Kalighat Kali Temple Kolkata History in Hindi : जय काली कलकत्तेवाली

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Kalighat Kali Temple Kolkata History in Hindi

Kalighat Kali Temple Kolkata History in Hindi : जय काली कलकत्तेवाली

कालीघाट (कोलकाता) का काली मंदिर हिंदुओं का पवित्र तीर्थस्थल है। करीब डेढ़ सौ साल पहले यह स्थान घना जंगल था। यहाँ चिते नामक डाकू का बड़ा दबदबा था। उसके द्वारा बनवाए चिमेश्वरी या चितेश्वरी मंदिर की बड़ी ख्याति थी। उसका माहात्म्य कालीघाट के मंदिर से कम नहीं था। इसलिए लोग कालीघाट के मंदिर में दर्शनों के बाद चितेश्वरी मंदिर जरूर जाते थे। जगल से भरा रास्ता होने के कारण लोग छोटे-बड़े दलों में जाते थे। उनके हाथों में जलती मशालें भी रहती थीं, जो उन्हें अँधेरे और जंगली जानवरों से सुरक्षा देती थीं।

कालीघाट की काली के उपासक सिर्फ भारतीय हिंदू ही नहींबल्कि अंग्रेज भी थे। एक अंग्रेज अधिकारी मार्शमैन की डायरी के अनुसार, ईस्ट इंडिया कंपनी के साहब युद्ध में जाने से पहले कालीघाट के मंदिर में पूजा करने जाते थे। एक और अंग्रेज पादरी वार्ड ने कालीघाट के मंदिर का वर्णन विश्व के एक प्रमुख हिंदू मंदिर के रूप में किया था। एक अंग्रेज कविजो जंगला का एक प्रसिद्ध कवियतल (क्षेत्र विशेष की कविता शैली) था—एंटनी कवियतल, उसने बहू बाजार में काली मंदिर की प्रतिष्ठा की थी, जिसे अब फिरंगी काली का मंदिर’ कहा जाता है।

कहते हैं कि सती की मृत्यु के बाद खुद शिव ने सती के शव को कंधे पर लेकर तांडव नृत्य आरंभ कर दिया था तथा विश्व का संहार कर डालने का संकल्प ले लिया था। उनके क्रोध से विश्व की रक्षा के लिए भगवान विष्णु ने सुदर्शन चक्र के जरिए सती के शरीर के टुकड़ेटुकड़े कर दिए। वे टुकड़े जहाँ-जहाँ गिरे वहाँ-वहाँ पवित्र तीर्थस्थल बन गए। कालीघाट में उनके बाएँ पैर की कनिष्ठा उँगली गिरी थी। जिस स्थान पर यह अंग गिरावही बाद में ‘काली कुंड’ के नाम से प्रसिद्ध हुआ। यहाँ भक्त लोग स्नान कर कालीजी के दर्शन और उनकी पूजा अर्चना करते थे। बाद में यह कुंड कीचड़ से भरकर लुप्तप्राय हो गया।

मंदिर समिति के अधिकारियों ने स्वर्गीय ब्रजमोहन बिरला एवं श्रीमती रुक्मिणी देवी बिरला से इसके जीर्णाद्धार का अनुरोध कियाजिसे स्वीकार कर हिंदुस्तान चैरिटी ट्रस्ट ने बहुत बड़ी रकम खर्च कर जीर्णाद्धार का कार्य लगभग दो वर्षों में पूरा कर दिया। नया काली कुंड अत्यंत सुंदर और मनोरम है। बीच में संगमरमर की शिव प्रतिमा है, जिनकी जटा से अनवरत् गंगा प्रवाहित हो रही है। कुंड के निकट पुरुषों और महिलाओं के लिए दो पृथक् स्नानघर बनाए गए हैं।

कालीजी की बहुत मान्यता है। लाखों व्यक्ति प्रतिवर्ष देश-विदेश से यहाँ आते हैं। दो-तिहाई भक्त कलकत्ता के बाहर से यहाँ आते हैं। मंदिर के निकट एक अतिथिशाला के निर्माण की भी योजना है।

कालीघाट में मंदिर का निर्माण 1809 ई. में हुआ। उस समय कालीघाट का पूरा क्षेत्र 600 बीघा में फैला था। इसमें माँ काली के मंदिर का प्रांगण करीब डेढ़ बीघा में फैला था। माँ काली की पूजा तब हालदार लोग किया करते थे और श्रीरामनवमी, जन्माष्टमी, शारदीय महोत्सव, श्यामा पूजा व नए साल पर खूब भीड़ होती थी।

कहते हैं कि कालीघाट मंदिर का निर्माण ब्रह्मानंद गिरि नामक एक साधु ने करवाया था। ब्रह्मानंद गिरि भारत के दक्षिणी प्रांत के नीलगिरि पर्वत के एक शिलाखंड में रहते थे। वे काली के आराधक थे। एक दिन सपने में काली को उन्होंने देखा और मंदिर निर्माण का संकल्प ले लिया। फिर आनंद गिरि की देख रेख में मंदिर का काम आगे बढ़ा। कहते हैं कि राजा मानसिंह ने भी इस मंदिर में एक बार दर्शन किए थे।

मंदिर की देख-रेख के लिए 1964 . में कालीघाट मंदिर समिति बनाई गई। समिति के कुल सदस्यों की संख्या 14 होती है और इसका चुनाव हर दो साल के बाद होता है। अभी इस समिति के सचिव हैं-अमिय कुमार हालदार। श्री हालदार के मुताबिक माँ काली के अंग कीमती गहनों से सजे हैं। हाथ में सोने के कंगन मुकुट और जेवरों के अलावा जीभ व भौंहें भी सोने की हैं।

दुर्गा-पूजा की तरह काली-पूजा भी बंगालियों की मातृसाधना का वैशिष्ट्य है। कालीघाट से काली क्षेत्रकाली क्षेत्र से कलकत्ता नाम की उत्पत्ति हुई है।

कालीपूजा से यह धारणा बलवती होती रहती है। रक्षाकर्मी और अभयदायिनी के रूप में कालीमाई अत्यंत प्रिय हैं। कलकत्ता से उनका अगाध स्नेह है। उनकी उपासना तीन चरणों में होती है। प्रथम चरण में चंदा वसूलना, द्वितीय चरण में विद्युत् प्रकाश व पटाखों की चकाचौंध और चखचख के साथ पूजन और तृतीय चरण में विसर्जन की उद्यम धारावाहिकता।

आज जो काली मंदिर है, वह चौकोर है। उसका शिखर बंगाल की झोंपड़ियों की तरह का है। विष्णुपुर के पुरानी मुनी मिट्टी के मंदिर के शिखर और आज कलकत्ता नगर के महाजाति सदन के ऊपर वैसे ही शिखर हैं। यहाँ रत्नजड़ित
सिंहासन पर काली का उग्र चंडी रूप प्रतिष्ठित है । यह काली कृष्णवण, भयानक रक्तलांछित, सपभरण, मुंडमालिनी और लपलपाती जिद्दावाली हैं। इस देवी को प्रतिदिन पशु-बलि चढ़ाई जाती है।

कलकत्ते के चीनियों का काली में अटूट विश्वास है। यहाँ के अधिकांश चीनियों के घरों में नित्यप्रति काली की पूजा होती है ।वैसे तो चीनियों में काली पूजन का कोई रिवाज नहीं था, परंतु अब काली-पूजन का रिवाज बढ़ता जा रहा है।


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