Sant Ravidas ji ke dohe in Hindi : संत रविदास जी के दोहे हिंदी अर्थ सहित

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Sant Ravidas ji ke dohe in Hindi
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संत रविदास जी के दोहे हिंदी अर्थ सहित

Sant Ravidas ji ke dohe in Hindi


रैदास कहै जाकै हदै, रहे रैन दिन राम

सो भगता भगवंत सम, क्रोध न व्यापै काम

अर्थ : रविदास जी कहते है कि जिसके हर्दय मे रात दिन राम समाये रहते है, ऐसा भक्त राम के समान है, उस पर न तो क्रोध का असर होता है और न ही कम भावना उस पर हावी हो सकती है

संत रविदास जी के दोहे हिंदी अर्थ सहित का विडियो देखें 

 


दोहा/पद :

हरि-सा हीरा छांड कै, करै आन की आस।

ते नर जमपुर जाहिंगे, सत भाषै रविदास।।

अर्थ : रविदास जी कहते है कि हरी के समान बहुमूल्य हीरे को छोड़ कर अन्य की आशा करने वाले अवश्य ही नरक जायेगें अर्थात् प्रभु भक्ति को छोड़ कर इधर-उधर भटकना व्यर्थ है

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दोहा/पद :

जा देखे घिन उपजै, नरक कुंड मेँ बास ।

प्रेम भगति सों ऊधरे, प्रगटत जन रैदास ।।

अर्थ : रविदास जी कहते है कि जिस रविदास को देखने से घर्णा होती थी, जिसका नरक कुंद मे वास था, ऐसे रविदास जी का प्रेम भक्ति ने कल्याण कर दिया है ओंर वह एक मनुष्य के रूप मै प्रकट हो गए है

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दोहा/पद :

’रविदास’ जन्म के कारनै, होत न कोउ नीच।
नर कूँ नीच करि डारि है, ओछे करम की कीच।

अर्थ : “गुरु रविदास जी कहते हैं कि मात्र जन्म के कारण कोई नीच नहीं बन जाता हैं परन्तु मनुष्य को वास्तव में नीच केवल उसके कर्म बनाते हैं”

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दोहा/पद :

माटी को पुतरा कैसे नचत है ।। देखै देखै सुनै बोलै दउरिओ फिरत है ।। १ ।। रहाउ ।।

जब कछु पावै तब गरब करत है ।। माया गई तब रोवन लगत है ।। १ ।।

मन बच क्रम रस कसहि लुभाना ।। बिनसि गया जाय कहुँ समाना ।।२।।

कहि रविदास बाजी जग भाई ।। बाजीगर सउ मोहे प्रीत बन आई ।।३।।

अर्थ : “गुरु रविदास जी कहते हैं कि यह पाँच तत्व रुपी मिट्टी का पुतला ( मनुष्य ) मोह-माया में फँसकर सांसारिक कार्य-कलापों में नाच रहा है। यह मोह-माया के प्रभाव में फँसकर देखता, सुनता, बोलता और दौड़ता है । जब मनुष्य कुछ प्राप्त कर लेता है तब यह अभिमान करता है और जब माया चली जाती है, तब रोने लगता है अर्थात उसे अपने लुट जाने का अहसास होता है । सांसारिक विषय-वासनाओं के लोभ में पड़कर जीव मन, वचन और कर्म से माया का ही वीचार करता है। उसे यह भी ज्ञान नही कि मरने के बाद वह किस योनि में जाएगा । गुरू रविदास जी कहते हैं कि यह संसार बाजीगर की बाजी की तरह झुठा है, पर मेरी प्रीति तो इस खेल को करने वाले परमात्मा से लग गई है ।

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दोहा/पद :

जाति-जाति में जाति हैं, जो केतन के पात।
रैदास मनुष ना जुड़ सके जब तक जाति न जात।।

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दोहा/पद :

कृस्न, करीम, राम, हरि, राघव, जब लग एक न पेखा।
वेद कतेब कुरान, पुरानन, सहज एक नहिं देखा।।


दोहा/पद :

रैदास कनक और कंगन माहि जिमि अंतर कछु नाहिं।
तैसे ही अंतर नहीं हिन्दुअन तुरकन माहि।।


दोहा/पद :

हिंदू तुरक नहीं कछु भेदा सभी मह एक रक्त और मासा।
दोऊ एकऊ दूजा नाहीं, पेख्यो सोइ रैदासा।।


दोहा/पद :

कह रैदास तेरी भगति दूरि है, भाग बड़े सो पावै।
तजि अभिमान मेटि आपा पर, पिपिलक हवै चुनि खावै।।


दोहा/पद :

मन चंगा तो कठौती में गंगा।


दोहा/पद :

वर्णाश्रम अभिमान तजि, पद रज बंदहिजासु की।

सन्देह-ग्रन्थि खण्डन-निपन, बानि विमुल रैदास की।।


दोहा/पद :

चरन पताल सीस असमांना,

सो ठाकुर कैसैं संपटि समांना। 


दोहा/पद :

बांधू न बंधन छांऊं न छाया,

तुमहीं सेऊं निरंजन राया।।


दोहा/पद :

सिव सनिकादिक अंत न पाया,

खोजत ब्रह्मा जनम गवाया।।   


दोहा/पद :

तोडूं न पाती पूजौं न देवा,

सहज समाधि करौं हरि सेवा।। 


दोहा/पद :

नख प्रसेद जाकै सुरसुरी धारा,

रोमावली अठारह भारा।। 


दोहा/पद :

चारि बेद जाकै सुमृत सासा,

भगति हेत गावै रैदासा।। 


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