Pushkar History in Hindi : तीर्थराज पुष्कर : Brahma Temple Pushkar in hindi

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Pushkar History in Hindi

Pushkar History in Hindi : तीर्थराज पुष्कर : Brahma Temple Pushkar in hindi


राजस्थान जहाँ के कण-कण में वीर राजपूत योद्धाओं की वीर गाथाएँ अंकित है, जहाँ के ऐतिहासिक किले और अवशेष राजपूत काल की शिल्प एवं वास्तुकला की याद दिलाते हैं, वहीं पुष्कर है, जिसे लोग प्रयाग की तरह ही तीर्थराज मानते हैं। प्राकृतिक सौंदर्य, ऐतिहासिक किलों, महलों के साथ-साथ धार्मिक दृष्टि से भी पुष्कर एक दर्शनीय स्थान है। यहाँ देश-विदेश के पर्यटक आते ही रहते हैं।

ऐसी लोक-मान्यता है कि एक बार ब्रह्मा यज्ञ के लिए किसी पवित्र भूमि की तलाश में घूम रहे थे। इस क्रम में उनके हाथ से कमल का एक फूल गिर गया। जहाँ वह फूल गिरावहाँ स्वच्छ निर्मल जल का फव्वारा फूट पड़ा और वहाँ एक झील बन गई। इस झील के किनारे ब्रह्माजी का एक मंदिर है। यों तीन ओर से पहाड़ियों से घिरे पुष्कर में और इसके आसपास 400 छोटेबड़े मंदिर हैं, जिनमें प्रमुख ब्रह्माजी का मंदिर है। लोगों का विश्वास है कि साल में पाँच दिन एकादशी से कार्तिक पूर्णिमा सभी देवी-देवता आते और ठहरते हैं। इस झील में तक यहां स्नान करने से सारे पाप धुल जाते हैं। इस अवधि में यहाँ पाँच दिनों तक मेला लगा रहता है।

प्रतिवर्ष कार्तिक पूर्णिमा के दिन यहाँ के विश्व प्रसिद्ध मेले को देखने दूर दूर से लोग आते हैं।

समझा जाता है कि संस्कृत के महान् कवि कालिदास ने चौथी सदी में यहीं आकर ‘अभिज्ञान शाकुंतलम्’ की रचना की थी। ऐतिहासिक साक्ष्य के अनुसार 17वीं सदी में शाकंभरी के प्रसिद्ध चौहान राजा अजयदेव ने इस ‘अजय मेरु’ को बसाया था, जिसे आज ‘अजमेर’ कहा जाता है। दिल्ली से 400 कि.मी., राजस्थान की राजधानी जयपुर से 132 कि.मी. और अजमेर से 11 कि.मी. की दूरी पर नाग पहाड़ के पार बसे पुष्कर में पर्यटकों के लिए बहुत कुछ दर्शनीय है।

पुष्कर अरावली पर्वत-श्रृंखला में एक सुरम्य घाटी है। यहाँ पर घुमने के लिए अनेक पर्यटक स्थल है

झील एवं घाट : पुष्कर सरोवर के 52 घाट हैं। सरोवर चारों ओर अनेक राजा-महाराजाओं के विश्राम स्थल और मंदिरों से घिरा है। ये विश्राम स्थल भी महलों से कम भव्य नहीं हैं। लगभग 400 मंदिरों में प्रमुख ब्रह्माजी का मंदिर है। घाटी की ठंडी खुली हवागुलाब, चमेलीमोगराहजारा और अगर-धूप की सुगंध ने इस स्थान को मनोरम बना दिया है। यहाँ फोटोग्राफी की मनाही है।

मंदिर : पुष्कर बस स्टैंड से कुछ ही दूर राम बैकुंठ मंदिर है। इसे नए रंगजी का मंदिर भी कहा जाता है। इसके निर्माता हैं-डींडवाना के सेठ मगनी राम रामकुमार बगड़ा।

ब्रह्माजी का मंदिर पुष्कर के मुख्य बाजार के अंतिम छोर पर है। सभी मंदिरों में पुष्कर का प्रमुख मंदिर है। यहाँ ब्रह्माजी की चतुर्मुखी प्रतिमा है। मंदिर के प्रांगण में एक कछुआ अंकित है। इस मंदिर के पीछे रत्नगिरि पहाड़ी पर ब्रह्माजी की
धर्मपत्नी सावित्रीजी का मंदिर है।

सफारी : यहाँ के कुछ स्थानीय होटल और ट्रैवेल एजेंसियाँ पर्यटकों के लिए सफारी का आयोजन करते हैं । इस आयोजन में पर्यटक रेत के टीले रोमांचकारी यात्रा और ग्रामीण संस्कृति की झलक से आनंद और नई जानकारियाँ प्राप्त करते हैं, इस आयोजन में खाने-पीने एवं ठहरने की अच्छी व्यवस्था रहती है।

पर्यटक गाँव : राजस्थान पर्यटन विकास निगम द्वारा प्रत्येक वर्ष मेले के अवसर पर खीमों का एक गाँव तैयार किया जाता है। इस गाँव का विशेषकर पर्यटकों के लिए विशेष महत्व है। इन खीमों में पर्यटकों के लिए रहने-खाने की सभी सुविधाएँ रहती हैं। प्रत्येक खीमे में डबल बेड तोशक-चादर, तकिया, गलीचा मेजकुर्सी आदि सभी चीजें रख दी जाती हैं। एक बड़े हॉल में 100 लोग एक साथ खा सकते हैं। भोजन के साथ कॉफी, स्नेक बारबैंक काउंटर, डाकघर तथा आमोद-प्रमोद की भी सामग्री रहती है। इतनी सुविधाओं से संपन्न खीमे का आरक्षण महीनों क्या, साल भर पहले से ही शुरू हो जाता है।

विशेष आकर्षण है शाम को इस खीमा-ग्राम के खुले प्रांगण में होनेवाले विभिन्न रंगारंग सांस्कृतिक कार्यक्रम। इस कार्यक्रम के अंतर्गत कालबेलिया नृत्य, गुलाबों और पार्टी के कवार्डलोक-नृत्य घर-घूमर के साथ-साथ चाँदनी रात में लोकवाद्यध की धुन पर लोक-संगीत के सुरीले सुर से श्रोता मंत्रमुग्ध हो जाते हैं। इस कार्यक्रम में भाग लेने के लिए राजस्थान के लोकप्रिय ख्यातिलब्ध लोक कलाकार शामिल होकर समारोह में चार चाँद लगा देते हैं।

पुष्कर मेला : पुष्कर मेला अब एक अंतरराष्ट्रीय मेला बन गया है। यह मेला प्रतिवर्ष कार्तिक शुक्ल एकादशी से कार्तिक पूर्णिमा तक लगता है। इस मेले में दूर-दराज के गाँवों के लोग पुष्कर झील में स्नान करने से पुण्यलाभ प्राप्त करने, सांस्कृतिक समारोह में आनंदित होते हुए विभिन्न प्रकार की मनपसंद चीजें खरीदने आते हैं। मेले में आयोजित कार्यक्रम बड़ा ही आकर्षक और आनंददायक होता है। पारंपरिक राजस्थानी वेशभूषा में सुसज्जित लोकनर्तक और नर्तकियों के पैरों की थिरकन और भाव-भंगिमाएँ देखकर दर्शक मुग्ध हो जाते हैं। लोकनृत्य और लोकगीतों से लोग भावविभोर हो जाते हैं। बच्चों के हैरतअंगेज करतब देखकर चकित रह जाना पड़ता है ।

पुष्कर मेले में देखने और खरीदने की बहुत सारी चीजें मिल जाती हैं। पारंपरिक राजस्थानी डिजाइनों में बने यहाँ के जेवर दूसरे राज्यों की महिलाओं को ही नहीं, विदेशी महिलाओं को भी अपनी ओर आकर्षित करते हैं। इन जेवरों के अलावा प्राकृतिक रंगों से बनी ओढ़नी भी देशविदेश की महिलाओं को बेहद पसंद है। तरह-तरह की कशीदाकारी की नुकीली जूतियाँ देखकर यहाँ के राजा- महाराजाओं की शान की याद आ जाती है।

पशु मेला : पुष्कर मेले का एक बड़ा आकर्षण है इस अवसर पर लगनेवाला विशाल पशुमेला। मेले में गाय, बैलबकरियों और कैंस आदि कई पशुओं की खरीदबिक्री होती है। इनमें ऊँट विशेष आकर्षण का केंद्र होता है। ऊँटों के तरह तरह के करतब, जैसे-ऊँट-दौड़ऊँटनृत्यऊंटगाड़ी की सवारी। सबसे अधिक सवारी लेनेवाले ऊँट आदि देखकर दर्शक आश्चर्यचकित रह जाते हैं।

कृत्रिम मोतियोंसीपियों तथा रंग-बिरंगे परिधानों से सुसज्जित पशुओं को देखने का अलग ही आनंद है। पशु मेले में घूमना एक विशेष आनंदानुभव है। लहसुन की चटनी, ईटों या पत्थरों को जोड़कर बनाए गए चूल्हे पर सेंकी गई रोटियों की महक और स्वाद भूले नहीं भूलता। ग्रामीण जब-तब बाँसुरीपिपाडी तथा इकतारे पर मस्ती का राग छेड़ देते हैं। उनके पैर आपही-आप थिरकने लगते हैं। रोटियाँ बनाकर महिलाएँ भी इस रास-रंग में दिल खोलकर शामिल हो जाती हैं।

राजस्थान की राजधानी जयपुर से 132 कि.मी. दूर पुष्कर जाने के लिए रेल या सड़क मार्ग की सुविधा उपलब्ध है। अजमेर में सूफी संत चिश्ती की दरगाह के दर्शन करते हुए यदि पुष्कर जाया जाए तो नाग पहाड़ के हरे-भरे जंगलों और खेतों के नजारे का आनंद लिया जा सकता है।

जानकारी की विशेष बातें : पुष्कर के संबंध में विशेष जानकारी वेबसाइट wwwpushkarraj.com पर भी प्राप्त की जा सकती है।


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