Pawapuri Mandir History in Hindi : Pawapuri Jal Mandir Bihar : पावापुरी

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Pawapuri Mandir History in Hindi
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Pawapuri Mandir History in Hindi : Pawapuri Jal Mandir Bihar : पावापुरी


आधे दोहे में लिखासब ग्रंथों का सार।
पर पीड़न महापाप है, परम धर्म उपकार ॥

दोहे का अर्थ बहुत सरल है, यानी सारे ग्रंथों का भाव यह कि दूसरे को दु:ख पहुँचाना महापाप है और दूसरे का भला करना, उपकार करना बहुत बड़ा धर्म है ।

जैन धर्म के चौबीसवें प्रवर्तक तीर्थकर महावीर ने मूल रूप से ऊपर दोहे के इसी भाव को अपने उपदेशों के द्वारा व्यक्त किया था। हाँ, भगवान महावीर जैन धर्म के चौबीसवें तीर्थकर थे। इनके पहले जैन धर्म के तेईस तीर्थकर हो चुके थे। पुराण में इस बात का प्रमाण है कि जैन धर्म के प्रथम तीर्थकर या आदि तीर्थकर आदिनाथ थे, जिनका जन्म अयोध्या में हुआ था।

इन्हें ‘ऋषभनाथ’ के नाम से भी जाना जाता है। लेकिन जिन लोगों ने जैन धर्म का गहरा अध्ययन किया है, वे इस बात को जानते हैं ।

भगवान महावीर ने अपने उपदेशवचनों में मुख्य रूप से अहिंसा पर बल दिया। मगर इस एक शब्द ‘अहिंसामें मानवधर्म के सारे तत्व चले आते हैं। यदि हमारे अनुचित व्यवहार से किसी की आत्मा को ठेस पहुँचती है तो उसे भी हिंसा ही कहेंगे बल्कि ज्ञानियों ने तो यहाँ तक कहा है कि किसी के शरीर को मार देने से भी बड़ी हिंसा किसी की आत्मा को मारना या दु:ख पहुँचाना है।

यह बात आसानी से समझी जा सकती है कि अहिंसा के हाथ-पाँव कितने लंबे हैं-यह धर्म के सारे गुणों को एक बार में ढंक लेती है और भगवान महावीर ने विश्व के समस्त मानव-समाज को इसी अहिंसा व्रत का पालन करने का संदेश दिया। इसीलिए जैन मतावलंबी या जैन धर्म में विश्वास करनेवाले से तन-मन-धन अहिंसा का पालन करते हैं

बौद्ध धर्म के अनुयायियों की तरह जैन धर्म के अनुयायियों ने अपने धर्म के प्रचार के लिए विदेशों की सीमा में प्रवेश नहीं किया बल्कि अपने देश में ही इसके प्रचार-प्रसार का प्रयत्न करते रहे। ओज था इसीलिए भगवान महावीर की वाणी में अपार शक्ति थी, अपूर्व , उनका प्रभाव राजघरानों में भी था। इतिहासकारों के अनुसारबिंबिसार श्रेणिक अपनी रानी चेलना के साथ महावीर के पास उनके उपदेश-वचन सुनने आया करते थे।

ऐसे महापुरुष के कार्यक्षेत्र और निर्वाण स्थल को आप अवश्य देखना चाहेंगे। भगवान महावीर का देहांत ईसा से 527 वर्ष पहले करीब 72 वर्ष की आयु में पावापुरी (बिहार) में हुआ था। भारतीय पंचांग के अनुसारउन्होंने विक्रम से 470 वर्ष पूर्व और शककाल से 605 वर्ष5 मास पूर्व अपना शरीर छोड़ा था। इसी स्थल पर उन्होंने अंतिम उपदेश देते हुए निर्वाण पद पाया था।

पावापुरी : हाँ, यह स्थान पटना से करीब 101 कि.मी. (पटना-रांची पथ पर) है। यों पावापुरी जाने के लिए रेलमार्ग नहीं है, मगर बस और टैक्सी बड़ी आसानी से मिलती है। राह में अपूर्व प्राकृतिक सौंदर्यसड़कों के किनारे खड़े खेतों में काम करते हुए भोले ग्रामीण किसान-मजदूर अपने बच्चों के साथ दीख पड़ेंगे। छोटी-छोटी पुलियाँ नजर आएँगी। सड़कों के दोनों ओर दूर-दूर तक फैले हुए बगीचे नजर आएँगे।

बिहार के बाहर से आनेवाले पर्यटकों अथवा तीर्थयात्रियों की सुविधा के लिए बिहार सरकार ने अपनी ओर से एक पर्यटक विभाग का कार्यालय खोल रखा है। यहीं से प्रतिदिन दर्शनार्थियों के लिए बसें खुलती हैं। बसें राजगीर, नालंदा पावापुरी, बोधगया आदि स्थानों पर जाती हैं । इनमें यात्रियों की संख्या काफी रहती है

पावापुरी पहुँचते ही मन में अहिंसा की भावना बलवती होने लगेगी और वहाँ के दृश्यों तालाबों और मंदिरों को देखकर आदमी जैसे निहाल हो जाता है

यहाँ के चारों मंदिर अत्यंत आकर्षक और कलात्मक हैं। कलासौंदर्य और ज्ञान जैसे तीनों एक में समा गए हैं। ये चार मंदिर हैं—गाँव मंदिर, जल मंदिर, समवशरण मंदिर और महताब बीबी का मंदिर।

जैन धर्म के जानकारों का ऐसा कहना है कि इनमें से अंतिम को छोड़कर शेष तीनों मंदिरों के स्थलों को भगवान महावीर ने अपने अंतिम दिनों में अपनी उपस्थिति से पवित्र किया था।

गाँव मंदिर : यह जल मंदिर से कुछ उत्तर में स्थित है। कहा जाता है कि कभी यहाँ एक विशाल लेखशाला थी। इस लेख शाला में रहकर बड़ेबड़े विद्वान ग्रंथ और लेख लिखा करते थे। इस लेखशाला को राजा हस्तिपाल ने बनवाया था। और इसका सारा खर्च वह अपने खजाने से पूरा करते थे।

जंल मंदिर : कहा जाता है कि जल मंदिर का निर्माण उसी स्थान पर किया गया, जहाँ ढाई सौ वर्ष पूर्व जैन धर्म के अंतिम तीर्थकर का अंतिम संस्कार हुआ था। यह समतल और सपाट मैदान में है। जल मंदिर जल के बीच बना हुआ है। और दूर से ही दर्शकों को अपनी ओर आकृष्ट करता है। प्राचीन काल में जब पुल नहीं था, तब लोग नौकाओं में बैठकर को पार करते हुए जल मंदिर तक पहुँचते थे। आगे चलकर एक पुल बना, जो दर्शनार्थियों के लिए सुविधा का साधन बन गया है। यह पुल लगभग 600 फीट लंबा है।

जिस सरोवर के बीच यह जल मंदिर बना हुआ है, वह सरोवर कमल पुष्पों से सदैव आच्छादित रहता है और अपने प्राकृतिक सौंदर्य के कारण देवलोक के सरोवर-सौंदर्य का भान कराता है। इस जल मंदिर में मध्य वेदी पर भगवान महावीर की चरण पादुकाएँ रखी हुई हैं। तालाब में उतरने के लिए उत्तर-पश्चिम दिशा में सुंदर सीढ़ियाँ बनी हुई हैं। संगमरमर की विशाल रेलिंग सहज ही हमें आश्चर्य में डाल देती है कि इसका निर्माण किस शिल्पी ने और कितने चातुर्य से किया होगा! दूर से देखने पर यह मंदिर स्फटिक विमान के जैसा प्रतीत होता है।

कार्तिक अमावस्या की पूर्वसंध्या को इस मंदिर का सौंदर्य तो जैसे और निखर उठता है। असंख्य दीप जलाए जाते हैं और भक्तों के कंठों से अनायास ही भक्ति-संगीत गूंज रहा होता है। मंदिर के पास भारी मेला लगता है।
आस-बड़ा

समवशरण मंदिर : कहा गया है कि ‘को बड़ छोट कहत अपराधू, इसलिए यही कहना उचित प्रतीत होता है कि इस मंदिर का भी अपना विशेष महत्व है।

इस मंदिर में संगमरमर के बने कमल पुष्प के ऊपर भगवान महावीर की मूर्ति स्थापित है। भगवान के नेत्रों को देखने से ऐसा अनुभव होने लगता है, जैसे उनसे मानव-जाति के लिए शोभन-संदेश फूटफूटकर चारों ओर फैल रहे हैं। जैन धर्म
की भी दो शाखाएँ हैं-श्वेतांबर और दिगंबर। श्वेतांबर मतावलंबियों के अनुसार, भगवान महावीर ने उस स्थल पर अपने अंतिम उपदेश-वचन कहे थे, जहाँ यह मंदिर बना हुआ है।

महताब बीबी का मंदिर : जब आप जल मंदिर की सीढ़ी पर खड़े होंगेतो ठीक सामने एक और सुंदर मंदिर नजर आएगा। इसका नाम है महताब बीबी का


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