Sitamarhi History in Hindi : सीतामढ़ी जानकी मंदिर

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Sitamarhi History in Hindi : सीतामढ़ी जानकी मंदिर


 

Where is Sitamarhi : सीतामढ़ी कहाँ है

सीतामढ़ी वह स्थान है, जहाँ भारतीय नारियों की आदर्श देवी सीताजी का अवतरण हुआ था, सीतामढ़ी मंदिर संत रविदास नगर जिला में स्थित है। यह मंदिर इलाहबाद और वाराणसी के मध्य स्थित जंगीगंज बाज़ार से 11 किलोमीटर दूर गंगा के किनारे स्थित है, मुजफ्फरपुर, मधुबनी एवं जनकपुर (नेपाल) से सड़क मार्ग और दरभंगा तथा रक्सौल से रेल मार्ग द्वारा सीतामढ़ी पहुंचा जा सकता है।

यहाँ पर हनुमानजी की ११० फीट ऊँची मूर्ति है जिसे विश्व की सबसे बड़ी हनुमान जी की मूर्ति होने का गौरव प्राप्त है

सीतामढ़ी से 5 कि.मी. पश्चिम में पुनौरा ग्राम है। इसका पौराणिक नाम पुण्यारण्य है। पुण्यारण्य में ही सीताजी का आविर्भाव हुआ था।

Sitamarhi Story in Hindi : सीतामढ़ी की कथा

पौराणिक कथा के अनुसार लंकाधिपति रावण अपने राज्य में निवास करने वाले ऋषि-मुनियों से कर के रूप में रक्त लेता था। इस अनाचार और कुकृत्य के लिए ऋषियों ने उसे शाप दे दिया—जिस कलश में तुम हमारा रक्त एकत्रित कर रहे हो, उस कलश का मुँह जिस दिन खुलेगा, उसी दिन उसी कलश से तुम्हारा काल उत्पन्न होगा। ऋषियों के शाप के डर से रावण ने रक्त से भरे कलश को राजा जनक के राज्य मेंएक खेत में गड़वा दिया।

जनक जी के राज्य में जब घोर अकाल पड़ा तो ऋषियों ने कहा कि राजा जनक जब खेत में हल चलाएँगे तो वर्षा होगी। जनकजी ने खेत में हल चलाना शुरू किया तो हल की नोक उस रक्तपूरित कलश से टकरा गई और कलश का मुंह खुल गया।

उसी कलश से सीताजी का आविर्भाव हुआ। इसके बाद रावण द्वारा सीता-हरण और राम द्वारा रावणवध की कहानी तो सभी जानते हैं। पुण्यारण्य में रामायणकाल में पुंडरीक ऋषि रहते थे। सीतामढ़ी शहर से 3 कि.मी. दूर यहाँ एक भव्य सरोवर है, जिसे जानकी जन्मकुंड और इससे सटे पूरब में जानकी जन्मभूमि मंदिर है। मंदिर में सीता-राम की कश्मीरी पद्धति से निर्मित प्रस्तर एवं अष्टधातु की प्राचीनतम प्रतिमाएँ हैं, मुख्य द्वार पर गदा और पर्वत उठाए महावीरजी विराजमान हैं।

सीताजी का आविर्भाव दिवस वैशाख शुक्ल नवमी माना जाता है। उनके विवाह की तिथि अगहन शुक्ल पंचमी मानी जाती है। खेत जिस जगह कलश से सीताजी प्रकट हुई थीं, उस जगह सीताकुंड है। यह स्थान सीतामढ़ी में है। सीतानवमी के अवसर पर यहाँ एक बड़ा मेला लगता है।

सीतामढ़ी की महिमा :

नेपाल का एक प्रमुख शहर जनकपुर सीतामढ़ी के सुरसंड प्रखंड कार्यालय के समीप अवस्थित है। देश के विभिन्न भागों से लोग यहाँ सीतामढ़ी-सुरसंड भिठामोड़ होते हुए जनकपुर जाते हैं। मिथिला की संस्कृति भारत की प्राचीनतम संस्कृति का एक महत्त्वपूर्ण अंग है। आदिकाल में संपूर्ण सीतामढ़ी क्षेत्र राजा के राज्य में सम्मिलित था। कहा जाता है कि कपरौल के पास गौतम ऋषि का आश्रम था, जिनके शाप से उनकी पत्नी अहिल्या पत्थर बन गई थीं। आज यह स्थान ‘अहिल्या स्थान’ के नाम से प्रसिद्ध है। कपरौल ग्राम में कपिल मुनिखड़का ग्राम में खड़क ऋषि और चकमहिला में चक्रधर ऋषि का आश्रम था।

सीतामढ़ी के तीर्थ स्थल :

सीतामढ़ी से 8 कि.मी दूर रीगा नामक स्थान में ऋग्वेद के विद्वान् रहते थे। रीगा ‘ऋग्या’ का अपभ्रंश है। राजपट्टी ग्राम में बाज पद्धति और राजोपट्टी में राजसूत्र पद्धति के ज्ञाता का निवास था। सामपुर में सामवेद के गायकों अथरी में अथर्ववेद और यजुआर में यजुर्वेद के विद्वानों का निवास था।

सीतामढ़ी से 15 कि.मी. दूर देवकुली में शिवजी का प्राचीनतम मंदिर है। प्राचीन काल में देवकुल्या नाम से विख्यात यहाँ संतान की कामना से पंचाल-नरेश द्रुपद ने यज्ञ किया था, जिसके फलस्वरूप महाभारत की मुख्य नायिका-पाँचों पांडवों की पत्नी द्रौपदी का जन्म हुआ। सीतामढ़ी में सीताजी का भव्य मंदिर है। मंदिर का द्वार चाँदी का है। इसमें सीता, राम एवं लक्ष्मण की श्याम प्रतिमाएँ हैं, जो किसी भी अन्य मंदिर में नहीं हैं

सीतामढ़ी से 30 कि.मी. दूर हलेश्वर स्थान है, जहाँ प्राचीन शिव मंदिर है। कहा जाता है कि राजा जनक ने खेत में हल चलाने के पहल यहाँ पुत्रेष्टि-यज्ञ किया था। सीतामढ़ी से 8 कि.मी. उत्तरपूर्व में वह वटवृक्ष आज भी है, जिसके नीचे जनश्रुति के अनुसार, जनकपुर से लौटते समय सीताजी की डोली रखी गई थी। इसीलिए इस स्थान का नाम ‘पंथपाकड़पड़ गया।

पुपरी में बाबा नागेश्वरनाथ और बाजपट्टी में बोधायन का प्राचीन मंदिर है। पुपरी के दक्षिण में गोरौल शरीफ है, जहाँ सूफी संत मौलाना हजरत बसो करीम साहब की मजार है। सीतामढ़ी से सटे इसलामपुर में मुंशी बाबा की मजार है। इनके अलावा वैष्णो देवी का मंदिर, सूर्य मंदिर, सीता उद्यान आदि स्थान भी दर्शनीय हैं।

सीतामढ़ी की सम्पूर्ण जानकारी :

जनकपुर पर्यटकों के लिए पर्यटक का मुख्य केंद्र है। राम, जानकी और लक्ष्मण के अलावा जानकी मंदिर में राजा जनक और उनकी धर्मपत्नी सुनयना की भी अति प्राचीन प्रतिमाएँ हैं । यहाँ दही-चूड़ा का भोग लगाने की परंपरा है, जिसका आज भी निर्वाह हो रहा है।

जनकपुर धाम के विशाल गढ़ की लंबाई पूर्व में 15 कि.मी, पश्चिम में 15 कि.मी., उत्तर में 15 और दक्षिण में 15 कि.मी. है। कहा जाता है कि मुनियों द्वारा जनकपुर धाम के 5 कोस तक गुप्त रूप से परिक्रमा की जाती थी।

जनकपुर धाम के पश्चिम में गलेश्वरनाथ महादेव एवं मांडेश्वरनाथ महादेवउत्तर में क्षीरेश्वरनाथ महादेव का मंदिर तथा याज्ञवल्क्य मुनि का मंदिर है। पूर्व में सिंहेश्वरनाथ एवं महेश्वरनाथ महादेव का मंदिर तथा विश्वामित्रजी का मंदिर है। दक्षिण में कल्याणेश्वर नाथ एवं विश्वनाथ महादेव का मंदिर तथा विभांडक मुनि का आश्रम है। राम एवं लक्ष्मणजी के मंदिर में आज भी चूड़ादही का बालभोग लगाया जाता है। जानकी मंदिर में छप्पन प्रकार की वस्तुओं का भोग लगता है।

प्रति वर्ष 20 से 30 हजार पर्यटक जानकी मंदिर, पुनौराधाम, कपरौल, हलेश्वर स्थान, पंथपाकड़ आदि ऐतिहासिक व पौराणिक स्थानों के दर्शनार्थ आते हैं।

सीतामढ़ी में मारवाड़ी धर्मशाला एवं शिव नारायण धर्मशाला के अलावा पर्यटन विभाग द्वारा मान्यता प्राप्त सीतायम होटल है, जहाँ ठहरा जा सकता है।

पुनौरा धाम में एक विश्रामघर (रेस्ट हाउस) के अलावा दीपक रेस्ट हाउस, अंबर रेस्ट हाउस और राजकुमार होटल में ठहरने की उचित व्यवस्था है।


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