Lala Hardayal Biography in Hindi : लाला हरदयाल का जीवन परिचय

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Lala Hardayal Biography in Hindi
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Lala Hardayal Biography in Hindi

डेविड बैकहम का जीवन परिचय


लाला हरदयाल को विलक्षण क्रांतिकारी कहा जाना चाहिए। इन्होंने देश की आजादी के लिए अनेकानेक दिशाओं में प्रयास किए। उच्च शिक्षा प्राप्त लाला हरदयाल ने क्रांति की संस्था के रूप में अपनी भूमिका का निर्वहन किया था। उच्च कोटि के लेखक होने के अतिरिक्त यह संपादन कला में भी माहिर थे। गृहस्थ धर्म का पालन करने वाले इन महान क्रांतिकारी ने किसी तपस्वी की भांति क्रांति कर्म को जीवन के अंतिम क्षण तक पूर्ण किया।

लाला हरदयाल का जन्म 14 अक्टूबर, 1884 ई. को दिल्ली में हुआ था। इनके पिता का नाम श्री गौरीदयाल माथुर था। कायस्थ परिवार में जन्म लेने वाले लाला हरदयाल बचपन से ही अप्रतिम प्रतिभा के धनी रहे थे। इनकी माता का नाम भोली रानी था। बचपन इनका दिल्ली में ही गुजरा था।

ऐसा माना जाता है कि बचपन से ही इनकी स्मरण शक्ति गजब की थी। कालांतर में जब यह लाहौर काॅलेज में अध्ययनरत थे, तो एक ही वक्त में कई क्रियाकलापों को ठीक से पूर्ण करके इन्होंने लोगों का ध्यान आकृष्ट किया। इस प्रतिभा को ’शतावधानी’ कहा जाता है। इसका अभिप्राय यही है कि व्यक्ति एक ही समय में कई कार्याें का निर्वहन करे।

इन्होंने पंजाब विश्वविद्यालय से ’अंग्रेजी भाषा व साहित्य’ में एम.ए. की परीक्षा उत्तीर्ण की। दूसरे विद्यार्थी जहां एक वर्ष में चार पर्चे देकर दो वर्ष में आठ पर्चे देते थे। लाला हरदयाल ने एक ही वर्ष में आठों पर्चे दे दिए, जिनमें इन्हें 97 प्रतिशत अंक भी मिले, जो पंजाब विश्वविद्यालय का अनूठा कीर्तिमान बन गया। इस कारण इन्हें इंग्लैंड के आॅक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में उच्च अध्ययन की सहूलियत प्रदान की गई। वहां के प्राध्यापक इनके लिखे निबंधों को पढ़ कर प्रशंसा से कह उठते थे, ’’जिस प्रकार से तुमने निबंध लिखे हैं, उससे बेहतर हम भी नहीं लिख सकते थे।’’

क्रांतिकारियों के संपर्क में आने के पश्चात् फिरंगी शासन के प्रति इनके हृदय में बेहद रोष व नफरत का भाव उत्पन्न हो चुका था। इन्हें दो छात्रवृत्तियां विश्वविद्यालय द्वारा मिलती थीं और एक ब्रिटिश सरकार से। लाला हरदयाल ने यह कह कर वे तीनों छात्रवृत्तियां ठुकरा दीं कि यह धन भारत के निर्दोष खून से सना हुआ है।

अंग्रेजों की संस्कृति से लाला हरदयाल की नफरत इतनी ज्यादा होती गई कि शनैः शनैः इन्होंने अंग्रेजी भाषा, अंग्रेजी वेशभूषा और अंग्रेजी रहन-सहन भी त्याग दिया। यह धोती-कुर्ता पहनते व दलिया तथा खिचड़ी पर जीवन बसर करने लगे। ससुराल से भगा कर लाई गई पत्नी को उन्होंने चूल्हे-चैके में न झोंक कर शिक्षार्जन में लगा दिया और खुद तपस्वी ऋषि की भांति जीवन गुजारने लगे। यह परिवर्तन इतना प्रबल हो गया कि यह प्रत्येक भारतीय को इसी प्रकार से तपस्वी बनाने की बात करने लगे। यह इंग्लैंड त्याग कर भारत लौटे व लाहौर में इन्होंने एक आश्रम बनाया, जहां यह तपस्वियों सरीखा जीवन यापन करने लगे।

लालाजी ने ’पंजाबी’ शीर्षक से एक पत्रिका का प्रकाशन कार्य भी आरंभ किया। इनके लेख अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ और भड़काऊ भाषा में होते थे। जल्दी ही इन्हें चेतावनी मिली व लाला लाजपतराय के कहने पर यह भारत छोड़ कर विदेश चले गए।

फरार होने के लिए लाल हरदयाल इटली होते हुए फ्रांस पहुंच गए। पेरिस में इनकी भेंट मादाम भीखाजी कामा से हुई। यह ’वंदे मातरम्’ पत्रिका निकालती थीं। लाला हरदयाल ने उसका संपादन कार्य संभाल लिया। श्यामजी कृष्ण वर्मा, विनायक दामोदर सावरकर इत्यादि अनेक क्रांतिकारी तब पेरिस में ही रह रहे थे।

’वंदे मातरम्’ का एक समूचा अंक क्रांतिकारी मदनलाल ढींगरा के संदर्भ में निकाला गया था, जिन्होंने इंग्लैंड में कर्जन वाइली को गोली मार दी थी। मदनलाल ढींगरा की तारीफ करते हुए लाल हरदयाल ने लिखा था, ‘‘ढींगरा हमारा वह अमर क्रांतिकारी है, जिसकी बहादुरी पर हम शताब्दियों तक अभिमान करते रहेंगे।’’

पेरिस से पलायन की एक वजह यह भी थी कि इनकी आर्थिक स्थिति खराब होती जा रही थी। कभी-कभार तो फाके करने की स्थिति भी आ जाती थी। कुछ समय इधर-उधर बिताने के पश्चात् यह वेस्ट इंडीज पहुंच गए। ला मार्तिनीक में इन्हें अपने गुजारे लायक कार्य मिल गया। कुछ शागिर्दों को पढ़ाने के अलावा वह अपना ज्यादा समय एकांत साधना में गुजारा करते थे।

लालाजी की प्रतिभा से प्रभावित होकर लेलैंड स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय में इन्हें संस्कृत तथा हिंदू दर्शन शास्त्र का प्राध्यापक बनाया गया। यह वहां पढ़ाते अवश्य थे, लेकिन वेतन कुछ नहीं लेते थे। इस कारण यह ‘भारतीय कृषि’ के रूप में प्रसिद्ध हो गए। बड़े-बड़े लोग उनके दर्शनार्थ आने लगे।

लाला हरदयाल कुछ समय सैनफ्रांसिस्को और कुछ समय बर्कले में रहने लगे। बर्कले में इन्होंने एक ‘नालंदा भवन’ निर्मित कराया, जहां भारतीय विद्यार्थियों को बेहद कम खर्च में रिहाइश की सुविधा मिलती थी। जैसे लंदन में ‘इंडिया हाउस’ क्रांतिकारियों का बसेरा था, वैसे ही बर्कले का ’नालंदा भवन’ इनका ठिकाना बन गया।

लालाजी ने प्रथम विश्व युद्ध छिड़ जाने पर अमेरिका में ‘गदर पार्टी’ का गठन किया, जिसके अध्यक्ष सोहनसिंह भकना, मंत्री लाला हरदयाल और कोषाध्यक्ष पंडित काशीराम थे। इस गदर पार्टी की तरफ से ‘गदर’ नामक अखबार उर्दू और पंजाबी में प्रकाशित होता था। गदर पार्टी का केंद्र सैनफ्रांसिस्को का ‘युगांतर आश्रम’ था, जहां क्रांतिकारी अपना जीवन तपस्वियों की भांति सादगी किंतु कर्मठता से व्यतीत करते थे।

गदर पार्टी का कार्य पहले विश्व युद्ध (1914-1918) के समय में शस्त्र और उत्सर्ग को तैयार क्रांतिकारी भारत भेज कर भारतीय सेना में सन् 1857 जैसी महाक्रांति कराना था। इसके हितार्थ धन इकट्ठा किया गया, शस्त्र खरीदे गए और हजारों भारतीय, जिनमे सिख सर्वाधिक थे, जहाजों द्वारा भारत के लिए रवाना हुए।

किंतु उस दौरान इंग्लैंड की नौ-सेना बेहद विस्तृत थी। उसने गदर पार्टी द्वारा भेजे तकरीबन तमाम जहाजों को पकड़ लिया या डुबा दिया। गदर पार्टी के सैकड़ों क्रांतिकारी पकड़े गए और उनमें से ज्यादातर को फांसी या ताउम्र कैद की सजा हुई। युद्ध में जर्मनी के परास्त होने पर गदर पार्टी का यह प्रयास नाकाम हो गया।

लालाजी हरदयाल चूंकि चैदह भाषाओं के ज्ञानी थे, इस कारण किसी भी देश में इन्हें विचार संप्रेषण संबंधी परेशानी नहीं हुई। सभी चैदह भाषाओं पर इनका अच्छा अधिकार था और उन भाषाओं का महज उच्चारण ही नहीं, बल्कि वह उन्हें लिख भी लेते थे। इस कारण प्रत्येक देश में लालाजी को सम्मान प्राप्त हुआ।

लालाजी सन् 1927 में लंदन चले गए, क्योंकि तब इंग्लैड की हुकूमत ने राजनेताओं पर लगे प्रतिबंध शिथिल किए थे। राजनीति को त्याग कर यह विद्या के क्षेत्र में प्रविष्ट हो गए। इन्होंने विज्ञान में स्नातक की परीक्षा उत्तीर्ण की और सन् 1931 में बौद्ध दर्शन पर शोध निबंध लिख कर पीएच.डी. की उपाधि भी अर्जित की।

सर तेजबहादुर सप्रू व श्री सी.एफ. एंड्रयूज के प्रयासों से ब्रिटिश हुकूमत ने लाला हरदयाल को भारत आने की इजाजत दी। इस समय इनकी उम्र 55 वर्ष के करीब थी। लेकिन इजाजत मिलते ही यह भारत नहीं आ सके, क्योंकि अमेरिका में इनके धारावाहिक वक्तव्यों का कार्यक्रम पूर्व निर्धारित था।

फिर आया वह दुखद दिन, जब 4 मार्च, 1939 को अमेरिका के ही फिलाडेल्फिया राज्य में इनकी असामयिक मृत्यु हो गई। भारत में इनके आगमन की तैयारी हो रही थी। इस शोक समाचार को सुन कर सभी स्तब्ध रह गए।


 

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