कन्याकुमारी का इतिहास : Kanyakumari History in Hindi

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Kanyakumari History in Hindi
Kanyakumari History in Hindi

कन्या कुमारी तमिलनाडु प्रान्त के सुदूर दक्षिण तट पर बसा एक शहर है। यह हिन्द महासागर, बंगाल की खाड़ी तथा अरब सागर का संगम स्थल है, जहां भिन्न सागर अपने विभिन्न रंगो से मनोरम छटा बिखेरते हैं। भारत के सबसे दक्षिण छोर पर बसा कन्याकुमारी वर्षो से कला, संस्कृति, सभ्यता का प्रतीक रहा है। भारत के पर्यटक स्थल के रूप में भी इस स्थान का अपना ही महत्च है। दूर-दूर फैले समुद्र के विशाल लहरों के बीच यहां का सूर्योदय और सूर्यास्त का नजारा बेहद आकर्षक लगता हैं। समुद्र बीच पर फैले रंग बिरंगी रेत इसकी सुंदरता में चार चांद लगा देता है

कन्याकुमारी का इतिहास : Kanyakumari History in Hindi


कन्याकुमारी एक अद्भुत दर्शनीय स्थल : 

कन्याकुमारी का धार्मिक महत्व तो है ही, यहाँ पहुँच कर दर्शक सूर्य का उदय और अस्त भी देख सकते हैं। यहाँ भारत की अंतिम दक्षिणी सीमा है। चैत्र पूर्णिमा की सायंकाल यदि बादल न हो तो इस स्थान से एक साथ बंगाल की खाड़ी में चंद्रोदय तथा अरब सागर में सूर्यास्त का अद्भुत दृश्य दीख पड़ता है। उसके दूसरे दिन प्रात:काल बंगाल की खाड़ी में सूर्योदय तथा अरब सागर में चंद्रास्त का दृश्य की नयनाकर्षक प्रतीत होता है।

बादल न होने पर समुद्र जल से ऊपर उठते या समुद्र तल से पीछे जाते हुए सूर्यबिंब का दृश्य बहुत आकर्षक लगता हैइस दृश्य को देखने के लिए प्रतिदिन प्रात:-सायं समुद्रतट पर लोगों की भीड़ इकट्ठी होती है।

कन्याकुमारी में ऐसा प्रतीत होता है, जैसे सूर्य समुद्र से निकल कर समुद्र में ही डूबता है। इतना ही नहीं बल्कि पूर्णिमा के दिन जिस समय पश्चिम की ओर जलस्नान के लिए सूर्य नीचे उतरता है, उसी समय पूर्व की ओर से जलस्नान करके पूर्णचंद्र ऊपर आता है। इस प्रकार सूर्यास्त और चंद्रोदय के एक साथ दर्शन मानो मूर्तिमान काव्य बन जाता है। यही इस स्थान की विशेषता है।

कहते हैं इस प्रकार का दृश्य दुनिया में कहीं भी दिखाई नहीं देता। कन्याकुमारी के नामकरण के बारे में अनेक धारणाएँ हैं। इस जिज्ञासा को  शांत करने के लिए भी हमें जनश्रुतियों का आश्रय लेना पड़ता है।

कन्याकुमारी का नाम कैसे पड़ा :

राजा भरत जिनके नाम पर हमारे देश का नाम ‘भारत’ पड़ा कहा जाता है कि उनके आठ पुत्र एवं एक पुत्री थी। जब राजा भरत ने राजकाज से संन्यास लेना चाहा, तब उन्होंने राज्य के नौ भाग किए और प्रत्येक संतान को एक-एक भाग सौंप दिया। जनप्रति के ही अनुसार देश का दक्षिणी भाग उनकी पुत्री को मिला। तभी से इस क्षेत्र का नाम ‘कुमारी’ पड़ा।

समुद्र के किनारे कन्याकुमारी का विशाल मंदिर है। दक्षिण भारत के मंदिरों के वास्तुशिल्प की विशिष्टताओं की अपेक्षा यह मंदिर बिलकुल मामूली है, लेकिन उसके महत्त्व देती कन्याकुमारी उसकी भौगोलिकता को द्विगुणित कर है। कन्याकुमारी की मोहिनी और सलोनी मूरत दर्शकों के हृदयों में स्वत: आध्यात्मिक स्फुरण पैदा करने में सक्षम है। उसके दाहिने हाथ में बड़ी-बड़ी मणियों की माला है और वह खड़े-खड़े जाप कर रही है। विशेष उत्सवों पर देवी की मूर्ति को अमूल्य रत्नादि से मंडित तो किया ही जाता है, सामान्य दिनों में भी उनका श्रृंगार दर्शनीय होता है।

समुद्रतट पर जहाँ स्नान का घाट है, एक छोटा सा गणेशजी का मंदिर घाट से ऊपर दाहिनी ओर है। गणेशजी के दर्शनोपरांत लोग कुमारी देवी का दर्शन करने जाते हैं। मंदिर में और भी अनेक देव विग्रह हैं। मंदिर से उत्तर थोड़ी दूरी पर मीठे जलवाली बावली है। यात्री इसके जल से भी स्नान करते हैं।

कन्याकुमारी से संबधित लोक कथा :

जब भगवान शंकर देवी पार्वती के साथ कैलास पर्वत निवास कर रहे थे, तब मयासुर की पत्नी पुष्पकाशी ने शिवजी की आराधना शुरू की। अपने आनंदयुक्त आँसुओं से उसने उनका अभिषेक किया। स्मित का पुष्प, साँस का चंदन, शरीर
की सुगंध का धूप, मधुर वचनों का नैवेद्य और दृष्टि का दीप बनाकर  तीन युगों तक उसने भगवान शंकर की आराधना की।

तब शिवजी ने प्रसन्न होकर उसे पूछा – ‘बेटी , तुम क्या चाहती हो?’
पुष्पकाशी ने उत्तर दिया, ‘‘हे त्रिनेत्र! सष्टि के संहार काल में आपके साथ क्रीड़ा करने का सौभाग्य मुझे प्राप्त हो, इतनी ही मेरी इच्छा है। उसे आप पूर्ण करें

भगवान शंकर ने ‘तथास्तु’ कहकर उसे वर दिया और कहा – “जब तक निज लोक सर्वसंहार की वेला में ही हम दोनों क्रीड़ा करेंगे, तब तक तुम दक्षिणी सागर के किनारे तपश्चर्या करती रहो।”

अपने आराध्य देव की इस आज्ञा को सिरआंखों पर लेकर पुष्पकाशी दक्षिणी समुद्र के किनारे खड़ी-खड़ी तपस्या करने लगी।

उन दिनों दैत्यों का राजा वाणासुर बड़ा प्रबल था। जब उसने पुष्पकाशी के रूप की चर्चा सुनी तो वह उसके लिए पागल बन गया और वहाँ जाकर साम-दाम, दंड-भेद सभी प्रक्रियाओं से उसपर अधिकार जमाने की व्यर्थ चेष्टा करने लगा।

अंत में पुष्पकाशी ने युद्ध करके उसे मार डाला और फिर से पूर्ववत् शिवजी के साहचर्य-प्राप्ति के लिए तपस्या करने लगी। कहते हैं, यह वही कन्याकुमारी है।

कन्याकुमारी में पर्यटक स्थल : Kanyakumari Tourist Places in Hindi 

मरुत्वामला पहाड़ी –

कन्याकुमारी आने वाला कोई भी यात्री प्राय: मरुत्वामला पहाड़ी के दर्शन किए बिना वापस नहीं जाता। कहते हैं, रामायण -काल में जब हनुमानजी लक्ष्मणजी के उपचार के लिए संजीवनी बूटी पर्वत लेकर वापस लौट रहे थे, तब उसका एक अंश यहाँ गिर पड़ा। लोगों को ऐसा विश्वास है कि इस जगह थोड़ा समय बिताने से ही अनेक असाध्य रोग-व्याधियाँ दूर हो जाती हैं।

कन्याकुमारी अम्मन मंदिर – Kanyakumari Temple

यह मंदिर 108 शक्ति पिठों में से एक है, सागर के मुहाने के दाई और स्थित यह एक छोटा सा मंदिर है जो पार्वती को समर्पित है। मंदिर तीनों समुद्रों के संगम स्थल पर बना हुआ है। यहां सागर की लहरों की आवाज स्वर्ग के संगीत की भांति सुनाई देती है। भक्तगण मंदिर में प्रवेश करने से पहले त्रिवेणी संगम में डुबकी लगाते हैं जो मंदिर के बाई ओर 500 मीटर की दूरी पर है। मंदिर का पूर्वी प्रवेश द्वार को हमेशा बंद करके रखा जाता है क्योंकि मंदिर में स्थापित देवी के आभूषण की रोशनी से समुद्री जहाज इसे लाइटहाउस समझने की भूल कर बैठते है और जहाज को किनारे करने के चक्‍कर में दुर्घटनाग्रस्‍त हो जाते है

विवेकानंद समाधि शिला : Vivekananda Rock Memorial – 

विवेकानन्द स्मारक शिला कन्याकुमारी का एक प्रसिद्ध स्थल है, जो समुद्र में स्थित एक स्मारक है। यह एक प्रसिद्ध पर्यटन स्थल बन गया है। यह भुमि-तट से लगभग 500 मीटर अन्दर समुद्र में स्थित दो चट्टानों में से एक के ऊपर निर्मित किया गया है। एकनाथ रानडे ने विवेकानंद शिला पर विवेकानंद स्मारक मन्दिर बनाने में विशेष कार्य किया।

गांधी स्मारक – Gandhi Smarak

यह स्मारक राष्ट्रपिता महात्मा गांधी को समर्पित है। यही पर महात्मा गांधी की चिता की राख रखी हुई है। इस स्मारक की स्थापना 1956 में हुई थी। महात्मा गांधी 1937 में यहां आए थे। उनकी मृत्‍यु के बाद 1948 में कन्याकुमारी में ही उनकी अस्थियां विसर्जित की गई थी। स्मारक को इस प्रकार डिजाइन किया गया है कि महात्मा गांधी के जन्म दिवस पर सूर्य की प्रथम किरणें उस स्थान पर पड़ती हैं जहां महात्मा की राख रखी हुई है।

नागराज मंदिर –

कन्याकुमारी से 20 किमी दूर नगरकोल का नागराज मंदिर नाग देव को समर्पित है। यहां भगवान विष्णु और शिव के दो अन्य मंदिर भी हैं। मंदिर का मुख्य द्वार चीन की बुद्ध विहार की कारीगरी की याद दिलाता है।

पदमानभापुरम महल – Padmanabhapuram Palace

पदमानभापुरम महल की विशाल हवेलियां त्रावनकोर के राजा द्वारा बनवाया हैं। ये हवेलियां अपनी सुंदरता और भव्यता के लिए जानी जाती हैं। कन्याकुमारी से इनकी दूरी 45 किमी है। यह महल केरल सरकार के पुरातत्व विभाग के अधीन हैं।किले के पास एक छोटा सा संग्रहालय भी है जिसमें पुराने समय से कई कलाकृतियों और तलवारें और खंजर, चित्रकारी, चीनी जार और लकड़ी के फर्नीचर के बहुत सारे हथियार शामिल हैं

कोरटालम झरना –

यह झरना 167 मीटर ऊंची है। इस झरने के जल को औषधीय गुणों से युक्त माना जाता है। यह कन्याकुमारी से 137 किमी दूरी पर स्थित है।

तिरूचेन्दूर –

85 किमी दूर स्थित तिरूचेन्दूर के खूबसूरत मंदिर भगवान सुब्रमण्यम को समर्पित हैं। बंगाल की खाड़ी के तट पर स्थित इस मंदिर को भगवान सुब्रमण्यम के 6 निवासों में से एक माना जाता है।

उदयगिरी किला –

कन्याकुमारी से 34 किमी दूर यह किला राजा मरतड वर्मा द्वारा 1729-1758 ई. दौरान बनवाया गया था। इसी किले में राजा के विश्वसनीय यूरोपियन दोस्त जनरल डी लिनोय की समाधि भी है

सुचिन्द्रम – Suchindram

यह छोटा-सा गांव कन्याकुमारी से लगभग 12 किमी दूर स्थित है। यहां का थानुमलायन मंदिर काफी प्रसिद्ध है। मंदिर में स्‍थापित हनुमान की छह मीटर की उंची मूर्ति काफी आकर्षक है। मंदिर के मुख्य गर्भगृह में ब्रह्मा, विष्‍णु और महेश जोकि इस ब्रह्मांड के रचयिता समझे जाते है उनकी मूर्ति स्‍थापित है। यहां नौवीं शताब्दी के प्राचीन अभिलेख भी पाए गए हैं।

तिरूवल्लुवर मूर्ति

तिरुक्कुरुल की रचना करने वाले अमर तमिल कवि तिरूवल्लुवर की यह प्रतिमा पर्यटकों को बहुत लुभाती है। 38 फीट ऊंचे आधार पर बनी यह प्रतिमा 95 फीट की है। इस प्रतिमा की कुल उंचाई 133 फीट है और इसका वजन 2000 टन है। इस प्रतिमा को बनाने में कुल 1283 पत्थर के टुकड़ों का उपयोग किया गया था।

सरकारी संग्रहालय –

यदि आप कन्याकुमारी की संस्कृति से रू-ब-रू होना चाहते हैं तो यहाँ के सरकारी संग्रहालय का मुआयना जरूर करें। यहाँ दक्षिण भारतीय आर्ट और क्राफ्ट से जुड़ी चीजें रखी गईं हैं, जिनमें पुराने सिक्के, लकड़ी का समान, यहाँ के परंपरांगत वस्त्र आदि शामिल हैं।

गुगनाथस्वामी मंदिर –

इस मंदिर को यहाँ का प्राचीन और ऐतिहासिक हस्ताक्षर माना जाता है। यह मंदिर यहाँ के चोल राजाओं ने बनवाया था। पुरातत्व की दृष्टि से बेहद खूबसूरत यह मंदिर लगभग हजार साल पुराना माना जाता है।

सागरों का अद्भुत संगम कन्याकुमारी : 

कन्याकुमारी और विवेकानंद समाधिशिला के धार्मिक व प्राकृतिक आकर्षण के फलस्वरूप देश विदेश के हजारों पर्यटक यहाँ प्रतिवर्ष आते हैं। उनकी सुख सुविधा के लिए यहाँ सरकारी और गैर-सरकारी आवास उपलब्ध हैं। सरकारी धर्मशाला
भी है, जहाँ तीन दिनों तक यात्री मजे में ठहर सकते हैं। केप होटल और रेस्ट हाउस भी है, जो आधुनिक साधन-सुविधाओं से युक्त है।

समुद्र-तट पर एक ‘स्वीमिंग पूल’ भी बनाया गया है, जिसमें यात्री निरापद रूप से स्नान कर सकते हैं। यहाँ पर रोमन कैथोलिक ईसाइयों का बाहुल्य है। ये समुद्रतट पर अपने छोटे-छोटे घरों में रहते हैं। यहाँ का प्राचीन और विशाल गिरजाघर अनूठा है। इस गिरजाघर की विशेषता यह है कि इसमें एक साथ एक हजार आदमी बैठ सकते हैं। यहाँ मुसलिम भाइयों की भी छोटी सी आबादी है। फलत: मसजिद का होना भी स्वाभाविक ही है।

सारांशत: निस्संकोच कहा जा सकता है कि धार्मिक, आध्यात्मिक, प्राकृतिक और सांस्कृतिक दृष्टि से कन्याकुमारी का महत्व अशेष है, स्मरणीय है।


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