Patan Devi Temple History in Hindi : पटन देवी मंदिर पटना

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Patan Devi Temple History in Hindi
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Patan Devi Temple History in Hindi : पटन देवी मंदिर पटना


Where is Patan Devi Temple

पटना की नगर-रक्षिका के रूप में तथा देश की इक्यावन शक्तिपीठों में पटन देवी का नाम महत्त्वपूर्ण है। यहाँ पर दो पटन देवियाँ हैं—बड़ी और छोटी। इसमें छोटी पटनदेवी की अधिक चर्चा है। बड़ी पटन देवी गुलजारबाग में महाराजगंज के पास है। छोटी पटन देवी शहर की आबादी के बीच नगर की प्राचीन पूर्वी सीमा पूरब दरवाजा से लगभग एक किलोमीटर पश्चिम है।

यह स्थान एक प्रकार का बहुधर्मी आध्यात्मिक केंद्र है, जहाँ साल भर तीर्थयात्रियों-पर्यटकों का मेला-सा लगा रहता है। विशेषकर दशहरे के अवसर पर दर्शनार्थी इन जगहों में पहुँचते हैं। पटना में सती का पटल गिरा जिससे इनका नाम ‘पटलदेवी’ पड़ा और स्थान का नाम ‘पटला’ हुआ। वहीं ‘पटला’ का अपभ्रंश ‘पटना’ हो गया, जो आज पटना शहर है। पटना शहर की स्थापना तथा पटनदेवी के संबंध में अन्य अनेक कथाएँ प्रचलित हैं।

 

patan devi mandir photo
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Patan Devi Temple Mandir ki Katha

एक किंवदंती के अनुसारप्राचीन काल में पाटलिपुत्र की राजमहिषी पटलावती को एक रात्रि स्वप्न हुआ। स्वप्नानुसार उसने खुदाई कराई, जिसमें भगवती की तीन मूर्तियाँ-महाकाली, महालक्ष्मी एवं महासरस्वती की प्रतिमाएँ निकलीं जो बड़ी पटनदेवी मंदिर में स्थापित हैं। जहाँ से ये प्रतिमाएँ निकली थीं, वह स्थान आज भी बड़ी पटनदेवी मंदिर के समीप ‘बड़ी पटनदेवी का गड्ढा’ के नाम से जाना जाता है।

बड़ी पटनदेवी से लगभग तीन कि.मी. पूरब में छोटी पटनदेवी मंदिर है। यहाँ भी भगवती की तीन प्रतिमाएँ सिंहासनस्थ हैं। प्रत्येक दु:ख-सुख के अवसर पर नगरवासी माँ भगवती की शरण में आते हैं। नगर के प्राय: प्रत्येक हिंदू परिवार में नव दंपती के लिए भावी सुखमय जीवन की कामना हेतु माँ के मंदिर में जाने की परम्परा है।

patna devi images

पटन देवी मंदिर पटना की पौराणिक कथा

पौराणिक कथा बताती है कि भगवान शंकर के श्वसुर दक्ष प्रजापति को ब्रह्माजी ने प्रजापतियों का नायक बना दिया। ब्रह्माजी ने उन्हें योग्यता के आधार पर गौरव प्रदान कियापरंतु यह अप्रत्याशित शक्ति पाते ही वे मदांध हो गए। नायक का पद प्राप्त होने के बाद ही उन्होंने एक विशाल यज्ञ का आयोजन किया। इस यज्ञ में सभी देवी-देवताओं एवं ऋषि-महर्षियों को आमंत्रित किया गया, परंतु भगवान शंकर की जान-बूझकर उपेक्षा की गई। उन्हें आमंत्रित नहीं किया गया। अपनी पुत्री, भगवान शंकर की पत्नी, सती को भी प्रजापति ने निमंत्रित नहीं किया। सती को अपने पिता द्वारा आयोजित यज्ञ का समाचार मिला तो वे बहुत दु:खी हुईं। बिना बुलावे के भी उन्होंने पीहर जाने और यज्ञ में शामिल होने का विचार किया। उनके  पति शंकर ने बिना बुलाए न जाने की सलाह दी, परंतु वे उनकी आज्ञा का उल्लंघन कर मोहवश पिता के घर चली ही गईं।

पिता के घर जाने पर उनकी माता ने तो उनका स्वागत किया, परंतु पिता तथा अन्य लोगों ने उपेक्षा भाव ही बरता। भगवान शिव की भी घोर उपेक्षा की गई और यज्ञ में उन्हें महत्त्व नहीं प्रदान किया गया। अपने पिता दक्ष प्रजापति द्वारा पति का अपमान किए जाने से क्षुब्ध सती ने यज्ञवेदी में कूदकर प्राण दे दिए। इस भयंकर दुर्घटना से क्षुब्ध क्रुद्ध भगवान शंकर के गणों ने दक्ष प्रजापति के यज्ञस्थल को उजाड़ दिया।

इससे भगवान शंकर आग बबूला हो उठे और सती के शव को अपने त्रिशूल पर टाँगे त्रिलोक में विचरण करने लगे। शंकरजी के इस तांडव से चारों ओर हाहाकार मच गया और लोग आतंकित हो उठे कि अब सृष्टि का विनाश होकर ही रहेगा।

सभी देवताओं ने भगवान विष्णु से संसार का प्रलय होने से रक्षा करने की प्रार्थना की। विष्णुजी को मालूम था कि जब तक सती के शव का शंकरजी के शरीर से स्पर्श रहेगा, तब तक वह नष्ट नहीं होगा। ऐसा इस कारण भी कि शंकरजी का ऐसा  वरदान प्राप्त था।

देवताओं के अनुरोध को स्वीकार कर भगवान विष्णु ने अपना सुदर्शन चक्र चलाया, जिसने सती के पार्थिव शरीर को खंडित करना शुरू कर दिया। इस प्रकार सती के शरीर के इक्यावन खंड हुएजो आर्यावर्त ( भारत) के विभिन्न इक्यावन स्थानों पर गिरे।

सती के अंग जिन स्थानों पर गिरे, वे शक्तिपीठ के नाम से प्रसिद्ध हुए। ‘तंत्र चूड़ामणि’ के अनुसार, मगध में सती की दक्षिण जंघा गिरी

मागधे वहा जंघा में व्योमकेशस्तु
सर्वानन्दकरी देवी सर्वानन्द फलप्रदा॥

तभी से  यहाँ की देवी ‘सर्वानंदकरी कहलाती है और शिव ‘व्योमकेश कहे गए हैं । अत: पटनेश्वरी का मंदिर भी शक्तिपीठ है।

पटन देवी मंदिर का महत्व 

सम्भव है कि इन स्थानों पर देवी का पट दो स्थानों पर गिरा हो, जिसकी वजह से यहाँ बड़ी और छोटी दो पटनदेवी स्थान कायम हुआ हो। परंतु साक्ष्यों के आधार पर छोटी पटनदेवी ही अधिक प्राचीन मालूम पड़ती हैं।

devi patan photo
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जिस स्थान पर सती का पट गिरा था, उस स्थान को सुरक्षित रखा गया है। वहाँ पर वेदी बनी हुई है, जिसकी विधिवत् पूजा होती है। कहते हैं, फ्रांसिस बुकानन (बाद में हैमिल्टन) ने सन 1811-12 के बीच पटना और गया जिले का सर्वेक्षण किया था।

उसने भी अंपनी डायरी में बड़ी तथा छोटी पटनदेवी का जिक्र किया है। बड़ी पटनदेवी में स्थापित दुर्गा, लक्ष्मी तथा सरस्वती की छोटी मूर्तियों के दर्शन भी उन्होंने किए थे।

छोटी पटनदेवी के संबंध में उन्होंने लिखा है-‘‘यह बड़ी पटनदेवी से भी अधिक लोकप्रिय हैं, परंतु मंदिर का भवन कोई उल्लेखनीय नहीं है। यहाँ भगवान सूर्य तथा भगवान विष्णु की भी छोटी मूर्तियाँ हैं । उस स्थान पर पिंड बनाकर रखा गया
है, जहाँ देवी का पटल गिरा था।” बुकानन ने लिखा कि मूर्तियों की प्रतिष्ठापना मुगल सेनापति राजा मान सिंह ने कराई थी।

अब छोटी पटन देवी मंदिर का पुराना भवन तोड़कर नया भवन बन चुका है। नए भवन के बन जाने से वहाँ की रौनक बदल गई है। यहाँ पहुँचने के लिए , रिक्शा, बसें आदि वाहन सुलभ हैं। बड़ी पटनदेवी जाने के लिए दूर के यात्री गुलजार बाग रेलवे स्टेशन पर उतर सकते हैं। इसी तरह छोटी पटनदेवी मंदिर जाने वाले यात्रियों को पटना साहिब (पटना सिटी) स्टेशन उतरकर वाहन से या पैदल जाना चाहिए

छोटी पटन देवी मंदिर
छोटी पटन देवी मंदिर

पटन देवी मंदिर का उत्सव : कब जाएँ 

चैत्र-मास के नवरात्रि-पर्व पर वीर रतननाथ बाबा की सवारी नेपाल के जिला दांग चौधरा नामक स्थान से पदयात्रा करके मठ के महंतों द्वारा हर वर्ष पंचमी के दिन माँ पाटेश्वरी के दरबार पाटन में लायी जाती है। यह शिवावतार महायोगी गुरु गोरखनाथ से दीक्षा लेकर स्वयं एक सिद्ध महायोगी पीर रतननाथ बाबा के नाम से प्रसिद्ध हुए। देश के कई भागों में आज भी इनके मठ एवं मंदिर तथा दरीचे मिलते हैं। मंदिर के पीछे प्रांगण में स्थित पीर रतननाथ बाबा पाटेश्वरी के परमभक्त थे और प्रतिदिन दांग नेपाल से कठिन पहाड़ी के रास्ते से आकर देवी की आराधना किया करते थे। माता जी ने प्रसन्न होकर एक बार उनसे वरदान मांगने के लिए कहा, तो रतननाथ ने कहा, “माता, मेरी प्रार्थना है कि आपके साथ यहाँ मेरी भी पूजा हो।

देवी ने कहा, “ऐसा ही होगा। तभी से यहाँ रतननाथ का दरीचा कायम है। दरीचे में पंचमी से एकादशी तक रतननाथ की पूजा होती है। इस अवधि में घंटे व नगाड़े नहीं बजाये जाते हैं। और देवी की पूजा केवल रतननाथ के पुजारी ही करते हैं।

Patan devi mandir timing : मन्दिर में दर्शन का समय

मंदिर दिनभर माता के दर्शनों के लिए खुला रहता है। नवरात्रि में यहां महानिशा पूजा होती है और अर्धरात्रि की पूजा के बाद पट खुलते ही 2.30 बजे आरती होती है

पाटन देवी मंदिर कैसे पहुंचें : How To Reach Patan devi mandir

सड़क से : पटन देवी, छिपुरा बस स्टॉप से 16 किलोमीटर दुरी पर है और पटना जंक्शन से 11 किलोमीटर है,  इसके लिए आप टैक्सी या निजी साधन ले सकते है। आप पटना के बस स्टैंड एवं रेलवे स्टेशन से ​पब्लिक ट्रांसपोर्ट की सुविधा का लाभ भी ले सकते है
एयरपोर्ट: जयप्रकाश नारायण इंटरनेशनल एयरपोर्ट से मंदिर की दुरी 20 किलोमीटर है

Patan Devi Temple on Google Map


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