विवेकानंद समाधि शिला : Vivekananda Rock Memorial In Hindi

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Vivekananda Rock Memorial In Hindi

जिस प्रकार ईसाइयों के लिए 25 दिसंबर एक महत्वपूर्ण दिवस है, उसी प्रकार 25 दिसंबर भारतवासियों के लिए स्वामी विवेकानंद की समाधि-शिला पर ध्यानमग्न होना महत्त्व रखता है। इस चट्टान को ‘विवेकानंद रॉक’ की संज्ञा दी जाती है, जिस पर बैठकर स्वामीजी ध्यानमग्न हुए थे।

 Vivekananda Rock Memorial In Hindi

विवेकानन्द स्मारक शिला विवेकानन्द रॉक मेमोरियल कहाँ स्थित है

विवेकानन्द स्मारक शिला भारत के तमिलनाडु के कन्याकुमारी में समुद्र में स्थित एक स्मारक है। यह एक प्रसिद्ध पर्यटन स्थल बन गया है। यह भुमि-तट से लगभग 500 मीटर अन्दर समुद्र में स्थित दो चट्टानों में से एक के ऊपर निर्मित किया गया है। एकनाथ रानडे ने विवेकानंद शिला पर विवेकानंद स्मारक मन्दिर बनाने में विशेष कार्य किया।

Vivekananda Rock Memorial History in Hindi

सन् 1892 में भारत के आध्यात्मिक पुनर्जागरण के प्रतीक स्वामी विवेकानंद ने रामेश्वरम् एवं मदुरई के बाद कन्याकुमारी की यात्रा की थी। तीन ओर समुद्र से घिरा हुआ है कन्याकुमारी का यह पवित्र स्थल। कहते हैं, जब स्वामीजी यहाँ पहुँचे तब समुद्र में तैरकर उस शिला तक पहुँच गए।

साधारण तैराक इतनी दूर वेगवती समुद्री धारा में तैरने की हिम्मत भी नहीं कर सकता। यह स्थान तीन सागरों का मिलन स्थल है। इसके एक ओर बंगाल की खाड़ी, दूसरी ओर अरब सागर तथा सामने हिंद महासागर लहरा रहा है। तीन दिनों तक स्वामीजी बिना कुछ खाए पिए, उस शिला पर बैठे आत्मचिंतन करते हुए ध्यानमग्न हो गए। इधर तट पर श्रद्धालु भक्तों की भीड़ इकट्ठा हो गई। सभी उनकी जीवनरक्षा के लिए प्रभु से प्रार्थना करने लगे। तीन दिनों के बाद जब चौथे दिन उनका ध्यान टूटा, तब उन्हें नौका पर बिठाकर किनारे लाया गया। तभी से इस चट्टान का नामकरण उन्हीं के नाम पर किया गया और अध्यात्म-प्रेमियों के लिए यह दर्शनीय हो गया।

स्वामी विवेकानंद जी ने समाधि क्यों ली :

स्वामी विवेकानंद ने देश के दुर्बल, शोषित एवं पीड़ित मानवता के कल्याण के लिए ही यह समाधि ली थी।

समाधिशिला पर ध्यानरत स्वामीजी के सामने भारत का अतीत, वर्तमान और भविष्य तीनों काल जैसे घूम गए। उन्हें ऐसा आभास हुआ कि देश के पतन का कारण धर्म नहीं, अपितु सही धर्मभावना का अभाव है।

जब वे समाधि से उठे, तो उनका चित्त प्रसन्न था। उनके मन और मस्तिष्क में भारत की दीनहीन मानवता की सेवा के लिए एक सेवा-योजना बन चुकी थी।

उन्होंने कहा – ‘एक राष्ट्र के रूप में आज हम अपना व्यक्तित्व गवां बैठे हैं। उदात्त और निर्विकार व्यक्तित्व का अभाव ही हमारे सब कष्टों का कारण है। हमें राष्ट्र को उसका खोया हुआ व्यक्तित्व लौटाना होगा और इसके लिए सामान्य जनजीवन
को जाग्रत् करना होगा।”

उसके बाद वे जन-जन के कष्टों का निवारण करने के लिए घूम-घूमकर धर्मोपदेश करते रहे। उनकी योजना मिशन के माध्यम से समस्त देश में फैल गई। किंतु कन्याकुमारी में समुद्र के मध्य शिला पर बैठकर उन्होंने जो शांति और प्रेरणा अर्जित की, वह अपरिमित थी।

All information about Vivekananda Rock Memorial in hindi

भारत के दक्षिणी छोर पर कन्याकुमारी के सामने, तीन सागरों के संगम स्थल पर समुद्र के भीतर स्थित एक विशाल शिलाखंड पर नवनिर्मित स्वामी विवेकानंद शिला स्मारक हमारी राष्ट्रीय एकता का तीर्थ बन गया है

  • समुद्र तट से पचास फुट ऊंचाई पर निर्मित यह भव्य और विशाल प्रस्तर कृति विश्व के पर्यटन मानचित्र पर एक महत्वपूर्ण आकर्षण केन्द्र बनकर उभर आई है।
  • उसकी भव्यता और विशालता का अनुमान इससे ही लग सकता है कि उसे बनाने के लिए लगभग 73 हजार विशाल प्रस्तर खंडों को समुद्र तट पर स्थित कार्यशाला में कलाकृतियों से सज्जित करके समुद्री मार्ग से शिला पर पहुंचाया गया। इनमें कितने ही प्रस्तर खंडों का भार 13 टन तक था।
  • स्मारक के विशाल फर्श के लिए प्रयुक्त प्रस्तर खंडों के आंकड़े इसके अतिरिक्त हैं।
  • इस स्मारक के निर्माण में लगभग 650 कारीगरों ने 2081 दिनों तक रात-दिन श्रमदान किया। कुल मिलाकर 78 लाख मानव घंटे इस तीर्थ की काया को आकार देने में लगे।

2 सितम्बर, 1970 को भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति डा.वी.वी.गिरि ने तमिलनाडु के तत्कालीन मुख्यमंत्री श्री करुणानिधि की अध्यक्षता में आयोजित एक विराट समारोह में भारत के उस नवीन तीर्थ को विश्व की धरोहर बना दिया। स्वामी विवेकानंद के जन्म शताब्दी वर्ष में जन्मा वह राष्ट्रीय संकल्प केवल सात साल में ही साकार रूप धारण कर गया, अनेक दिशाओं से विरोध की कई मंजिलों को पार करके, साधनों के अभाव से जूझते हुए। स्मारक निर्माण का वह अभियान स्वयं में राष्ट्र जागरण का महान यज्ञ बन गया। उस यज्ञ ने भारत की बाह्य विविधता और विघटनात्मक राजनीति के अंतस्तल में प्रवाहमान राष्ट्रीय चेतना और राष्ट्रीय एकात्मता की अजस्र धारा का विश्व को साक्षात्कार कराया और उस साक्षात्कार का निमित्त बना स्वामी विवेकानंद का 39वर्ष का अल्प जीवन और भारतीय चेतना को युगों-युगों तक झंकृत करने वाली उनकी ओजस्वी वाणी।

  • स्वामी विवेकानंद के अमर संदेशों को साकार रूप देने के लिए ही 1970 में विशाल शिला पर एक भव्य स्मृति भवन का निर्माण किया गया। समुद्र की लहरों से घिरी इस शिला तक पहुंचना भी एक अलग अनुभव है।
  • स्मारक भवन का मुख्य द्वार अत्यंत सुंदर है। इसका वास्तुशिल्प अजंता-एलोरा की गुफाओं के प्रस्तर शिल्पों से लिया गया लगता है।
  • लाल रंग के पत्थर से निर्मित स्मारक पर 70 फुट ऊंचा गुंबद है।
  • भवन के अंदर चार फुट से ऊंचे प्लेटफॉर्म पर परिव्राजक संत स्वामी विवेकानंद की प्रभावशाली मूर्ति है। यह मूर्ति कांसे की बनी है, जिसकी ऊंचाई साढ़े आठ फुट है। यह मूर्ति इतनी प्रभावशाली है कि इसमें स्वामी जी का व्यक्तित्व एकदम सजीव प्रतीत होता है।

आज भी हजारों की संख्या में यात्री वहाँ पहुँचकर और ‘विवेकानंद रॉक’ के दर्शन कर अपने को धन्य मानते हैं।

कन्याकुमारी ग्राम में स्वामीजी की स्मृति में एक सार्वजनिक पुस्तकालय तथा वाचनालय भी है, जिसमें हिंदू धर्मदर्शन एवं साहित्यिक पुस्तकों की संख्या पाँच हजार के करीब है।

 


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