स्टेम सेल | Stem cell therapy in Hindi | लाइलाज बीमारियों का इलाज है स्टेम सेल

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Stem cell therapy in Hindi
Stem cell therapy in Hindi

Stem cell therapy in Hindi 

लाइलाज बीमारियों का इलाज है स्टेम सेल


कई बार विज्ञान जगत् में किए जाने वाले कुछ प्रयोग विवादास्पद हो जाते हैं। स्टेम सेल के साथ भी ऐसा ही हुआ। बावजूद इसके पिछले कुछ वर्षों के दौरान इस विषय से सम्बद्ध बड़ी संख्या में किए जाने वाले शोध-अध्ययन चिकित्सा विज्ञान के क्षेत्र में स्टेम सेल की उपयोगिता को साबित करते हैं। आज ब्रेन कैंसर से लेकर केश चिकित्सा तक के क्षेत्र में स्टेम सेल उपचार के अच्छे परिणाम प्राप्त हो रहे हैं। आज इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि स्टेम सेल्स की उपयोगिता ने चिकित्सा क्षेत्र में नया आयाम खोल दिया है।

स्टेम सेल्स अविकसित अवस्था में पड़ी रहने वाली शरीर की मूल कोशिकाएँ हैं, जो शरीर में किसी भी प्रकार की कोशिकाओं के निर्माण में सक्षम होती हैं। अविकसित होने के बावजूद इन कोशिकाओं का उपयोग शरीर की किसी भी कोशिका की मरम्मत में किया जा सकता है। स्टेम सेल्स में अनिश्चित प्रसार क्षमता सहित विभिन्न प्रकार की कोशिकाओं में उचित उद्दीपन की प्राप्ति पर अन्तर करने की निहित क्षमता की विशेषता का होना इन्हें शरीर की दूसरी कोशिकाओं से पृथक् कर विशिष्ट पहचान प्रदान करता है।

चिकित्सा क्षेत्र में स्टेम सेल्स की प्राप्ति के दो प्रमुख स्रोत हैं
1. भ्रूण (एम्ब्रीओनिक स्टेम सेल )
2. वयस्क ऊतक (वयस्क स्टेम सेल)

स्टेम सेल्स की प्राप्ति के लिए भ्रूण विकास के ब्लास्टोसिस्ट चरण के दौरान निर्मित भ्रूण प्रयोग में लाया जाता है। भ्रूण विकास के दौरान जीव सृजन करने में पूर्णतसक्षम डिम्ब कोशिकाओं को बार-बार विभाजित करने पर एक ऐसी अवस्था आती है कि ये कोशिकाएँ ब्लास्टोसिस्ट नामक एक गोलाकार रचना बनाती हैं, किन्तु विभाजन की कई प्रक्रियाओं से गुज़रने के पश्चात् इस अवस्था में पृथक् की गई कोशिकाओं में जीव सृजन क्षमता नहीं होती। बावजूद इसके ये कोशिकाएँ शरीर के किसी भी ऊतक के रूप में विकसित होने में सक्षम होती हैं। इस प्रकार, भ्रूण से स्टेम सेल्स प्राप्त कर लेने के पश्चात् भ्रूण को नष्ट कर दिया जाता है। इसी कारण यह चिकित्सीय प्रयोग विवादित बना हुआ है।

अमेरिका में वर्ष 2001 में भ्रूण से प्राप्त की जाने वाली स्टेम कोशिकाओं के शोध आदि कार्यों पर सरकारी तौर पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया था, पर वर्ष 2010 में स्टेम सेल से सम्बद्ध शोधअध्ययनों को पुनवित्तीय मदद दी जाने लगी। इस बारे में अमेरिकी राष्ट्रपति श्री ओबामा का कहना है – मानव कल्याणार्थ ऐसे शोध राजनीतिक दखल से मुक्त होंगे। चिकित्सा प्रयोग में लाई जाने वाली स्टेम सेल्स क्लीनिक में कृत्रिम विधि से तैयार किए गए भ्रूण से निकाली जाती हैं।

एक भ्रूण से असीमित मात्रा में स्टेम सेल्स की आपूर्ति सम्भव है। इसी कारण अधिकांश स्टेम सेल्स भ्रूण से ही प्राप्त की जाती हैं, किन्तु शोधकर्ता स्टेम सेल्स प्राप्त करने के लिए भ्रूण पर निर्भरता समाप्त करने की कोशिश कर रहे हैं।

स्टेम सेल्स उपचार पद्धति साध्य एवं असाध्य, दोनों ही रोगों के निदान में वरदान साबित हो रही है। इस चिकित्सा पद्धति को कैंसर, हार्ट अटैक, एड्स, पार्किंसंस, थैलीसीमिया, गुर्दा प्रत्यारोपण, कॉर्निया प्रत्यारोपण, पेशीय विकार, अर्थराइटिस, डायस्ट्रोफी, अल्जाइमर, पक्षाघात, मधुमेह, मस्तिष्क चोट, त्वचा रोग, बाल रोग, दन्त रोग आदि में काफ़ी प्रभावी माना जा रहा है।

इस चिकित्सा पद्धति के अन्तर्गत जब स्टेम सेल्स को रक्त में प्रवाहित अथवा शरीर के किसी भाग में प्रत्यारोपित किया जाता है, तो उसे स्टेम सेल थेरेपी कहते हैं। वैसे तो इस थेरेपी के मूल स्वरूप (बोन मैरो ट्रांसप्लाण्ट) का प्रयोग कैंसर के उपचार में पिछले चार दशकों से किया जा रहा है, पर समय के साथ-साथ जब इस तकनीक का प्रयोग चिकित्सा के अन्य क्षेत्रों में किया गया, तब आश्चर्यजनक सकारात्मक परिणाम प्राप्त हुए।

स्टेम सेल थेरेपी में स्वयं के शरीर से प्राप्त (ऑटोलोगस सेल्स) का प्रत्यारोपण ( ट्रांसप्लाण्टेशन) सुरक्षित एवं कारगर सिद्ध हो रहा है और दिनोंदिन पूरे विश्व में इस थेरेपी का प्रचार-प्रसार बढ़ता जा रहा है। स्पाइनलकॉर्ड इंजरी, मस्कुलर डिस्ट्राफी, नर्वस सिस्टम से जुड़े रोग व लाइलाज समझे जाने वाले मोटर न्यूरॉन जैसे रोगों में स्टेम सेल ट्रांसप्लाण्टेशन काफ़ी प्रभावी है। प्रदूषित वातावरण के कारण उत्पन्न हुए लंग फाइब्रोसिस जैसे खतरनाक व जानलेवा रोग में भी स्टेम सेल थेरेपी के अच्छे नतीजे मिलने लगे हैं। बच्चों के मानसिक विकारों में भी इस थेरेपी से काफी लाभ प्राप्त हो रहा है।

वर्ष 2018 में लन्दन में इण्टरनेशनल एड्स सोसायटी कान्फ्रेंस के दौरान हॉवर्ड मेडिकल स्कूल के शोधकर्ता टिमोथी हेनरीख ने कहा था कि अमेरिका के बोस्टन में एड्स पीड़ित दो रोगियों में स्टेम सेल प्रत्यारोपण के पश्चात् एचआईवी संक्रमण का कोई लक्षण नहीं मिला। इससे दुनियाभर में एड्स के तीन करोड़ से ज्यादा रोगियों में आशा की नई किरण जगी है। वर्ष 2007 में बोन मैरो प्रत्यारोपण द्वारा बर्लिन के टिमोथी रे ब्राऊन नामक रक्त कैंसर ल्यूकीमिया से पीड़ित व्यक्ति के उपचार की चर्चा विश्वभर में हुई थी, किन्तु टिमोथी को जहाँ एक बेहद दुर्लभ म्यूटेशन से पीड़ित व्यक्ति का
बोन मैरो दिया गया था, वहीं बोस्टन के एड्स रोगियों को दी गई स्टेम सेल्स एक सामान्य दाता से ली गई थीं। अपने देश
में चण्डीगढ़ स्थित पीजीआईएमईआर में न्यूरोब्लास्टोमा’ नामक कैंसर से पीड़ित एक तीन वर्षीय बालक को स्टेम सेल
प्रत्यारोपण कर स्वस्थ किया गया।

देश के अन्य भागों से भी इस तकनीक द्वारा कैंसर ठीक किए जाने की सूचनाएँ प्राप्त हुई हैं। हाल ही में ऑक्सफोर्ड स्थित कॉकरेन रिसर्च ग्रुप ने बारह सौ से भी अधिक हृदय रोगियों के आंकड़े प्रस्तुत किए हैं। इनमें बोन मैरो अथवा रक्त से निर्मित स्टेम सेल के प्रयोग वाले रोगियों में अगले दो वर्षों के दौरान मृत्यु को प्राप्त होने या पुन: अस्पताल में भर्ती होने वाले रोगियों की संख्या में चौथाई कमी आ गई।

अमेरिका के मिलर इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिसिन के निदेशक जोशुआ हैरी ने अपने शोधपत्र में सिद्ध किया है कि ऑटोलोगस स्टेम सेल्स के द्वारा रोगियों के हृदय के क्षतिग्रस्त भाग को कम करके उनके जीवन की गुणवत्ता में वृद्धि की जा सकती है। स्टेम सेल थेरेपी हार्ट अटैक के बाद हृदय की पम्पिंग क्षमता को बढ़ाती है। भारत भी इस क्षेत्र में काफ़ी तेज़ी से आगे बढ़ रहा है। मुम्बई स्थित उमराव अस्पताल के कॉर्डियो वैस्कुलर सर्जन डॉ. राजीव श्रीवास्तव ने इस विधि से कई रोगियों की पम्पिंग क्षमता को बढ़ाने में सफलता प्राप्त की है।

हाल में वैज्ञानिकों ने एक नए प्रयोग के दौरान रोगियों के कूल्हों से अस्थि मज्जा प्राप्त कर उन्हें सीधे उनके हृदय में प्रविष्ट करा दिया। इस प्रकार स्टेम सेल इंजेक्शन द्वारा हृदय रोग उपचार के नए द्वार खुल गए हैं। फेफड़ों के रोगों में भी स्टेम सेल उपचार लाभप्रद साबित हो रहा है। 20 वर्षों से लंग फाइब्रोसिस और सिस्टेमिक स्क्लीरोसिस से पीड़ित मुम्बई निवासी एलबर्ट नामक युवक को स्टेम सेल ट्रांसप्लाण्टेशन से काफी राहत मिली है। इस थेरेपी से फेफड़ों के लचीलेपन व फेफड़ों में लगी चोटों को भी ठीक किया जाता है। रीढ़ की चोटों में यह पद्धति काफी लाभकारी पाई गई है।

मधुमेह 1 से पीड़ित रोगियों की चिकित्सा के दौरान उनके ही कूल्हे की हड्डियों से अस्थि मज्जा लेकर उसे विशेष मशीन से संसाधित करके क्षतिग्रस्त अंग की मांसपेशियों में इंजेक्ट कर दिया जाता है।

भारत में मधुमेह के सन्दर्भ में ऐलोजेनिक स्टेम सेल्स पर आधारित शोध हेतु, जिसके लिए बोन मैरो डोनर्स से प्राप्त किए जाते हैं, आईसीएमआर एवं डीसीजीआई सरीखी सरकारी संस्थाओं द्वारा पूर्व से ही अनुमति दी जा चुकी है।

लन्दन स्थित इम्पीरियल कॉलेज के वैज्ञानिकों का कहना है कि ब्रेन में स्टेम सेल प्रत्यारोपित करने से ब्रेन स्ट्रोक के शिकार लोगों की सेहत में तेज़ी से सुधार होने की सम्भावना है। ब्रेन स्ट्रोक की वजह से प्रतिवर्ष चलने-फिरने में असमर्थ होने वाले हज़ारों रोगियों को इस बात से भी नई आशा बंधी है कि अब लैब में संरक्षित की गई नवजात शिशु की गर्भनाल से निकली कोशिकाओं से प्राप्त स्टेम सेल्स के ज़रिये भी उनका उपचार सम्भव है।

निश्चय ही बोन मैरो, रक्त, वसा एवं चर्बी के साथ-साथ कॉर्ड ब्लड या कार्ड टिश्यू (गर्भनाल से प्राप्त रक्त या टिश्यू) जैसे स्टेम सेल्स के स्रोतों के प्रयोग से भ्रूण जैसे इसके विवादास्पद स्रोत से छुटकारा पाया जा सकता है। ऐसे में चिकित्सा जगत् में इसके प्रयोग के क्षेत्र में व्यापक विस्तार की सम्भावना बन जाती है।

भारत में पिछले पाँच वर्षों में जैव प्रौद्योगिकी बाज़ार तीन गुना हो गया है। यहाँ जैव प्रौद्योगिकी विभाग द्वारा वर्ष 2005 से 2010 के दौरान स्टेम सेल शोध-अध्ययन में 60 मिलियन डॉलर का निवेश किया गया। नेशनल सेण्टर फॉर बायोलॉजिकल साइंसेज़, बंगलुरु, राष्ट्रीय कोशिका विज्ञान केन्द्र, पुणे, राष्ट्रीय मस्तिष्क अनुसन्धान केन्द्र, नई दिल्ली ; सेण्टर फॉर ऐण्ड मोलेक्यूलर बायोलॉजी, हैदराबाद; स्टेम सेल अनुसन्धान केन्द्र, वेल्लोर; एसजीपीजीआईएमएस, लखनऊ आदि स्टेम सेल्स से सम्बद्ध महत्वपूर्ण केन्द्र हैं।

इन सरकारी संस्थाओं के अलावा देश में इस तकनीक से जुड़ी कई स्तरीय निजी संस्थाएँ भी इस क्षेत्र में सफलतापूर्वक कार्य कर रही हैं।

यद्यपि स्टेम सेल उपचार काफी महंगा होने के कारण अभी भी आम आदमी की पहुँच से बहुत दूर है, पर विकास के साथ-साथ भविष्य में यह चिकित्सा पद्धति निश्चय ही सस्ती साबित होगी। यदि केन्द्र सरकार द्वारा इस तकनीक से सम्बद्ध शोध-अध्ययनों और चिकित्सा के क्षेत्र में विशेष सहयोग हो, साथ- ही-साथ इसके प्रयोग हेतु उपयुक्त कानून भी बनाया जा सके, तो आने वाले समय में भारत इस तकनीक में विश्व के शिखर पर आसीन हो सकता है।


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