रोकने में काफी हद तक सक्षम है, जिससे निम्न स्तर के भ्रष्टाचार पर भी रोक लग पाएगी। जनलोकपाल की जाँच के दायरे में स्वयं प्रधानमन्त्री भी शामिल है अर्थात् अब कोई भी राजनेता भ्रष्टाचार करने के लिए स्वतन्त्र नहीं है।

इस प्रकार यह उम्मीद की जा रही है कि भविष्य में जनलोकपाल कानून के प्रभाव के कारण भ्रष्टाचार के मामलों में कमी आएगी और भ्रष्टाचार में लिप्त पाए जाने वाले कर्मचारियों पर निश्चित अवधि में कार्रवाई की जाएगी।

जनलोकपाल विधेयक का पारित होना भारतीय जनता की एक बड़ी जीत है और माना जा रहा है कि इसके आने के बाद सरकारी कर्मचारियों की कार्यशैली में थोड़ा-बहुत सुधार होने लगा है, लेकिन बुद्धिजीवियों का एक वर्ग अभी भी जनलोकपाल विधेयक की संस्तुतियों से सन्तुष्ट नहीं है। रमन मैग्सेसे पुरस्कार विजेता अरुन्धती रॉय का मानना है कि लोकपाल के रूप किसी भी एक संस्था को बहुत अधिक शक्ति प्रदान करना ठीक नहीं है। साथ ही उनका कहना है कि

इस संस्था के पास बहुत काम होगा, जिसके कारण इसे अपना काम करने में काफ़ी मुश्किलें होंगी। इसके अतिरिक्त
सीबीआई ने लोकपाल की आलोचना करते हुए कहा कि सीबीआई के एण्टी-करप्शन विभाग का लोकपाल में विलय करने से सीबीआई के कार्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा और उसकी उपयोगिता कम हो जाएगी।

यह सत्य है कि काफी प्रयासों के बाद भी लोकपाल विधेयक में कुछ कमी रह गई है, लेकिन फिर भी यह काफ़ी मजबूत जनलोकपाल विधेयक है, प्रधानमन्त्री का भी इसमें शामिल होना इस बात को सिद्ध करता है। इसके प्रभाव से न केवल भ्रष्टाचार पर रोक लग पाएगी, बल्कि देश का अधिकांश धन पूर्ण रूप से विकास कार्यों में प्रयोग किया जायेगा

इससे टैक्स चोरी पर रोक लगेगी और स्वदेशी मुद्रा देश में ही रहेगी। भ्रष्टाचार पर रोक लगने से पारदर्शिता बढेगी, जिससे बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ भारत में अधिक-से-अधिक निवेश करने के लिए आकर्षित होंगी। कुल मिलाकर जनलोकपाल विधेयक देश की आर्थिक, नैतिक और सामाजिक स्थिति सुधारने में बहुत सहायक सिद्ध होगा।


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