Sri Kali Mandir Patna History in Hindi : श्री सिद्धेश्वरी काली मंदिर, पटना

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Sri Kali Mandir Patna History in Hindi

Sri Kali Mandir Patna History in Hindi : श्री सिद्धेश्वरी काली मंदिर, पटना


पाटलिपुत्र के अन्य तीर्थों में पटना सिटी (कालीस्थान) स्थित श्री काली मंदिर का भी विशेष महत्व है। लोकविश्वास है कि इसी मंदिर की देवी नगर की अधिष्ठात्री एवं रक्षिका देवी हैं। आदिशक्ति के रूप में मां काली की अद्भुत एवं हजारों साल पुरानी अत्यंत प्राचीन पाषाण प्रतिमा है, जिसे लोग ‘श्मशनी काली’ भी कहते हैं। यह मूर्ति काले पत्थर की है। मंदिर परिसर में हनुमान शिव, भैरव और योगिनी की भू-मूर्तियाँ हैं। मंदिर के नाम पर काली स्थान’ मुहल्ला बसा है। मंदिर से सटा बरगद का विशाल वृक्ष है, जो काफी पुराना है।

इतिहास के जानकार बताते हैं कि यह मंदिर अत्यंत प्राचीन है। इस मुहल्ले से सटा दीरा मुहल्ला है। यह दियारा का ही परिवर्तित रूप है। कहते हैं, पहले यह स्थान गंगा और पुनपुन नदी का संगमस्थल था। उन दिनों यह जंगलों से भरा था।
और तांत्रिकों की तंत्र साधना का अनुपम स्थान था।

कहा जाता है कि एक बार मुगल बादशाह शाह आलम (प्रथम) हाथी पर सवार घूमते हुए उधर जा निकले, मंदिर के समीप आने पर उनके हाथी ने आगे बढ़ने से इनकार कर दिया। उनके कुछ सलाहकारों ने उन्हें इस मंदिर की माँ काली के दर्शन की सलाह दी। वे मंदिर में आएप्रतिमा के दर्शन किए, तब हाथी प्रसन्नतापूर्वक आगे बढ़ा। देवी की महिमा से प्रभावित होकर उन्होंने मंदिर की सजावट के लिए कीमती उपहार दिए-नग जड़ित तलवार, घंटीमुकुट आदि।

तदनंतर सन् 1905 में श्री ईश्वरी प्रसाद रईस ने मंदिर के मार्ग को चौड़ा करवाया और 1929 में उन्होंने ही सिंहद्वार बनवाया। महाराज नेपाल की ओर से अष्टधातु का घंटा उपहार स्वरूप मिला, जो आज भी टंगा हुआ है।

अनुमान है कि सन् 1853 में नेपाल के महाराज यहाँ पधारे थे और उसी समय मंदिर को अपने स्मृतिचिह्न स्वरूप घंटा दान में दिया

कहते है -नेपाल नरेश ने ही इस मंदिर की चहारदीवारी बनवाई थी। इसी तरह कई स्थानीय नागरिकों ने भी मंदिर की शोभावृद्धि के लिए अनेक उपहार दिए।

दशहरा के अवसर पर दर्शनार्थियों की अधिक भीड़ रहती है। मंगल कार्य होने से पूर्व लोग यहाँ आकर देवी की आराधनापूजा-अर्चना करते हैं, ताकि उनके कार्य निर्विन पूरे हो सकें।

सतुआनी मेले के अवसर पर कभी यहाँ से ‘सवांग’ निकलता था। उसमें भाग लेनेवाले मां काली के सम्मुख नाच-गान
करके ही अन्य जगहों में जाते थे।

उन्हें ऐसा विश्वास था कि माँ काली उन सबों की रक्षा करेंगी। सवांग में भाग लेने वाले लोगों के शरीर के कुछ हिस्से में बरछी आदि घोपे रहते थे। ऐसे मौके पर तांत्रिक या ‘डायन’ का डर बना रहता था। किंतु ऐसे लोगों का कभी अमंगल नहीं हुआ।


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