Kailash Mansarovar Yatra : कैलाश मानसरोवर यात्रा की जानकारी

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Kailash Mansarovar Yatra

भगवान शिव को कैलाशपति कहा जाता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार विवाह के बाद भगवान शिव पार्वती के साथ कैलाश में ही निवास करते थे।

Kailash Mansarovar Yatra : कैलाश मानसरोवर यात्रा की जानकारी


कैलाश पर्वत अनादि काल से हिंदुओं का पवित्रतम तीर्थ माना जाता है। संसार की सर्वाधिक ऊँचाई पर स्थित झील मानसरोवर भी अत्यंत पवित्र सरोवर है। मोती चुगने वाले और नीर-क्षीर का विवेक रखने वाले राजहंस इसी सरोवर में पाए जाते हैं। अत्यंत स्वच्छ जल की यह झील मनोरम तो है ही, पवित्र और निर्मल हृदय की प्रतीक भी है। पुराणों और काव्य-ग्रंथों में कैलास-मानसरोवर के सौंदर्य सुषमा और माहात्म्य का विशद वर्णन मिलता है। कहा जाता है कि शिव-पार्वती मानसरोवर में स्नान करते थे।

कैलाश मानसरोवर कहाँ है 

मानसरोवर झील 412 वर्ग कि.मी. में विस्तृत और 70 मीटर की गहराई वाली यह झील समुद्रतल से 4,588 मीटर की ऊँचाई पर स्थित है। इसके उत्तर में कैलाश पर्वत तथा पश्चिम में राक्षसताल है

कैलाश मानसरोवर यात्रा की तैयारी

पर्वतराज हिमालय के पार ‘संसार की छत’ नाम से विख्यात तिब्बत का पठार समुद्रतल 4,000 से 6,000 मीटर ऊँचा20 लाख वर्ग कि.मी. के विस्तृत तिब्बत सदियों से भारत का एक अंग रहा है। इस पर अब चीन का अधिकार है। कैलाश-मानसरोवर तिब्बती क्षेत्र में स्थित है। सन् 1962 में भारत-चीन युद्ध छिड़ने पर कैलास-मानसरोवर की यात्रा रुक गई। सन् 1989 में भारत और चीन सरकारों की सहमति से यह यात्रा पुन: आरंभ हो गई। यात्रा के इच्छुक यात्रियों से प्रतिवर्ष 30 अप्रैल तक आवेदन-पत्र मांगे जाते हैं। जून से सितंबर के बीच 30 से 50 यात्रियों के जत्थे को कैलास-मानसरोवर की यात्रा पर भेजा जाता है।

कैलाश मानसरोवर यात्रा खर्च :

कैलास मानसरोवर की यात्रा लंबी, कठिन, खर्चीली और चुनौती भरी है। करीब 300 कि.मी. पैदल चलना पड़ता है। अधिक ऊंचाई पर वायु दाब कम होने पर साँस लेने में कठिनाई हो सकती है। अत: यह यात्रा शारीरिक और मानसिक रूप से स्वस्थ व्यक्ति के लिए ही उपयुक्त है। इसीलिए प्रत्येक यात्री के स्वास्थ्य की जाँच की जाती है। श्वास, रक्तचाप, हृदय रोग आदि से पीड़ित व्यक्तियों को यात्रा की अनुमति नहीं दी जाती। इस यात्रा में प्रति व्यक्ति 1.50 लाख रुपए की जरूरत पड़ती है ।

भारत सरकार यात्रियों की सुख, सुविधा का ध्यान रखने के लिए अपनी ओर से जत्थे के साथ एक संपर्क अधिकारी भेजती है। उत्तर प्रदेश सरकार और भारत-तिब्बत सीमा पुलिस यात्रा के भारत स्थित मार्ग में यात्रियों को चिकित्सा सुरक्षा और संचार-सहायता की व्यवस्था करती है।

कैलास-मानसरोवर की यात्रा के क्रम में 300 कि.मी. पैदल चलना पड़ता है। 20 दिनों में यह पैदल यात्रा पूरी होती है। अधिकांश मार्ग पहाड़ी है। कहीं चढ़ाई है तो कहीं ढलान, कहीं बफला मार्ग है। मानसरोवर परिक्रमा का मार्ग समतल है, किंतु कई जगह रास्ते में दलदली रेत पड़ती है, जिससे पैदल चलने में विशेष बाधा उत्पन्न होती है। घोड़े या याक पर चढ़कर वहीं की यात्रा की जा सकती है, जहाँ मार्ग चौड़ा हो और ढलान अधिक न हो।

चूँकि कुल मिलाकर कहीं चढ़ाई और कहीं ढलान वाले रास्ते पर पैदल चलना होता है, इसलिए यात्रियों को यात्रा आरंभ करने से पहले 1-2 घंटे पैदल चलने का अभ्यास बना लेना चाहिए। साथ ही पैदल चलने में असुविधा न हो, इसलिए पहले के पहने हुए आरामदेह जूते का उपयोग करना चाहिए। जूते ऐसे होने चाहिए जो बर्फ पर फिसलें नहीं। अच्छा हो, यदि एक जोड़ी जूता और रख लिया जाए।

यात्रा के दौरान जब-तब वर्षा भी होती है, इसलिए रैनकोट और मजबूत छाता भी आवश्यक है। सामान को वाटरप्रूफ बैग में पैक करके बाहर से पोलिथीन शीटों में बाँध देना चाहिए ताकि सामान भीगे नहीं। ढेर सारे कपड़े भी साथ ले जाना ठीक नहीं। पानी सर्वत्र उपलब्ध है। तेज धूप भी निकलती रहती है। इसलिए मौसम ठीक रहने पर कपड़े धोकर सुखाए जा सकते हैं। भारत सरकार की व्यवस्था के अंतर्गत यात्रा करने वाले यात्रियों के लिए पूरे मार्ग में पर्याप्त रसद उपलब्ध रहता है, इसलिए खाने-पीने का ढेर सारा तैयार सामान साथ ले जाने की जरूरत नहीं है। हाँ, कुछ सूखे मेवे और सूखते हुए कंठ को तर करने के लिए पानी तथा कुछ लेमन जूस वगैरह साथ रख लेना चाहिए। पानी में ग्लूकोज डालकर पीते रहने से शरीर में पानी की कमी नहीं होती, क्योंकि पैदल चलने पर पसीना बहुत आता है।

कैलास-मानसरोवर परिक्रमा : कैलास मानसरोवर यात्रा की जानकारी 

 

कैलास-मानसरोवर यात्रा के है दो मार्ग :

पहला मार्ग : लिपुलेख पास (उत्तराखंड)

दूसरा मार्ग : नाथु ला (सिक्किम)

चयन प्रक्रिया : सबसे पहले आपको ऑनलाइन आवेदन करना होता है, उसके बाद कम्पूटर द्वारा यात्रियों का चयन किया जाता है, इसके बाद चयनित यात्रियों को सूचना दी जाती है, अब आप यात्रा का खर्च जमा करा सकते है

कैलास-मानसरोवर, हिंदुओं, बौद्धों के साथ-साथ जैन मतावलंबियों और यहाँ के मूल निवासियों के लिए महान् तीर्थ है। मानसरोवर की परिक्रमा इन धर्मावलंबियों के लिए बहुत ही पवित्र धार्मिक कृत्य है। मानसरोवर की परिक्रमा में दो दिन लगते हैं। प्रथम दिन होरे से चुगु करीब 40 कि.मी. और दूसरे दिन चुगु से जैदी 35 कि.मी. की दूरी तय करनी होती है।

कैलास परिक्रमा तीन दिन में पूरी होती है। इस परिक्रमा में घोड़े नहीं चलते। पैदल या याक से ही परिक्रमा की जा सकती है। स्थानीय लोग तो एक ही दिन में परिक्रमा पूरी कर लेते हैं। लोगों का विश्वास है कि 108 बार कैलास की परिक्रमा करने पर मोक्ष की प्राप्ति होती है। परिक्रमा का आरंभ पश्चिमी छोर पर स्थित जैदी कैंप से होता है। यहाँ से 30 कि.मी. उत्तर होरे शिविर तक बस-मार्ग है। पहली रात यहीं बिताने के बाद होरे से दक्षिण गुल मांधाता पर्वतश्रेणी का दृश्य बहुत ही मनोरम है।

अगले दिन झील के पूर्वी किनारे के साथ-साथ उत्तर से दक्षिण की ओर 40-45 कि.मी. पैदल चलने के बाद होरे से सुबह 7 बजे यात्रियों का दल रवाना होता है। रास्ते में चरागाह पड़ता है, जहाँ से सूर्योदय का मनोहारी दृश्य सामने आता है। मानसरोवर के उत्तर पूर्वी कोने पर रलांग मठ के आगे का अधिकांश रास्ता झील के किनारे-किनारे जाता है। झील की उत्तर-पश्चिमी और उत्तरी दिशाओं में मौसम साफ रहने पर कैलास पर्वत और इसकी श्रेणियाँ तथा दक्षिण में गुर्गा मांधाता पर्वत श्रेणियाँ दिखलाई पड़ती हैं।

इसके आगे तागे नदी पार करने के बाद 14-16 घंटे पैदल चलने पर भुगो गोपा (चुगु) शिविर आता है। मौसम साफ रहने पर झील के शांत जल में कैलास का प्रतिबिंब साफ-साफ झलकता है।

अगले दिन चुगु कैंप से मानसरोवर के तट के साथ-साथ चलते हुए गुल माधाता से निकलने वाली एक नदी को पार करना होता है। मानसरोवर के दक्षिण पश्चिमी कोण से आगे एक बड़ी चट्टान के ऊपर एक छोटा सा मठ ‘गोसुल गोंपा ‘ है।

मानसरोवर तट पर जैदी कैंप से 6 कि.मी. उत्तर ‘चिऊ मठ’ के निकट ही मानसरोवर में डुबकी लगाई जाती है और पूजा-हवन किया जाता है। मठ से मानसरोवर और कैलास का मनोरम दृश्य बड़ा ही आनंददायक लगता है। यहीं से निकलकर यह मानसरोवर को राक्षस ताल से जोड़ती है।

मानसरोवर में काफी मछलियाँ हैं। इन्हें पकड़ने-मारने पर प्रतिबंध है। मानसरोवर का जल रोग निवारक है। तिब्बतियों का कहना है कि कोई भी रोग मानसरोवर का जल पीने से ठीक हो जाता है।

झील के पश्चिमी किनारे पर स्थित जैदी कैंप से सूर्योदय और सूर्यास्त का दृश्य अत्यंत मनोहारी प्रतीत होता है। वह झील के पश्चिमी किनारे पर स्थित इस कैंप के पीछे एक छोटी सी पहाड़ी है। सूर्य जैदी कैंप से दिखाई नहीं पड़ता है, किंतु गुल मांधाता झील के पानी या पूर्व और उत्तर की तरफ की पर्वतश्रेणियों पर अस्तगामी सूर्य की किरणें जब पड़ती हैं तो यह दृश्य अत्यंत मनोहारी होता है।

बादलों के बीच से निकलने वाली सूर्य की किरणें बादलों और आकाश में रंगों की छटा बिखेर देती हैं। सूर्यास्त के पहले पर्वत शिखर रजत आभा से चमत्कृत रहते हैं और सूर्यास्त के समय सुनहरी छटा से मंडित हो उठते हैं। मानसरोवर के जल में सूर्य की किरणें टिमटिमाते तारों का दृश्य उपस्थित करती हैं और सुबहशाम लगता है, सरोवर से ज्वालाएँ निकल रही हैं। यह दृश्य अत्यंत विस्मयकारी और आकर्षक होता है।

कैलास-मानसरोवर में सर्वत्र प्रकृति का वैभव बिखरा पड़ा है। जो इस वैभव से परिचित और लाभान्वित होना चाहते हैं, उन्हें यहाँ की यात्रा अवश्य करनी चाहिए।

यहाँ क्या नहीं है? नाना प्रकार की वनस्पतियाँ, जीव, जंतु, जड़ी- बूटियाँ, हिमाच्छादित ऊँची-ऊँची पर्वत श्रेणियाँ तीव्र वेग से बहती निर्मल जल की नदियों का संगीत, क्षणक्षण पर रंग बदलते बादल, नेत्र रंजक प्राकृतिक सौंदर्य यहाँ सब कुछ है। प्रकृति के इस अपार भंडार में हर व्यक्ति को अपनी रुचि का कुछ न कुछ अवश्य प्राप्त होता है।

अनेक कठिनाइयों, दुर्गम मार्गजलवायु एवं मौसमी प्रतिकूलताओं के बावजूद कैलास-मानसरोवर केवल तीर्थयात्रियों के लिए ही नहीं, वैज्ञानिकों, भूगोलवेत्ताओं वनस्पति-शास्त्रियों तथा प्रकृति-प्रेमियों के लिए आकर्षण का केंद्र है।

कैलास-मानसरोवर की कठिन यात्रा है, किंतु दृढ़ इच्छाशक्ति, आस्था लगन, साहस और धैर्य इस यात्रा को सुखद एवं सरल बना देता है।


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