Maa Sharda Temple Maihar History in Hindi : मैहर की माँ शारदा...

Maa Sharda Temple Maihar History in Hindi : मैहर की माँ शारदा मंदिर

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Maa Sharda Temple Maihar History in Hindi

Maa Sharda Temple Maihar History in Hindi : मैहर की माँ शारदा मंदिर


Maa Sharda Mandir Kaha hai : 

मैहर मध्य प्रदेश के सतना जिले का एक छोटा सा नगर है। यह एक प्रसिद्ध हिन्दू तीर्थस्थल है। मैहर में शारदा माँ का प्रसिद्ध मन्दिर है जो नैसर्गिक रूप से समृद्ध कैमूर तथा विंध्य की पर्वत श्रेणियों की गोद में अठखेलियां करती तमसा के तट पर त्रिकूट पर्वत की पर्वत मालाओं के मध्य 600 फुट की ऊंचाई पर स्थित है

यह महज संयोग है या कि अंत: प्रेरणा कि मन में यह लालसा बराबर बलवती रही कि आल्हा-ऊदल की जन्मभूमि मैहर अथवा मातृगृह में मां शारदा के भक्तिपीठ का दर्शन पूजन करूँ, मुझे बराबर बताया गया था कि मैहरवासिनी माँ शारदा जगत् की प्राणाधार हैं और अपने भक्तों की रक्षा के लिए आश्चर्यजनक प्रमाण प्रकट किया करती हैं। इन्हीं माँ शारदा के वरदानस्वरूप इतिहासपुरुष आल्हा को अमरत्व का वरदान प्राप्त है और ऊदल को प्राप्त है

अनेक राजाओं व अपने शत्रुओं से अजेय पराक्रम तथा जीत का श्रेयइस संसार सागर में जो लोग लिप्त हैं। और उन्हें हरेक क्षण स्थूल और सूक्ष्म विनबाधाएँ एवं अपने वैरियों से भिड़त की संभावना रहती है। यह माँ शारदा की कृपा है और जिसे माँ का आशीर्वाद मिल गया है, वह सिर्फ इतना ही कहता है-‘रूप देहि, जय देहियशो देहिद्विषो जहि।” यही कामना है, यही अभिलाषा है और माँ इन सभी अभिलाषाओं को पूरा करती हैं। माँ अपने भक्तों को जब बुलाना चाहती हैं, तब बुलाती हैं और भक्त उनकी पुकार पर खिंचे चले आते हैं।

मध्य प्रदेश का जिला मुख्यालय सतना सुरम्य पहाड़ियों के बीच घिरा हुआ एक शांत और सुंदर नगर है। सीमेंट फैक्टरी बन जाने से जनरव और कलरव तो बढ़े हैं, लेकिन बिहार प्रांत के नगरीय जीवन की तरह यहाँ आपा धापी, शोर-शराबा और धूल नहीं है। सुरम्य स्थान में बसे रहने के कारण सतना पर्यटकों का एक आकर्षक स्थल है। सतना को केंद्र मानकर यदि पर्यटन सुख उठाया जाए तो चित्रकूट धाम मैहर धाम और खजुराहो के आकर्षक ऐतिहासिक स्थलों का केंद्र बिंदु है—सतना। इसी उद्देश्य से मैंने अपनी यात्रा का पड़ाव सतना को बनाया और रात्रि-विश्राम कोलाहल से दूर एक स्वच्छ होटल पार्क में बिताया।

सुबह चार-साढ़े चार बजे मैं उठ गया और तैयार होकर राज्य बस डिपो पर आया। मैहर जाने वाली बस जबलपुर-कटनी के रास्ते में जाने वाले बस रूट में है। सारी बस तीर्थयात्रियों से भरी हुई थी, जिसमें मुख्यत: पश्चिमी उत्तर प्रदेश के असंख्य तीर्थयात्री गण सपरिवार यात्रा कर रहे थे। कई स्थानों पर रुकती हुई यह बस लगभग डेढ़ घंटे में मैहर पहुँची। सतना से इसकी दूरी लगभग 54 कि.मी. है।

मैहर की माँ शारदा मंदिर का इतिहास :

मैहर का संक्षिप्त इतिहास यही है कि यह बुंदेलखंड मंडल के अंतर्गत सतना जिला रीवा संभाग में स्थित है। यहाँ पर त्रिकूट श्रीशैल पर माँ शारदा और नरसिंह भगवान की मूर्ति एवं प्राचीनतम मंदिर अवस्थित है। यह मंदिर गुप्त राजाओं के समय में निर्मित है। मैहर के आस पास बिखरे इतिहास से जो कुछ मुझे प्राप्त हुआ है, उससे यह स्पष्ट होता है कि माँ शारदा की प्रतिमा एवं मंदिर निर्माण काल ईसवी सन् 502, विक्रम संवत् 559 है। शारदा देवी का मंदिर एवं नरसिंह पीठ मैहर-खजुराहो के मंदिरों से 448 से लेकर 548 वर्ष प्राचीन है।

श्री शारदा देवीजी मैहर का स्थान शक्तिपीठ की श्रेणी में तो नहीं आता लेकिन उसकी पौराणिकता में कोई संदेह नहीं है। आसपास की जनश्रुतियों के अनुसार वे अट्ठाईसवें सतयुग के प्रमुख सत्य अवतार नरसिंह अवतार के प्रमुख शक्तिमान पीठ के रूप में है, जिसका आज भी नाम शारदा नरसिंह पीठ ही है। नरसिंह अवतार के साथ जो शक्ति रही है, वही शक्ति श्री लक्ष्मी स्वरूप माँ शारदा के नाम से जानी जाती है। यह त्रिशक्ति स्वरूप है, जो धनबुद्धि, ज्ञान एवं अमरता आदि सकल मनोरथों की सिद्धिदात्री हैं। इस पीठ पर श्री शारदा नरसिंह की कृपा से मृत्यु पर विजय होकर अमरता प्राप्त होती है।

यह मंदिर एक ऊँची पहाड़ी पर अवस्थित है, जिस पर जाने के लिए 560 सीढ़ियों का मार्ग है, जिसे मैहर के राजा श्रीमान बृजनाथ सिंह के पूर्वज श्री दुर्जन सिंह ने सन् 1820 में बनवाया था। उन्होंने उत्तर दिशा में एक जलाशय का भी निर्माण कराया था। वर्तमान समय में भी मंदिर के अंतिम छोर तक कार-टैक्सी और टैंपो से कम समय में पहुँचा जा सकता है। टैंपो का भाड़ा यदि पूर्ण सुरक्षित रहे तो बीस रुपए के आसपास होता है। इस स्थान पर आश्विन एवं चैत्र के नवरात्र में काफी बड़ा मेला लगता है।

आल्हा और उदल करते है सबसे पहले माँ के दर्शन : 

क्षेत्रीय लोगों के अनुसार अल्हा और उदल जिन्होंने पृथ्वीराज चौहान के साथ युद्ध किया था, वे भी शारदा माता के बड़े भक्त हुआ करते थे। इन दोनों ने ही सबसे पहले जंगलों के बीच शारदा देवी के इस मंदिर की खोज की थी। इसके बाद आल्हा ने इस मंदिर में 12 सालों तक तपस्या कर देवी को प्रसन्न किया था। माता ने उन्हें अमरत्व का आशीर्वाद दिया था। आल्हा माता को शारदा माई कह कर पुकारा करता था। तभी से ये मंदिर भी माता शारदा माई के नाम से प्रसिद्ध हो गया। आज भी यही मान्यता है कि माता शारदा के दर्शन हर दिन सबसे पहले आल्हा और उदल ही करते हैं। मंदिर के पीछे पहाड़ों के नीचे एक तालाब है, जिसे आल्हा तालाब कहा जाता है। यही नहीं, तालाब से 2 किलोमीटर और आगे जाने पर एक अखाड़ा मिलता है, जिसके बारे में कहा जाता है कि यहां आल्हा और उदल कुश्ती लड़ा करते थे।

आल्हा-ऊदल ने इन्हीं माँ शारदा की कृपा से उस समय लड़ी जाने वाली बुंदेलखंड की पाँच बड़ी लड़ाइयों में विजय प्राप्त की और मैहर के साथ जुड़ी है। आल्हा की वीरगाथा जो ‘पावस का गीत’ समझा जाता है। पावस ऋतु आई नहीं कि सुप्रसिद्ध कवि जगनिक के इस काव्य ग्रंथ के मधुर लोकगीत जन-जन के होंठों पर थिरक उठते हैं।

आचार्य शुक्ल ने ‘परमाल रासो’ अर्थात् ‘आल्हा’ के मूल रूप को हिंदी-साहित्य के कालविभाजन में ‘वीरगाथा काल’ के अंतर्गत अत्यंत महत्त्वपूर्ण स्थान दिया था। मूल ग्रंथों का तो कोई पता नहीं है, लेकिन वीर छंदों में आज भी जनता का प्रेम और प्रोत्साहन पाकर आल्हा जीवित है।

आज भी आल्हखंड काव्य लोक-रुचि के साँचे में ढलकर जिंदा है, क्योंकि यह काव्य लोकचित्त की चंचल लहरों पर चलकर आया है। यह जनता को प्रिय था, उनके सुख-दु:ख का साथी था और अपने इन महान् गुणों के कारण जनता के प्रति प्रीति पा सके और जीवित रहा। इसके समवयस्क काव्य लोक-रुचि के अनुकूल नहीं , इसलिए जनता की प्रीति नहीं पा सके और लुप्त हो गए।

‘रामचरितमानस’ के बाद लोकप्रियता अगर किसी काव्यग्रंथ ने पाई है तो वह है । परमालासो यानी आल्हखंड, इसमें वर्णित छंदों को सुनते ही कमजोर-से- कमजोर व्यक्तियों की शिराएँ तन जाती हैं और भर जाती है मनप्राण में स्फूर्ति की एक नवीन धारा, मुझे ऐसा लगता है कि जिस तरह से महावीर हनुमान ने तुलसी को आशीर्वाद देकर रामचरितमानस का जनमानस में समाहित करायाउसी तरह माँ शारदा ने बुंदेलखंड के इस वीरस से ओतप्रोत काव्य-ग्रंथ को भारत के एक बड़े भू-भाग में समादृत कराया और यही आल्हा की अमरता का रहस्य है, क्योंकि काल के कपोल पर लोक-रुचि की रचनाएँ जीवित रहती हैं।

माँ शारदा के पास पहुँचने के पहले मंदिर के प्रांगण में बाहर नारियल फोड़कर उसके बाद माँ का दर्शन किया जाता है और मंदिर के प्रकोष्ठ में पहुँचने पर भक्त श्रद्धालुओं को एक विद्युत् शक्ति के झटके का आभास होता है और सब भक्तों की तो माँ के सान्निध्य में दृष्टि जाती है और एक क्षण के लिए लगता है जैसे मनप्राण जुड़ गए हों।

मैहर की माँ शारदा मंदिर कैसे पहुंचे मंदिर :

राजधानी दिल्ली से मैहर तक की सड़क से दूरी लगभग 1000 किलोमीटर है। ट्रेन से पहुंचने के लिए महाकौशल व रीवा एक्सप्रेस उपयुक्त हैं। दिल्ली से चलने वाली महाकौशल एक्सप्रेस सीधे मैहर ही पहुंचती है। स्टेशन से उतरने के बाद किसी धर्मशाला या होटल में थोड़ा विश्राम करने के बाद चढ़ाई आरंभ की जा सकती है। रीवा एक्सप्रेस से यात्रा करने वाले भक्तजनों को मजगांवां पर उतरना चाहिए। वहां से मैहर लगभग 15 किलोमीटर दूर है।


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