टेस्ट ट्यूब बेबी कैसे होता है | IVF Treatment in Hindi | Test Tube Baby Process in Hindi

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Test Tube Baby Process in Hindi

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Test Tube Baby Process in Hindi 

टेस्ट ट्यूब बेबी कैसे होता है


विज्ञान की सहायता से मनुष्य ने केवल तीव्र प्रगति ही हासिल नहीं की, बल्कि अपने जीवन की अनेक जटिल समस्याओं के हल भी निकाले हैं। सन्तानहीनता पहले एक ऐसी समस्या थी, जिसका समाधान सम्भव ही नहीं था, लेकिन अब इस समस्या का हल निकाला जा चुका है। वास्तव में, ऐसी समस्या के समाधान के लिए टेस्ट ट्यूब बेबी अर्थात् परखनली शिशु की अवधारणा का विकास हुआ है।

प्रयोगशाला में टेस्ट ट्यूब में गर्भाधान करवाकर शिशु को जन्म देने की तकनीक कृत्रिम परिवेशी निषेचन कहलाती है। इसे अंग्रेजी में इन विट्रो फर्टिलाइज़ेशन (आईवीएफ) कहा जाता है। यह ऐसी तकनीक है, जिसकी सहायता से महिलाओं में कृत्रिम गर्भाधान किया जाता है।

इस प्रक्रिया में किसी महिला के अण्डाशय से अण्डाणु को अलग कर उसका सम्पर्क शुक्राणु से शरीर से बाहर एक परखनली में कराया जाता है। परखनली में निषेचन की प्रक्रिया पूरी होने के बाद निषेचित अण्डे को महिला के गर्भाशय में रख दिया जाता है। गर्भाशय में सही समय तक रहने के बाद एक स्वस्थ शिशु का जन्म होता है। कृत्रिम गर्माधान की इस प्रकिया से जन्मा शिशु टेस्ट ट्यूब बेबी कहलाता है।

ब्रिटिश फ़िज़ियोलॉजिस्ट प्रोफेसर रॉबर्ट एडवर्ड ने नि:सन्तान दम्पतियों की मदद के लिए टेस्ट ट्यूब बेबी अर्थात् इन विट्रो फर्टिलाइजेशन (आईवीएफ) तकनीक का विकास बीसवीं सदी में सत्तर के दशक में किया था, इसके पहले कई दशकों तक शोध के बाद उन्हें इस कार्य में सफलता प्राप्त हुई थी। एडवर्ड को इस कार्य में स्त्री रोग विशेषज्ञ पैट्रिक स्टेपटो का विशेष सहयोग प्राप्त हुआ। उनके प्रयासों के फलस्वरूप एवं उनके सहयोग से विश्व की पहली टेस्ट ट्यूब बेबी (जिसका नाम लुइस ब्राउन है) का जन्म वर्ष 1978 में हुआ।

वर्ष 2014 में जारी की गई एक रिपोर्ट के अनुसार, तब से लेकर अब तक इस तकनीक की सहायता से विश्व में करीब 50 लाख से अधिक लोग सन्तान सुख प्राप्त करने में कामयाब रहे हैं। ईएसएचआई के अनुसार, आज विश्व में प्रतिवर्ष लगभग 4 लाख परखनली शिशुओं का जन्म हो रहा है। वर्ष 2012 के दौरान केवल संयुक्त राष्ट्र में ही 60 हज़ार से अधिक परखनली शिशुओं ने जन्म लिया है। इस तकनीक के द्वारा अधिक उम्र की महिलाओं के लिए भी माँ बनने की सम्भावनाएँ काफ़ी बढ़ गई हैं। अमेरिकी लेखिका मिरियम जॉल के शब्दों में यह तकनीक (टेस्ट ट्यूब बेबी 35 वर्ष से ऊपर की महिलाओं के लिए महत्वपूर्ण है, जो प्राय: बच्चे जनने में असफल हो जाती हैं।’

इन विट्रो फर्टिलाइज़ेशन तकनीक के आविष्कार के महत्व को समझते हुए वर्ष 2010 में रॉबर्ट एडवर्ड को चिकित्सा विज्ञान के नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया। नोबेल पुरस्कार देने वाली समिति ने पुरस्कार देने का कारण बताते हुए कहा था-‘सन्तानोत्पत्ति में असमर्थता एक ऐसी समस्या है, जो विश्व के 10% दम्पतियों को प्रभावित करती है और इस समस्या के निदान में जो अभूतपूर्व योगदान रॉबर्ट एडवर्ड ने दिया है, उसी के लिए उन्हें मेडिसिन के क्षेत्र में वर्ष 2010 का नोबेल पुरस्कार दिया गया है।

आरम्भिक दौर में आईवीएफ तकनीक का प्रयोग महिलाओं में फैलोपियन ट्यूब की समस्या के समाधान के तौर पर किया जाता था, लेकिन अब इसकी ऐसी तकनीक भी विकसित हो गई है, जो उन पुरुषों की सन्तान की चाह भी पूरा कर सकती है, जो इस कार्य में किसी कारणवश अक्षम हैं। वर्तमान में आईवीएफ में कई तकनीकें प्रचलन में हैं, जिनमें आईसीएसआई, जेडआईएफटी, जीआईएफएफ़टी एवं पीजीडी प्रमुख हैं।

आईसीएसआई का प्रयोग उस स्थिति में किया जाता है, जब अण्डों की संख्या कम होती है या फिर शुक्राणु, अण्डाणु से क्रिया करने के लिए बेहतर अवस्था में नहीं होते। इसमें माइक्रोमेनीपुलेशन तकनीक द्वारा शुक्राणुओं को सीधे अण्डाणुओं में इंजेक्ट कराया जाता है। जेडआईएफटी में महिला के अण्डाणुओं को निकालकर उन्हें निषेचित कर महिला के गर्भाशय में स्थापित करने के बजाय उसकी फैलोपियन ट्यूब में स्थापित कर दिया जाता है।

प्रारम्भ में इस तकनीक का दुनियाभर में विरोध किया गया, इसकी नैतिकता पर सवाल खड़े किए गए। राजनीतिक, सामाजिक एवं धार्मिक स्तर पर भी इस तकनीक का व्यापक विरोध हुआ। यहाँ तक कि इस तकनीक की विश्वसनीयता
को वैज्ञानिकों ने भी इसका अच्छा-खासा विरोध किया, अधिकतर वैज्ञानिकों का यह मानना था कि इस तकनीक
से पैदा हुए बच्चे कभी सामान्य नहीं हो सकते, किन्तु इस तकनीक के सामान्य होने के सभी सन्देह तब दूर हो गए, जब
वर्ष 2006 में दुनिया की पहली टेस्ट ट्यूब बेबी लुइस ब्राउन ने अपने बच्चे को जन्म दिया, और इसमें खास बात यह थी
कि उसने अपने पति वेस्ली मुलिण्डर से प्राकृतिक तरीके से गर्भाधान किया था।

आईवीएफ तकनीक की सहायता से अब मनचाहे गुणों वाली और अनेक प्रकार की जीवनपर्यन्त बीमारियों से
सुरक्षित रहने वाली सन्तान को जन्म देना भी सम्भव हो गया हैय द्यपि इसका इस कारण विरोध भी किया जाता है।
लोगों का यह मानना है कि इसके माध्यम से केवल अच्छे-से-अच्छे लोग ही नहीं, बल्कि बुरे-से-बुरे लोगों का भी जन्म सम्भव है,

इसलिए यह तकनीक यदि मनुष्य के लिए लाभदायक, तो इससे नुकसान की सम्भावना भी कम नहीं। बात चाहे जो भी हो इस तकनीक के माध्यम से सन्तान की इच्छा रखने वाले लोगों को अवश्य लाभ हुआ है। यह तकनीक मानवता के लिए निश्चित रूप से लाभकारी है, इसलिए इसके व्यापक विकास एवं प्रसार की आवश्यकता है।

भारत में भी इस तकनीक का प्रयोग शुरू हो गया है। भारत में इस तकनीक से पैदा हुई पहली टेस्ट ट्यूब बेबी का नाम दुर्गा है।

समाज में वंश परम्परा को कायम रखने एवं कई अन्य कारणों से लोग सन्तान प्राप्ति की इच्छा रखते हैं। सन्तान के अभाव में मनुष्य का जीवन नीरस हो जाता है। उन्हें ज़िन्दगी भर एक कमी खलती रहती है। ऐसे नि:सन्तान दम्पतियों के लिए यह तकनीक वरदान साबित हुई है, हालाँकि इस तकनीक के आलोचकों का कहना है कि इससे लाभ केबल अमीर लोगों को ही मिलेगा, क्योंकि इस विधि से गर्भाधान कराना खर्चीला होता है और आम आदमी इस खर्च को वहन कर सकने में सक्षम नहीं होता,

किन्तु आलोचकों की यह शिकायत भी जल्द ही दूर हो जाएगी। आने वाले समय में यह तकनीक सस्ती एवं सर्वसुलभ भी होगी। इस तकनीक ने लाखों लोगों को सन्तान सुख से सम्पन्न कर दुनिया को खुशहाल करने का अभूतपूर्व कार्य किया है। इसके लिए इसकी जितनी भी प्रशंसा की जाए कम है।


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