मंदिरों का शहर है महाबलीपुरम : Mahabalipuram History in Hindi

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Mahabalipuram History in Hindi
Mahabalipuram History in Hindi

महाबलिपुरम् आज एक छोटी सी जगह है। कभी यहाँ पल्लवों का पोता श्रय था। ईसा पूर्व से ही ग्रीक नाविक अपने पोत यहाँ खड़ा किया करते थे। आसपास के स्थलों से प्राप्त असंख्य रोमन सिक्के इसके अंतरराष्ट्रीय व्यापार केंद्र होने का
संकेत देते हैं। ग्रीक भूगोलविद् टालेमी ने इसका उल्लेख ‘मालंग’ नाम से किया है। वैसे तो किंवदंतियों के आधार पर कुछ लोग इसे पुराणों में वर्णित विष्णु दमित महाबली का क्षेत्र मानते हैं, पर वस्तुत: यह क्षेत्र तो ‘माम्मल’ शासकों का है।

मंदिरों का शहर है महाबलीपुरम : Mahabalipuram History in Hindi

Where is Mahabalipuram Temple : महाबलीपुरम मंदिर कहाँ है

मंदिरों का शहर महाबलीपुरम तमिल नाडु की राजधानी चेन्नई से 55 किलोमीटर दूर बंगाल की खाड़ी के तट पर स्थित है। प्रांरभ में इस शहर को मामल्लापुरम कहा जाता था। तमिलनाडु का यह प्राचीन शहर अपने भव्य मंदिरों, स्थापत्य और सागर-तटों के लिए बहुत प्रसिद्ध है। सातवीं शताब्दी में यह शहर पल्लव राजाओं की राजधानी था।

Mahabalipuram History in Hindi : महाबलीपुरम मंदिर का इतिहास

दक्षिण भारत में पल्लवों का आधिपत्य छठी सदी के मध्य से लगभग 900 ई. तक रहा। पल्लव राजाओं की पदवी ‘मामल्ल’ हुआ करती थी। इसीलिए यह प्रदेश ‘मामल्लपुरम्’ के नाम से भी जाना जाता है।

लेकिन समय की कहानी कितनी अजीब है ! जिन देवालयों में कभी वेदमंत्र उच्चरित होते होंगे, वे आज खाली पड़े हैं-वीरान। पर यहाँ के मंदिरों और मूर्तियों की कला भारत की प्राचीन कलाप्रियता की परिचायक तो है ही, आज यह स्थल कला-प्रेमियों, इतिहासज्ञों एवं पुरातत्व के पारखियों का तीर्थस्थल भी बन गया । वैसे यह शिलाशिल्प के लिए भी विश्वविख्यात है। और इसी जिज्ञासा और उत्साह में महाबलिपुरम् की यात्रा कर सकते हैं।

दक्षिण भारत की यात्रा में निकलने पर यदि महाबलिपुरम् का अवलोकन न किया जाए तो शायद यह यात्रा अधूरी ही कहलाएगी। पर्यटन विभाग की बसें नित्य प्रात: मद्रास से आठ बजे छूटती हैं और बारह घंटे की यात्रा में कई स्थानों की सैर
करा देती हैं। ऐसे स्थलों में महाबलिपुरम्, पक्षीतीर्थम्कांचीपुरम् आदि के नाम उल्लेखनीय हैं। यह स्थल मद्रास के करीब साठ किलोमीटर दक्षिण में समुद्र-तट पर स्थित है। पल्लव राजाओं ने इसका निर्माण कराया। कहते , यह कभी पुर्तगालियों
का बंदरगाह था।

यह अत्यंत पवित्र धार्मिक स्थल है। समुद्र-तट पर स्थित होने के कारण मानव-मन को यहाँ बड़ी शांति मिलती है। जब आप कई स्थलों का भ्रमण करके यहाँ पहुँचते हैं तो लगता है, जैसे देवताओं और मंदिरों के देश में चले आए हैं। समुद्र-तटीय अलौकिक छटा निहारने के अलावा प्रस्तर मूर्तियों में प्राण फुकने वाले कलाकारों की कारीगरी देखते ही बनती है। दर्शक जैसे इन्हें देखते हुए आत्मविभोर सा हो जाता है। वह अपनी सुध-बुध खो बैठता है।

कहा जाता है कि पांडवों ने चौदह वर्षों के वनवासकाल में कुछ समय तक यहाँ अज्ञातवास किया था ।

महाबलिपुरम् में प्राप्त विशालकाय चट्टान राशि, जो प्रतिमाओं का रूप पा चुकी है और जिसके निर्माण में शिल्पियों की दीर्घकालीन कठिन साधना लगी हुई है, भारत की एक दर्शनीय वस्तु है। दक्षिण भारत , जो प्राचीन प्रतिमाओं तथा बौद्ध प्रतिमाओं का केंद्र माना जाता है, वह महाबलिपुरम् का विशाल शिव मंदिर आज भी अपने अलौकिक शिल्प-सौंदर्य के लिए विख्यात है। मंदिर सागर की तूफानी लहरों एवं कालचक्र के कठोर आघातों के बीच आज भी अक्षुण्ण है।

उसकी प्रतिमाओं के ऊपर निश्चय ही खारे जल के आघात के चिह्न स्पष्ट अंकित हैं, फिर भी उनकी दर्शनीयता पर जरा भी अंच नहीं आई है। मंदिर का कलश बड़ा ही सुंदर है, जो मानवीय शिल्पकला की प्रवीणता का परिचायक है। बाहर के सभी स्तंभ प्राय: खंडित हो गए हैं। फिर भी, इनके भग्नावशेष प्राचीन भारत की शिल्पकला की श्रेष्ठता के नयनाभिराम नमूने हैं।

Mahabalipuram : महाबलीपुरम के मंदिर

Mahabalipuram Rath Mandir in Hindi – 

महाबलिपुरम के लोकप्रिय रथ दक्षिणी सिर पर स्थित हैं, ये विशाल मंदिर जिन पर रथों की आकृतियाँ अंकित हैं, भारतीय संस्कृति के गौरव के प्रतीक हैं। ये मंदिर प्राय: एक ही चट्टान को काटकर बनाए गए हैं। पाँच पांडवों के नाम से यह जाना जाता है; यथा-युधिष्ठिर, अर्जुन, भीम, नकुल और सहदेव। सबसे छोटा रथ द्रौपदी के नाम पर है। यह कलाकार की अद्भुत शिल्पकला का नमूना है। इनकी निर्माणशैली में वैविध्य के दर्शन होते हैं किसी का आकार घोड़े की नाल की तरह है, तो किसी का छोटी-लंबी नौकाओं की तरह।

पहाड़ी की गुफा – 

यहाँ ऐसे मंदिरों का भी अभाव नहीं, जो ऊँचे-ऊँचे पहाड़ों को काटकर गुफाओं के रूप में ढाल दिए गए हैं और जिनकी दीवारों पर अनेक देवी-देवताओं के कलापूर्ण चित्र अंकित हैं। यह स्मारक एक व्यापक क्षेत्र भर में फैले हुए हैं. ये महाबलीपुरम में बड़े स्थानों में से एक है. इनमें मुख्य है – महिषासुरमर्द्दिनि गुफा, वराह गुफाएं, कृष्णा मंडपम और अर्जुन तपस्या, मंदिरों की दीवारों पर नायक-नायिकाओं की अनेक श्रृंगारिक मुद्राएँ अंकित की गई हैं, राह गुफा विष्णु के वराह और वामन अवतार के लिए प्रसिद्ध है। साथ की पल्लव के चार मननशील द्वारपालों के पैनल लिए भी वराह गुफा चर्चित है। सातवीं शताब्दी की महिसासुर मर्दिनी गुफा भी पैनल पर नक्काशियों के लिए खासी लोकप्रिय है

मूर्ति संग्रहालय –

राजा स्ट्रीट के पूर्व में स्थित इस संग्रहालय में स्थानीय कलाकारों की 3000 से अधिक मूर्तियां देखी जा सकती हैं। संग्रहालय में रखी मूर्तियां पीतल, रोड़ी, लकड़ी और सीमेन्ट की बनी हैं।

मुट्टुकाडु –

यह स्थान महाबलिपुरम से 21 किलोमीटर की दूरी पर है जो वाटर स्पोट्र्स के लिए लोकप्रिय है। यहां नौकायन, केनोइंग, कायकिंग और विंडसर्फिग जसी जलक्रीड़ाओं का आनंद लिया जा सकता है।

कोवलोंग –

महाबलिपुरम से 19 किलोमीटर दूर कोवलोंग का खूबसूरत बीच रिजॉर्ट स्थित है। इस शांत फिशिंग विलेज में एक किले के अवशेष देखे जा सकते हैं। यहां तैराकी, विंडसफिइर्ग और वाटर स्पोट्र्स की तमाम सुविधाएं उपलब्ध हैं।

वॉच टॉवर और लाइट हाउस –

पास ही प्रकाशस्तंभ भी स्थित है, जो समुद्र यात्रियों का पथ-प्रदर्शन करता है, इस घड़ी टॉवर के बगल में अंग्रेजों द्वारा बनाया गया लाइट हाउस है जो वॉच टॉवर से लम्बा है. इस एक लाइट हाउस से महाबलीपुरम का पूरा दृश्य देख सकते हैं

शोर मंदिर – 

महाबलीपुरम में शोर मंदिर एक तटीय गांव के 50 किमी मद्रास के दक्षिण में बनाया गया था, ये राजसिम्हा के शासनकाल के दौरान 7 वीं शताब्दी में बनाया गया था और ये पल्लव कला के अंतिम फूल को दर्शाती है. ये मंदिर सुव्यवस्थित रूप से भव्य द्रविड़ वास्तुकला का उदाहरण है. एक सुरक्षात्मक बांध के पीछे लहरों पर टावर हैं.

महाबलिपुरम कृष्ण मंडपम मंदिर –

कृष्ण मंदिर के ऊपरी स्तंभ पर ब्रजवासियों की रक्षा के लिए गोवर्धन को अपनी कनिष्ठिका पर धारण किए हुए भगवान कृष्ण का चित्र अंकित है, जो बड़ा ही सुंदर लगता है। अन्य स्तंभों पर वाराह का मोहक चित्र अंकित है। इसी प्रकार दूसरे स्तंभों पर अंकित महिषासुरमर्दिनी की प्रस्तर मूर्ति शिल्पकला की दृष्टि से विस्मय – विमुग्धकारी है।

क्रोकोडाइल बैंक –

महाबलिपुरम से 14 किलोमीटर दूर चैन्नई- महाबलिपुरम रोड़ पर क्रोकोडाइल बैंक स्थित है। इसे 1976 में अमेरिका के रोमुलस विटेकर ने स्थापित किया था। स्थापना के 15 साल बाद यहां मगरमच्छों की संख्या 15 से 5000 हो गई थी। इसके नजदीक ही सांपों का एक फार्म है।

अर्जुन्स पेनेन्स – 

यह स्थान सबसे विशाल नक्काशी के लिए लोकप्रिय है। यह 27 मीटर लंबा और 9 मीटर चौड़ा है। इस व्हेल मछली के पीठ के आकार की विशाल शिलाखंड पर ईश्वर, मानव, पशुओं और पक्षियों की आकृतियां उकेरी गई हैं। अर्जुन्स् पेनेन्स को मात्र महाबलिपुरम या तमिलनाडु की गौरव ही नहीं बल्कि देश का गौरव माना जाता है।

महाबलिपुरम् के चित्रखंडों पर अंकित प्रतिमाएँ या मूर्तियाँ बौद्ध शैली की हैं। इनमें गंगावतरण का दृश्यांकन एवं अनंतनाग पर सोए विष्णु विशेष रूप से सुंदर हैं उन अंकित प्रतिमाओं को देखने से स्पष्ट होता है कि प्रत्येक प्राणी तपस्या में लीन है। तपस्या में लीन सपरिवार गजराज का दृश्य तो बड़ा ही मार्मिक है। शिशु हाथियों के चित्र सुंदर रूप से अंकित किए गए हैं

वैसे तो अजंता में भी हाथियों के सुंदर चित्र हैं, किंतु महाबलिपुरम् की शिशु हस्तिमूर्तियाँ एक विशेष सौंदर्य से युक्त हैं । ऐसी मूर्तियाँ अन्यत्र दुर्लभ हैं। इसी प्रकार इन चट्टानों पर बंदरों की सौंदर्ययुक्त प्रतिमाएँ भी अद्वितीय हैं। समुद्रतटवर्ती शिवालय भी भारतीय वास्तुशिल्प का अनोखा उदाहरण है। उदयोन्मुख कला-साधकों के लिए महाबलिपुरम् इस दृष्टि से एक महत्वपूर्ण प्रेरणास्थल है।

महाबलिपुरम का पर्व और त्यौहार : 

यह नृत्य पर्व सामान्यत: जनवरी या फरवरी माह में मनाया जाता है। भारत के जाने माने नृत्यकार शोर मंदिर के निकट अपनी कला का प्रदर्शन करते हैं। पर्व में बजने वाले वाद्ययंत्रों का संगीत और समुद्र की लहरों का प्राकृतिक संगीत की एक अनोखी आभा यहां देखने को मिलती है।

Mahabalipuram Temple Yatra : महाबलीपुरम मंदिर की यात्रा

वायु मार्ग – महाबलिपुरम से 60 किलोमीटर दूर स्थित चैन्नई निकटतम एयरपोर्ट है। भारत के सभी प्रमुख शहरों से चैन्नई के लिए फ्लाइट्स हैं।
रेल मार्ग – चेन्गलपट्टू महाबलिपुरम का निकटतम रेलवे स्टेशन है जो 29 किलोमीटर की दूरी पर है। चैन्नई और दक्षिण भारत के अनेक शहरों से यहां के लिए रेलगाड़ियों की व्यवस्था है।
सड़क मार्ग – महाबलिपुरम तमिलनाडु के प्रमुख शहरों से सड़क मार्ग से जुड़ा है। राज्य परिवहन निगम की नियमित बसें अनेक शहरों से महाबलिपुरम के लिए जाती हैं।

महाबलिपुरम् की सांस्कृतिक, धार्मिक और कलात्मक ऐतिहासिक संपदा का अनुभव आप यहाँ के तट-मंदिर में बैठकर ही कर सकते हैं। भारत की उत्तरी हिस्से से जुड़े आख्यानों का चित्रण सुदूर दक्षिण के कलाकारों द्वारा होना, इन देश
की धार्मिक, सांस्कृतिक एकता का ही तो प्रतीक है। कला की दिशा में भूगोल का प्राचीर नहीं होता, मात्र भावनाओं का उन्मेष होता है।

यहाँ की शोभा और विशेषताओं को देखने के लिए केवल भारतवासी ही नहीं, विदेशी पर्यटक भी आया करते हैं। और तब हमारा यह भ्रम दूर होता है कि भारतीय कला विदेशियों की दृष्टि में शिशु-कला रही है। यह हमारे स्वभाव का दुर्भाग्य रहा है कि हम अपनी कलाओं को व अपने कलाकारों का सम्मान करने में गर्व का अनुभव नहीं करते। हम भारतीयों ने इसी कारण अपनी हजारों कला स्मृतियाँ खो दी हैं।


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