Konark Sun Temple History in Hindi : कोणार्क का सूर्य मंदिर

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Konark Sun Temple History in Hindi

कोणार्क शब्द, ‘कोण’ और ‘अर्क’ शब्दों के मेल से बना है। अर्क का अर्थ होता है सूर्य जबकि कोण से अभिप्राय कोने या किनारे से रहा होगा। प्रस्तुत कोणार्क सूर्य-मन्दिर का निर्माण लाल रंग के बलुआ पत्थरों तथा काले ग्रेनाइट के पत्थरों से हुआ है

कोणार्क का सूर्य मंदिर अपनी स्थापत्य कला और मानवीय प्रयत्नों के चरमोत्कर्ष के लिए विश्व-प्रसिद्ध है। यह कहना सच है कि यह भारत के सुंदरतम मंदिरों में से एक है, जो भारत तथा विदेशी सैलानियों के लिए आकर्षण का बिंदु है। प्रतिवर्ष इससे लाखों रुपए की विदेशी मुद्रा की प्राप्ति होती है। इस प्रकार इस सुंदरतम मंदिर से विदेशी दर्शनार्थियों से लाखों रुपए की विदेशी मुद्रा की आय होती है।

Konark Sun Temple History in Hindi कोणार्क का सूर्य मंदिर

Contents

 

Where is Konark Sun Temple : कोणार्क का सूर्य मंदिर मंदिर कहाँ है

यह उड़ीसा की राजधानी भुवनेश्वर से लगभग 60 कि.मी. पूरब स्थित है, जिसका उत्तर और दक्षिण से हवाई मार्ग का संपर्क है। पुरी से भी इसकी दूरी लगभग वही है। समय के लंबे अंतराल और प्रतिकूल मौसमों को झेलता हुआ यह सदियों से उसी रूप में खड़ा है। इसके अन्य भग्नावशेष उड़ीसा की प्राचीन स्थापत्य कला की याद दिलाते हैं और साथ ही भारत की प्राचीन स्थापत्य कला की परंपरा की विशेषता को भी दरशाते हैं।

कोणार्क का सूर्य मंदिर का निर्माण किसने करवाया :

ऐसा कहा जाता है कि गंगा साम्राज्य के सम्राट् नरसिंहदेव ने 13वीं सदी के मध्य में इसका निर्माण कराया था। चूंकि यह मंदिर सूर्य के प्रति समर्पित भाव द्वारा निर्मित हुआ था, इसलिए इसे लोग ‘सूर्य मंदिर’ के नाम से भी जानते हैं। समझा जाता है कि राजा नरसिंहदेव सूर्य का उपासक था। यही कारण है कि इसे सूर्य भगवान के रथ के आकार से बनवाया गया था।

कुछ किंवदंतियों के अनुसार मंदिर का निर्माण 1200 शिल्पियों द्वारा 12 वर्षों में हुआ था। यह भी कहा जाता है कि 12 वर्षों तक के संपूर्ण राजस्व का व्यय इसी पर हुआ था।

Konark Sun Temple Facts : सूर्य मंदिर के रोचक तथ्य

सूर्य देव को समर्पि :

प्राचीन कल से कल्पना की जाती है कि सूर्य भगवान के रथ में सोलह पहिए और सात घोड़े हैं। इसी कारण इसे सूर्यरथ के अनुरूप बनाया गया था।

चुम्बकीय पत्थर :

सूर्य भगवान के मुख्य मंदिर के बाहर इसे ऊपर झूलते हुए बनाया गया है। ऐसा बताया जाता है कि सूर्य भगवान की प्रतिमा के ऊपर तथा नीचे शक्तिशाली चुंबक लगाए गए हैं, इस कारण दोनों की आकर्षण शक्ति के मध्य यह प्रतिमा अटकी हुई है। इसे इस तरह प्रस्थापित किया गया है, जिससे पूर्व दिशा की ओर से आती प्रथम सूर्य किरण इसी पर पड़ती है।

कला का अद्भुत नमूना है – कोणार्क का सूर्य मंदिर

इस सूर्य मंदिर की मुख्य विशेषता यह है कि इसकी सतह की इंच-इंच तक उड़ीसा की प्राचीन कलाकृति से भरी हुई है, यानी सतह का एक इंच भाग भी कलाकृति से वंचित नहीं है। कला की सूक्ष्मता का परिदर्शन तब होता है, जब हम छोटी-से-छोटी कलाकृति से लेकर बड़े मंदिर तक की निर्माण कला का अवलोकन करते हैं। इसकी दीवारों पर हजारों हाथियों के चित्र विभिन्न भाव-भंगिमाओं में अंकित हैं। आश्चर्य की बात तो यह है कि कोई भी हाथी-मुद्रा एक-दूसरे से सर्वथा अलग है। वृहदाकार पहिए, घोड़े, हाथी, उत्तेजक चित्रनाचती बालिका का चित्र और आदमकद संगीतज्ञों के चित्र उड़ीसा की स्थापत्य और चित्रकला के उदाहरण प्रस्तुत करते हैं।

कोणार्क का सूर्य मंदिर दिखाता है – महिलाओं की स्वतंत्रता 

कोणार्क की दूसरी विशेषता यह है कि इसकी दीवारों पर तत्कालीन रीति रिवाजों व सामाजिक जीवन आदि का चित्रांकन किया गया है। इन तथ्यों से यह पता चलता है कि उस समय उड़िया समाज का व्यापारिक संबंध दूर-दूर के देशों से था। चित्रांकन के आधार पर यह भी ज्ञात होता है कि उक्त काल में महिलाएँ विभिन्न दिशाओं में सक्रिय थीं। इससे इस निष्कर्ष पर पहुँचा जा सकता है कि महिलाएँ अधिकांशत: स्वतंत्र थीं और वे समाज के सभी कार्यकलापों में हिस्सा ले सकती थीं। वे शिकार और मल्लयुद्ध आदि के लिए भी स्वतंत्र थीं।

कामुकता की नयी परिभाषा देता है कोणार्क का सूर्य मंदिर

यह मंदिर अपनी कामुक मुद्राओं वाली शिल्पाकृतियों के लिये भी प्रसिद्ध है। इस प्रकार की आकृतियां मुख्यतः द्वारमण्डप के द्वितीय स्तर पर मिलती हैं। इस आकृतियों का विषय स्पष्ट किंतु अत्यंत कोमलता एवं लय में संजो कर दिखाया गया है, इन मूर्तियों को मंदिर के बाहर तक ही सीमित किया गया है ऐसा करने के पीछे कारण ये बताया जाता है कि जब भी कोई मंदिर के गर्भ गृह में जाए तो वो सभी प्रकार के सांसारिक सुखों और मोह माया को मंदिर के बाहर ही छोड़ के आये।

कोणार्क मंदिर में सुनाई देती है पायल की आवाज

कोणार्क के बारे में एक मिथक और भी है कि यहां आज भी नर्तकियों की आत्माएं आती हैं। अगर कोणार्क के पुराने लोगों की माने तो आज भी यहां आपको शाम में उन नर्तकियों के पायलों की झंकार सुनाई देगी जो कभी यहाँ यहां राजा के दरबार में नृत्य करती थी।

Konark Sun Temple History in Hindi :

एक कथा के अनुसार, गंग वंश के राजा नृसिंह देव प्रथम ने अपने वंश का वर्चस्व सिद्ध करने हेतु, राजसी घोषणा से मंदिर निर्माण का आदेश दिया। बारह सौ वास्तुकारों और कारीगरों की सेना ने अपनी सृजनात्मक प्रतिभा और ऊर्जा से परिपूर्ण कला से बारह वर्षों की अथक मेहनत से इसका निर्माण किया

Konark Sun Temple Story in Hindi : कोणार्क के सूर्य मंदिर की कथा

ऐसा कहा जाता है कि महाशिल्पी विशु महाराणा ने इसकी रूपरेखा तैयार की थी। वह अपने नवजात शिशु धर्मपद और अपनी पत्नी को अपने गाँव में छोड़कर भाग आया था। धर्मपद की माँ ने तब उसे अपने परंपरागत पेशे की दीक्षा दी थी। जब धर्मपद बड़ा हुआ तो वह अपने पिता की खोज में निकल पड़ा। उसे पिता का पता मालूम नहीं था, फिर भी वह कोणार्क के निर्माणस्थल की ओर चल पड़ा। उसे आशा थी कि उसके पिता शिल्पी हैं और कोणार्क जैसे महत्वपूर्ण मंदिर
के निर्माण में उनका हाथ अवश्य ही हो सकता है। उसने सोचा-संभव है, वहीं उनसे मुलाकात हो जाए।

वह निर्माणस्थल पर गया किंतु वहाँ की हालत देखकर आश्चर्यचकित रह गया। महाशिल्पी विशु महाराणा के साथ ही अन्य सभी शिल्पी उदास मुद्रा में थे। वे किसी अज्ञात भय से काँप रहे थे। उनकी समझ में नहीं आ रहा था कि अब किया क्या जाए ! क्या कल सभी शिल्पियों के हाथ काट लिये जाएंगे ?

बात ऐसी थी कि मंदिर बन जाने के पश्चात् उसके ऊपर त्रिपटधर का स्तूप का स्थापन लाख प्रयत्न के बावजूद नहीं हो रहा था। दरअसल उसके स्थापन में शिल्पियों से थोड़ी भूल हो जाया करती थी और इसी कारण उसका स्थापन नहीं हो रहा था। युवक धर्मपद ने उसके स्थापित नहीं होने के कारण का पता लगाया। वह अचानक बोल उठा, ”आप लोग निराश नहीं हों, मैं इस काम को संपन्न करता हूँ।’ सब अवाक् होकर उसको ताकने लगे।

निश्चित अवधि के भीतर उसने यह काम कर दिखाया। सब शिल्पी बहुत प्रसन्न हुए। युवक की जय-जयकार करने लगे। जब यह बात राजा को मालूम हुई कि स्तंभ का स्थापन एक बारह वर्षीय बालक ने किया है, तो अपने शिल्पियों की शिल्पकला पर उन्हें संदेह हुआ। राजा सोचने लगे कि आखिर इतने बड़े-बड़े शिल्पी कर क्या रहे थे?

अवश्य ही इन शिल्पियों ने जान-बूझकर इसमें देर की है या वे अकुशल हैं ! अत: विशु के साथ ही बारह सौ अन्य शिल्पियों को दंडित करने का निर्णय राजा ने लिया। धर्मपद को यह बात मालूम हुई तो उसने मंदिर के कंगूरे पर चढ़कर निकटवर्ती चंद्रभागा नदी में कूदकर आत्महत्या करने का निर्णय ले लिया ताकि महाशिल्पी विशु के साथ ही बारह सौ अन्य शिल्पियों की प्रतिष्ठा गिरने से बच जाए और राजा शिल्पियों को दंडित करने का अपना इरादा बदल सके। मगर युवक के निर्णय का जब राजा को पता चला तो उसने युवक के निवेदन पर अपना निर्णय बदल लिया और उसे पुरस्कृत किया। वहीं पिता-पुत्र का मिलन हुआ।

All Information about Konark Sun Temple :

बनावट एवं कारीगरी –

भारत के सबसे प्रसिद्ध स्थलों में से एक है। इसे युनेस्को द्वारा सन् 1984 में विश्व धरोहर स्थल घोषित किया गया है। इस मन्दिर में सूर्य देव को रथ के रूप में विराजमान किया गया है तथा पत्थरों को उत्कृष्ट नक्काशी के साथ उकेरा गया है। सम्पूर्ण मन्दिर स्थल को बारह जोड़ी चक्रों के साथ सात घोड़ों से खींचते हुये निर्मित किया गया है, जिसमें सूर्य देव को विराजमान दिखाया गया है। परन्तु वर्तमान में सातों में से एक ही घोड़ा बचा हुआ है। मन्दिर के आधार को सुन्दरता प्रदान करते ये बारह चक्र साल के बारह महीनों को परिभाषित करते हैं तथा प्रत्येक चक्र आठ अरों से मिल कर बना है, जो अर दिन के आठ पहरों को दर्शाते हैं। यहाॅं पर स्थानीय लोग प्रस्तुत सूर्य-भगवान को बिरंचि-नारायण कहते थे।

कोणार्क मंदिर का मुख्य भाग 220 फीट लंबा है। 128 फीट ऊँचा श्रोतागार या मुखशाला आज भी अपनी उसी गरिमा के साथ खड़ा है। यह पिरामिड के आकार का बना है। नाट्य मंदिर या नृत्यागार की सतह सपाट रूप से बनी हुई है। इसके मध्य तक चारों ओर से सीढ़ियों द्वारा पहुंचा जा सकता है।

मुख्य मन्दिर तीन मंडपों में बना है। इनमें से दो मण्डप ढह चुके हैं। इस मन्दिर में सूर्य भगवान की तीन प्रतिमाएं हैं –

  • बाल्यावस्था-उदित सूर्य – 8 फीट
  • युवावस्था-मध्याह्न सूर्य – 9.5 फीट
  • प्रौढ़ावस्था-अस्त सूर्य -3.5 फीट

इसके प्रवेश पर दो सिंह हाथियों पर आक्रामक होते हुए रक्षा में तत्पर दिखाये गए हैं। यह सम्भवतः तत्कालीन ब्राह्मण रूपी सिंहों का बौद्ध रूपी हाथियों पर वर्चस्व का प्रतीक है। दोनों हाथी, एक-एक मानव के ऊपर स्थापित हैं। ये प्रतिमाएं एक ही पत्थर की बनीं हैं। ये 28 टन की 8.4 फीट लंबी 4.9 फीट चौड़ी तथा 9.2 फीट ऊंची हैं। मंदिर के दक्षिणी भाग में दो सुसज्जित घोड़े बने हैं, जिन्हें उड़ीसा सरकार ने अपने राजचिह्न के रूप में अंगीकार कर लिया है।

संप्रति कोणार्क मंदिर का मुख्य भाग ‘विमान’ के नाम से पुकारा जाने लगा है। जगमोहन या श्रोतागार अपने मूल रूप में स्थित है। नाट्य मंदिर बिना छत का है। जनसाधारण के लिए बने आगार की दीवारें मिली जुली हैं। मुख्यद्वार पर दो लड़ाकू घोड़े और दो हाथियों की आकृतियाँ हैं। सूर्य भगवान की पत्नी छाया देवी का मंदिर जीर्णावस्था में आ गया है। सोलह स्तंभोंवाला ‘अरुण स्तंभ’ जगन्नाथ मंदिर के आमने-सामने है। 1751 ई. के पश्चात् पुरी को कोणार्क से अलग किया
गया।

मंदिर के भीतरी भाग में कमल के फूलों के चित्रांकन से सुंदर साजसज्जा की गई है। दीवारों पर अंकित विभिन्न मुद्राओं में हाथियों के चित्र तथा भाँति भाँति के पशु-पक्षियों के चित्र अत्यंत नयनाभिराम प्रतीत होते हैं।

इसकी शिल्पकला के पाँच महत्त्वपूर्ण पहलू हैं – साज-सज्जा, सामाजिक, धार्मिक, परंपरागत एवं उत्प्रेरक। चित्रांकन की संख्यात्मक दृष्टि से इतना विशाल और आकारिक दृष्टि से इतना बृहत् है कि सब पर सम्यक् रूप से प्रकाश डालना
अत्यंत मुश्किल है।

कोणार्क का सूर्य मंदिर की ध्वस्ता के कारण :

कोणार्क का सूर्य मंदिर का काफी भाग ध्वस्त हो चुका है। इसके अनेक कारण रहें,

वास्तु दोष – 

यह मन्दिर अपने वास्तु दोषों के कारण मात्र ८०० वर्षों में क्षीण हो गया था, इस सूर्य-मन्दिर के मुख्य वास्तु दोष हैं :-

  • मंदिर का निर्माण रथ आकृति होने से पूर्व, दिशा, एवं आग्नेय एवं ईशान कोण खंडित हो गए।
  • पूर्व से देखने पर पता लगता है, कि ईशान एवं आग्नेय कोणों को काटकर यह वायव्य एवं नैऋर्त्य कोणों की ओर बढ़ गया है।
  • प्रधान मंदिर के पूर्वी द्वार के सामने नृत्यशाला है, जिससे पूर्वी द्वार अवरोधित होने के कारण अनुपयोगी सिद्ध होता है।
  • नैऋर्त्य कोण में छायादेवी के मंदिर की नींव प्रधानालय से अपेक्षाकृत नीची है। उससे नैऋर्त्य भाग में मायादेवी का मंदिर और नीचा है।
  • आग्नेय क्षेत्र में विशाल कुआं स्थित है।
  • दक्षिण एवं पूर्व दिशाओं में विशाल द्वार हैं, जिस कारण मंदिर का वैभव एवं ख्याति क्षीण हो गई हैं।
चुम्बकीय पत्थर –

कई कथाओं के अनुसार, सूर्य मन्दिर के शिखर पर एक चुम्बकीय पत्थर लगा है। इसके प्रभाव से, कोणार्क के समुद्र से गुजरने वाले सागरपोत, इस ओर खिंचे चले आते हैं, जिससे उन्हें भारी क्षति हो जाती है। अन्य कथा अनुसार, इस पत्थर के कारण पोतों के चुम्बकीय दिशा निरूपण यंत्र सही दिशा नहीं बताते। इस कारण अपने पोतों को बचाने हेतु, मुस्लिम नाविक इस पत्थर को निकाल ले गये। यह पत्थर एक केन्द्रीय शिला का कार्य कर रहा था, जिससे मंदिर की दीवारों के सभी पत्थर संतुलन में थे। इसके हटने के कारण, मंदिर की दीवारों का संतुलन खो गया और परिणामतः वे गिर पड़ीं। परन्तु इस घटना का कोई ऐतिहासिक विवरण नहीं मिलता

बाहरी आक्रमण –

कोणार्क मंदिर के गिरने से सम्बन्धी एक अति महत्वपूर्ण सिद्धांत, कालापहाड से जुड़ा है। उड़ीसा के इतिहास के अनुसार कालापहाड़ ने सन 1508 में यहां आक्रमण किया और कोणार्क मंदिर समेत उड़ीसा के कई हिन्दू मंदिर ध्वस्त कर दिये। पुरी के जगन्नाथ मंदिर के मदन पंजी बताते हैं, कि कैसे कालापहाड़ ने उड़ीसा पर हमला किया, उसने यहाँ की अधिकांश मूर्तियां ध्वस्त कर दी थी

सन् 1568 में उड़ीसा में मुस्लिमों का आतंक नियंत्रण में हो चुका था। परन्तु इसके बाद भी हिन्दू मन्दिरों को तोड़ने के निरंतर प्रयास होते रहे। इस समय पुरी के जगन्नाथ मन्दिर के पंडों ने भगवान जगन्नाथ जी की मूर्ति को श्रीमन्दिर से हटाकर किसी गुप्त स्थान पर छुपा दिया था। इसी प्रकार, कोणार्क के सूर्य मंन्दिर के पंडों ने प्रधान देवता की मूर्ति को हटा कर, वर्षों तक रेत में दबा कर छिपाये रखा। बाद में, यह मूर्ति पुरी भेज दी गयी और वहां जगन्नाथ मन्दिर के प्रांगण में स्थित, इंद्र के मन्दिर में रख दी गयी। अन्य लोगों के अनुसार, यहां की पूजा मूर्तियां अभी भी खोजी जानी बाकी हैं। लेकिन कई लोगों का कहना है, कि सूर्य देव की मूर्ति, जो नई दिल्ली के राष्ट्रीय संग्रहालय में रखी है, वही कोणार्क की प्रधान पूज्य मूर्ति है।

फिर भी कोणार्क में, सूर्य वंदना मंदिर से मूर्ति के हटने के बाद से बंद हो गयी। इस कारण कोणार्क में तीर्थयात्रियों का आना जाना बंद हो गया। कोणार्क का पत्तन (बंदरगाह) भी डाकुओं के हमले के कारण, बंद हो गया। कोणार्क सूर्य वंदना के समान ही वाणिज्यिक गतिविधियों हेतु भी एक कीर्तिवान नगर था, परन्तु इन गतिविधियों के बन्द हो जाने के कारण, यह एकदम निर्वासित हो चला और वर्षों तक एक गहन जंगल से ढंक गया।

सन 1626 में, खुर्दा के राजा, नृसिंह देव, सुपुत्र श्री पुरुषोत्तम देव, सूर्यदेव की मूर्ति को दो अन्य सूर्य और चन्द्र की मूर्तियों सहित पुरी ले गये। अब वे पुरी के मंदिर के प्रांगण में मिलती हैं। पुरी के मदल पंजी के इतिहास से ज्ञात होता है, कि सन 1628 में, राजा नॄसिंहदेव ने कोणार्क के सभी मंदिरों के नाप-जोख का आदेश दिया था। मापन के समय, सूर्य मंदिर अपनी अमलक शिला तक अस्तित्व में था, यानि कि लगभग 200 फीट ऊंचा। कालापहाड़ ने केवल उसका कलश, बल्कि पद्म-ध्वजा, कमल-किरीट और ऊपरी भाग भी ध्वंस किये थे। पहले बताये अनुसार, मुखशाला के सामने, एक बड़ा प्रस्तर खण्ड – नवग्रह पाट, होता था। खुर्दा के तत्कालीन राजा ने वह खण्ड हटवा दिया, साथ ही कोणार्क से कई शिल्प कृत पाषाण भी ले गया। और पुरी के मंदिर के निर्माण में उनका प्रयोग किया था।

मराठा काल में, पुरी के मंदिर की चहारदीवारी के निर्माण में कोणार्क के पत्थर प्रयोग किये गये थे।

यह भी बताया जाता है, कि नट मंदिर के सभी भाग, सबसे लम्बे काल तक, अपनी मूल अवस्था में रहे हैं। और इन्हें मराठा काल में जान बूझ कर अनुपयोगी भाग समझ कर तोड़ा गया। सन १७७९ में एक मराठा साधू ने कोणार्क के अरुण स्तंभ को हटा कर पुरी के सिंहद्वार के सामने स्थापित करवा दिया। अठ्ठारहवीं शताब्दी के अन्त तक, कोणार्क ने अपना, सारा वैभव खो दिया और एक जंगल में बदल गया। इसके साथ ही मंदिर का क्षेत्र भी जंगल बन गया, जहां जंगली जानवर और डाकुओं के अड्डे थे। यहां स्थानीय लोग भी दिन के प्रकाश तक में जाने से डरते थे।

Konark Sun Temple Yatra : कोणार्क का सूर्य मंदिर की यात्रा

भुवनेश्वर और पुरी दोनों तरफ के राजमागों द्वारा वहाँ जाया जा सकता है। अनेक पर्यटक बसें भी उपलब्ध हैं। पर्यटकों के विश्राम के लिए राज्य के पर्यटन विभाग की ओर से पंथ निवास’ नामक विश्रामगृह की व्यवस्था है। रात्रि के शांत प्रहर में कोणार्क दमक उठता है । समुद्र की सुनहरी लहर कासारिना गुफा की दूरी वहाँ से मात्र दो कि.मी. है। इसकी कलात्मकता एवं मनोहारी रूप के दर्शन किसी भी मौसम किए जा सकते हैं।

सदियों प्राचीन होने पर भी कोणार्क के मंदिर पर भारत को गर्व है। इसकी प्राकृतिक एवं मनोरम छटा किसी को भी बरबस अपनी ओर खींच लेती है।


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